नई दिल्ली। बच्चों का भविष्य संवारने वाले प्राइवेट स्कूल टीचर्स का अपना भविष्य कितना सुरक्षित है? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से इस सवाल का जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी सवाल से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों की पेंशन, मेडिकल सुविधा, इंश्योरेंस और रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा को लेकर केंद्र और राज्यों को नाटिस जारी किया है।
यह याचिका ऑल-इंडिया टीचर्स फेडरेशन की नेशनल कोऑर्डिनेटर लिगीमोल जॉर्ज ने दायर की है।
इस जनहित याचिका में प्राइवेट स्कूल शिक्षकों के लिए पेंशन, PF, ग्रेच्युटी, इलाज, बीमा और रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा की एक समान व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन यानी NCTE को नोटिस जारी किया है। और चार सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा है।
आखिर प्राइवेट शिक्षकों की परेशानी क्या है?
यह मामला सिर्फ वेतन या नौकरी से जुड़ा नहीं है। याचिका में कहा गया है कि देश के अलग-अलग प्राइवेट स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों को उनकी नौकरी की शर्तों और संस्थान की नीतियों के हिसाब से अलग-अलग सुविधाएं मिलती हैं।
कहीं पेंशन की सुविधा है तो कहीं रिटायरमेंट के बाद शिक्षकों के पास आर्थिक सुरक्षा का पर्याप्त इंतजाम नहीं है। मेडिकल सुविधा, बीमा और परिवार को मिलने वाले लाभों में भी काफी अंतर है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि लंबे समय तक बच्चों को पढ़ाने और शिक्षा व्यवस्था में योगदान देने के बावजूद बड़ी संख्या में प्राइवेट स्कूल टीचर्स को अपने बुढ़ापे और मुश्किल समय के लिए पर्याप्त सोशल सिक्योरिटी नहीं मिलती।
याचिका में क्या-क्या मांग की गई?
ऑल इंडिया टीचर्स फेडरेशन की नेशनल कोऑर्डिनेटर लिगीमोल जॉर्ज ने यह जनहित याचिका दाखिल की है।
याचिका में केंद्र सरकार से तय समय-सीमा के भीतर प्राइवेट स्कूल शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय स्तर की सोशल सिक्योरिटी पॉलिसी तैयार करने की मांग की गई है।
इसके लिए एक अलग नेशनल प्राइवेट स्कूल टीचर्स वेलफेयर बोर्ड बनाने का सुझाव भी दिया गया है।
यह बोर्ड शिक्षकों के लिए सोशल सिक्योरिटी से जुड़ी योजनाओं की निगरानी के साथ-साथ अलग-अलग राज्यों में इनके बेहतर तालमेल का काम कर सकता है।
पेंशन से लेकर इलाज तक सुरक्षा की मांग
याचिका में शिक्षकों के लिए सिर्फ एक-दो सुविधाओं की बात नहीं की गई है। इसमें पेंशन, प्रोविडेंट फंड और ग्रेच्युटी की व्यवस्था मजबूत करने की मांग की गई है।
इसके साथ ही स्वास्थ्य और मेडिकल सुविधा, दुर्घटना और हेल्थ इंश्योरेंस, विकलांगता सहायता और परिवार के लिए कल्याणकारी योजनाएं देने की मांग भी की गई है।
याचिका में यह भी जोर दिया गया है कि रिटायरमेंट के बाद शिक्षकों के पास आर्थिक सुरक्षा का सहारा हो।
अलग-अलग राज्यों में अलग नियम क्यों?
