जोधपुर: उदयपुर के कथित धर्मांतरण मामले में गिरफ्तार 13 आरोपियों को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए फिलहाल राहत देने से इनकार कर दिया।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि इस समय मामले की जांच पूरी नहीं हुई हैऔर केस डायरी में सभी आरोपियों की भूमिका पहली नजर में सामने आती है। इसलिए आरोपियों को जमानत नहीं दी जा सकती।
हालांकि, हाईकोर्ट ने आरोपियों को चालान पेश होने के बाद दोबारा जमानत के लिए आवेदन करने की छूट दी है।
यह मामला उदयपुर के ऋषभदेव थाना क्षेत्र में दर्ज कथित धर्मांतरण केस से जुड़ा है। आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की अलग-अलग धाराओं और राजस्थान विधिविरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2025 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
आरोपियों ने खुद को बेगुनाह बताते हुए जमानत की मांग की थी, लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट की जस्टिस सुनील बेनीवाल की एकलपीठ ने उनकी दलीलों से सहमति नहीं जताई और सभी आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी।
सभी आरोपी उदयपुर, डूंगरपुर और छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों से जुड़े बताए गए हैं।
क्या था मामला?
यह मामला उदयपुर जिले के ऋषभदेव थाना क्षेत्र का है। पुलिस ने 6 जून 2026 को एफआईआर दर्ज की थी।
आरोप है कि 5 से 7 जून के बीच इलाके में आयोजित एक धार्मिक शिविर के दौरान लोगों का जबरन धर्मांतरण कराने की कोशिश की गई।
इसी मामले में 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की कई धाराओं के साथ राजस्थान विधिविरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2025 के तहत मामला दर्ज है।
बचाव पक्ष की दलील
सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि उनके मुवक्किलों को इस मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है।
उनका कहना था कि जिस कार्यक्रम को पुलिस जबरन धर्मांतरण का शिविर बता रही है, वह सिर्फ एक धार्मिक सभा थी। आरोपियों का किसी का धर्म बदलवाने का कोई इरादा नहीं था।
उन्होंने यह भी कहा कि जांच के दौरान ऐसा कोई सामान बरामद नहीं हुआ, जिससे जबरन धर्मांतरण के आरोपों की पुष्टि होती हो।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि ज्यादातर आरोपियों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वे पिछले करीब डेढ़ महीने से न्यायिक हिरासत में हैं।
चूंकि मामले के ट्रायल में समय लग सकता है, इसलिए उन्हें जमानत दी जानी चाहिए। वकीलों का कहना था कि केवल आरोपों के आधार पर किसी को लंबे समय तक जेल में रखना उचित नहीं है।
सरकार ने किया विरोध
सरकार और शिकायतकर्ता पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि अब तक की जांच में सभी आरोपियों की अलग-अलग भूमिकाएं सामने आई हैं।
उनके मुताबिक, 5 से 7 जून के बीच आयोजित कथित धर्मांतरण शिविर की तैयारी और आयोजन में सभी आरोपी किसी न किसी तरह शामिल थे।
सरकार का कहना था कि जांच के दौरान मोबाइल फोन से मिले मैसेज, कथित पैसों के लेनदेन और आरोपियों के आपसी संपर्क जैसे कई अहम सुराग मिले हैं।
इसके अलावा जांच में कुछ आरोपियों के पास से धार्मिक सामग्री मिलने और स्थानीय लोगों को शिविर में बुलाने के आरोप भी सामने आए हैं।
सरकार का कहना था कि जांच अभी जारी है और कुछ अन्य लोगों की भूमिका की भी पड़ताल की जा रही है। ऐसे में इस समय आरोपियों को जमानत दी गई तो जांच प्रभावित हो सकती है।
इसी आधार पर सरकार और शिकायतकर्ता पक्ष ने कोर्ट से जमानत याचिकाएं खारिज करने की मांग की।
हाईकोर्ट ने जमानत क्यों ठुकराई?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने केस डायरी और जांच से जुड़े रिकॉर्ड का अध्ययन किया। इसके बाद कोर्ट ने कहा कि अब तक की जांच में सभी आरोपियों की भूमिका सामने आती है।
साथ ही जांच अभी पूरी नहीं हुई है, इसलिए इस समय उन्हें जमानत देना उचित नहीं होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की गंभीरता और अब तक सामने आए तथ्यों को देखते हुए फिलहाल आरोपियों को राहत नहीं दी जा सकती।
इसी आधार पर सभी 13 आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
चालान के बाद
हालांकि, हाईकोर्ट ने आरोपियों को दोबारा जमानत की अर्जी लगाने की छूट दी है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस की ओर से चालान पेश होने के बाद वे फिर से जमानत के लिए आवेदन कर सकेंगे।
अब इस मामले में अगला अहम कदम पुलिस की जांच पूरी होने और चालान पेश होने का है।
इसके बाद आरोपी नए सिरे से जमानत की मांग कर सकेंगे। फिलहाल हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि जांच पूरी होने से पहले इस मामले में किसी भी आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती।
