सेवानिवृत्त कर्मचारी की गलत पे-फिक्सेशन भी हो सकती है ‘Continuing Wrong’, लेकिन 3 साल से ज्यादा के एरियर नहीं, 10 साल बाद दायर याचिका पर हाईकोर्ट ने तय किए अहम सिद्धांत
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी की वेतन पुनर्निर्धारण (Pay Re-fixation) और पेंशन से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी के अंतिम वेतन का गलत निर्धारण हुआ है और उसी के आधार पर पेंशन का भुगतान किया जा रहा है, तो यह परिस्थितियों के अनुसार ‘Continuing Wrong’ यानी निरंतर जारी रहने वाला गलत कृत्य हो सकता है।
ऐसे मामले में सेवानिवृत्ति के बाद भी पेंशन के गलत निर्धारण के कारण हर महीने नया कारण-ए-दावा उत्पन्न हो सकता है। हालांकि, लंबे समय बाद विलंब से मांगे गए पुराने एरियर पर राहत सामान्यतः तीन वर्ष की अवधि तक ही सीमित रहेगी।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के अग्रवाल और जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण की पीठ ने यह अहम फैसला सेवानिवृत्त कर्मचारी माजिद खान की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले के जरिए स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्त कर्मचारी की गलत पे-फिक्सेशन, यदि उसका सीधा असर मासिक पेंशन पर पड़ता है, तो Continuing Wrong हो सकती है; लेकिन लंबे विलंब के बाद पुराने एरियर का दावा सामान्यतः तीन वर्ष तक ही सीमित रहेगा।
वहीं ग्रेच्युटी जैसे एकमुश्त लाभ के दावे में अत्यधिक देरी राहत के रास्ते में बाधा बन सकती है।
क्या था पूरा मामला?
माजिद खान को वर्ष 1983 में वन विभाग में मोहरिर के पद पर वर्क-चार्ज कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया गया था।
बाद में वे स्थायी हुए और उन्हें चयन वेतनमान का लाभ भी मिला।
वर्ष 2000 में उन्हें पंचायत समिति में ग्राम सेवक-कम-प्रधान सचिव के पद पर स्थानांतरित किया गया। उन्होंने 15 जून 2000 को पदभार संभाला और वर्ष 2009 में सेवानिवृत्त हुए।
माजिद खान का कहना था कि ग्राम सेवक के पद पर नियुक्ति के बाद उनका वेतन मोहरिर के वेतनमान 2750-4400 रुपये में निर्धारित कर दिया गया, जबकि उनके अनुसार ग्राम सेवक का संबंधित वेतनमान अधिक था।
सेवानिवृत्ति के बाद वर्ष 2010 में उनका वेतन पेंशन निर्धारण के लिए नॉशनल रूप से रिफिक्स किया गया, लेकिन इस संशोधित वेतन का वास्तविक मौद्रिक लाभ उन्हें नहीं दिया गया।
उन्होंने यह भी दावा किया कि ग्रेच्युटी की गणना संशोधित अंतिम वेतन 10,100 रुपये के बजाय पुराने अंतिम वेतन 9,970 रुपये के आधार पर की गई।
10 साल की देरी बनी सबसे बड़ी अड़चन
मामले में करीब 10 साल से भी अधिक समय के बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
एकलपीठ ने वर्ष 2024 में दायर याचिका को देरी और लापरवाही (Delay and Laches) के आधार पर खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ माजिद खान ने डिवीजन बेंच में अपील की।
अपीलकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के M.R. Gupta और Tarsem Singh के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि गलत वेतन निर्धारण एक निरंतर गलत कृत्य है और इससे बार-बार कारण-ए-दावा पैदा होता है।
वहीं राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि याचिका 10 साल से अधिक की देरी के बाद दाखिल हुई और पुराने एरियर का दावा अब स्वीकार नहीं किया जा सकता।
गलत वेतन निर्धारण ‘Continuing Wrong’
मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के M.R. Gupta बनाम Union of India और Union of India बनाम Tarsem Singh के सिद्धांतों का विस्तार से परीक्षण किया।
कोर्ट ने कहा कि सेवा में रहते हुए गलत वेतन निर्धारण के आधार पर हर महीने गलत वेतन मिलने पर नया कारण-ए-दावा पैदा हो सकता है।
खंडपीठ ने अब यह महत्वपूर्ण सिद्धांत भी स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत पेंशन योग्य पद से सेवानिवृत्त कर्मचारी के मामले में भी लागू हो सकता है।
यदि अंतिम वेतन गलत तरीके से निर्धारित होने के कारण पेंशन भी गलत आधार पर तय हुई है, तो हर महीने पेंशन के भुगतान के साथ निरंतर प्रभाव बना रह सकता है।
लेकिन 10 साल पुराने एरियर पर नहीं मिली राहत
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘Continuing Wrong’ का सिद्धांत लागू होने का मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी को कई वर्षों का पूरा एरियर मिल जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पुराने एरियर को सामान्यतः रिट याचिका दाखिल करने से पहले के तीन वर्षों तक सीमित किया जाना चाहिए।
माजिद खान का वेतन वर्ष 2010 में नॉशनल रूप से रिफिक्स किया गया था, जबकि उन्होंने इसके करीब 10 साल बाद याचिका दायर की।
इसलिए हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही उनके मामले में Continuing Wrong का सिद्धांत लागू माना जाए, फिर भी तीन साल से अधिक पुराने एरियर का भुगतान नहीं किया जा सकता।
ग्रेच्युटी का दावा भी खारिज
कोर्ट ने ग्रेच्युटी के दावे को पेंशन से अलग माना।
हाईकोर्ट ने कहा कि ग्रेच्युटी का भुगतान एक बार होने वाला लाभ है। इसलिए गलत वेतन के आधार पर कम ग्रेच्युटी मिलने की शिकायत को निरंतर जारी रहने वाला गलत कृत्य नहीं माना जा सकता।
इतने लंबे और अस्पष्टीकृत विलंब के बाद इस दावे को Delay and Laches के आधार पर खारिज किया जा सकता है।
अपील खारिज, लेकिन महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत तय
हाईकोर्ट ने कहा कि माजिद खान का वेतन पहले ही नॉशनल रूप से रिफिक्स किया जा चुका था, इसलिए वेतन निर्धारण को लेकर कोई मूल विवाद शेष नहीं था।
विवाद केवल उस पुनर्निर्धारण से मिलने वाले परिणामी मौद्रिक लाभ को लेकर था, जिसे 10 साल की देरी के कारण अब प्रदान नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही डिवीजन बेंच ने अपील खारिज कर दी।