याचिका में कहा गया है कि प्राइवेट स्कूल शिक्षकों से जुड़ी सोशल सिक्योरिटी की व्यवस्था अलग-अलग जगहों पर अलग है।
कई जगह शिक्षकों की सेवा शर्तें राज्य के नियमों और स्कूल मैनेजमेंट की नीतियों पर निर्भर करती हैं। इसका असर उन्हें मिलने वाली सोशल सिक्योरिटी सुविधाओं पर भी पड़ता है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि एक जैसा काम करने वाले शिक्षकों को सिर्फ राज्य या स्कूल बदलने की वजह से अलग-अलग सुविधाएं मिलना उचित नहीं है।
याचिका में इस मुद्दे को समानता के अधिकार से जोड़ते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 का भी हवाला दिया गया है।
मौजूदा कानून पर्याप्त नहीं होने की बात कही
याचिका में कई मौजूदा श्रम और सोशल सिक्योरिटी कानूनों का जिक्र किया गया है। इनमें कर्मचारी राज्य बीमा कानून, कर्मचारी भविष्य निधि कानून, ग्रेच्युटी कानून और सामाजिक सुरक्षा संहिता-2020 शामिल हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इन कानूनों के बावजूद प्राइवेट स्कूल शिक्षकों के लिए देशभर में एक जैसी ऐसी व्यवस्था नहीं है, जो नौकरी के दौरान से लेकर रिटायरमेंट के बाद तक उनकी सोशल सिक्योरिटी सुनिश्चित कर सके।
याचिका में कहा गया है कि कई दूसरे नौकरीपेशा वर्गों के लिए अलग वेलफेयर बोर्ड और खास सोशल सिक्योरिटी योजनाएं मौजूद हैं। ऐसे में प्राइवेट स्कूल शिक्षकों के लिए भी ऐसी ही एक व्यवस्था बनाने की जरूरत है, जो उनके कल्याण और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।
लाखों प्राइवेट शिक्षक सीधे प्रभावित हो रहे
याचिका में इस मुद्दे का दायरा बताने के लिए UDISE+ 2023-24 के आंकड़ों का हवाला दिया गया है।
इसके मुताबिक देश में करीब 14.72 लाख स्कूल, 98 लाख से ज्यादा शिक्षक और करीब 24.8 करोड़ छात्र हैं।
याचिका के अनुसार इनमें 37,30,047 शिक्षक मान्यता प्राप्त निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ा रहे हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में शिक्षकों को देखते हुए उनके लिए देशभर में एक जैसी सोशल सिक्योरिटी व्यवस्था जरूरी है।
याचिका में संविधान के अधिकारों का भी हवाला
याचिका में आर्टिकल 14 और आर्टिकल 21 के साथ संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों का भी हवाला दिया गया है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि अलग-अलग राज्यों में शिक्षकों को मिलने वाली सोशल सिक्योरिटी में अंतर समानता के अधिकार से जुड़ा सवाल उठाता है।
याचिका में आर्टिकल 21A का भी जिक्र है। इसके तहत बच्चों को शिक्षा देने में प्राइवेट स्कूलों के शिक्षक भी अहम भूमिका निभाते हैं।
ऐसे में याचिकाकर्ता ने उनके काम और भविष्य की सुरक्षा के लिए मजबूत सोशल सिक्योरिटी व्यवस्था होने की जरूरत बताई है।
याचिका में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का भी उल्लेख किया गया है। इसमें शिक्षकों की भूमिका, उनके सम्मान, बेहतर कामकाजी माहौल और संस्थागत सहयोग पर जोर दिया गया है।
हालांकि याचिकाकर्ता का कहना है कि नीति में प्राइवेट शिक्षकों के पेंशन और रिटायरमेंट के बाद सामाजिक सुरक्षा को लागू करने योग्य अधिकार के तौर पर तय नहीं किया गया है।
सरकारों से जवाब के बाद तस्वीर साफ होगी
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल याचिका में उठाए गए मुद्दों पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने केंद्र, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और NCTE समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
अब सरकारों के जवाब के बाद यह साफ होगा कि प्राइवेट स्कूल शिक्षकों के लिए एक समान पेंशन, मेडिकल सुविधा और सोशल सिक्योरिटी व्यवस्था बनाने की मांग पर आगे क्या कदम उठाया जाता है।
याचिकाकर्ता ने यह भी स्पष्ट किया है कि जनहित याचिका का उद्देश्य किसी शिक्षक के व्यक्तिगत वेतन, नियुक्ति, प्रमोशन या नौकरी के विवाद को सुलझाना नहीं है। मामला केवल प्राइवेट स्कूल शिक्षकों के लिए व्यापक और समान सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था तैयार करने से जुड़ा है।
