हाईकोर्ट ने कहा- जब तक आजीवन कारावास पूरी तरह अपर्याप्त न हो, तब तक मृत्युदंड नहीं; दोहरे हत्याकांड में दोषसिद्धि बरकरार, फांसी की सजा रद्द
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने फांसी की सजा यानी मृत्युदंड की सजा देने को लेकर बेहद महत्वपूर्ण और नज़ीर बनने वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मौत की सजा केवल उन्हीं मामलों में दी जा सकती है, जहां आजीवन कारावास का विकल्प पूरी तरह अपर्याप्त हो।
रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए दिए फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक आजीवन कारावास पूरी तरह अपर्याप्त न हो, तब तक मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि फांसी आखिरी विकल्प होना चाहिए ना कि पहला.
इसी सिद्धांत को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने जालोर जिले के रामसीन थाना क्षेत्र के बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में दोषी करार दिए गए पहाड़ सिंह और डूंगर सिंह की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया, जबकि हत्या सहित सभी गंभीर आरोपों में उनकी दोषसिद्धि और अन्य सजाओं को बरकरार रखा।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने अधिनस्थ अदालत द्वारा भेजे गये डेथ रेफरेंस और आरोपियों की ओर से दायर अपीलों पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में अपराध गंभीर और क्रूर अवश्य है, लेकिन यह ऐसा मामला नहीं है जिसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में रखकर मृत्युदंड को अनिवार्य माना जाए।
आटा-साटा विवाह और हत्या
मामला 3 मार्च 2023 का हैं जब जालोर जिले के रामसीन थाना क्षेत्र में आटा-साटा विवाह को लेकर आपसी विवाद ने खूनी रूप ले लिया।
आरोप है कि पहाड़ सिंह और डूंगर सिंह कुल्हाड़ियां लेकर इंद्रा कंवर के घर पहुंचे और उसकी बेटी रिंकू कंवर का आटा-साटा विवाह कराने का दबाव बनाने लगे।
जब इंद्रा कंवर ने पति के घर लौटने के बाद इस विषय पर बात करने की बात कही, तो दोनों आरोपियों ने उस पर ताबड़तोड़ कुल्हाड़ी से हमला कर दिया।
मां को बचाने पहुंचे हरि सिंह पर भी आरोपियों ने जानलेवा हमला किया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
इसके बाद आरोपियों ने वहां मौजूद दूसरे रिश्तदारों रिंकू कंवर, जसवंत सिंह, हड़मत सिंह, चंद्रमोहन सहित अन्य लोगों पर भी हमला कर दिया।
पुलिस मौके पर पहुंची तब जाकर हमलावरों का तांडव रुका।
इस हमले में इंद्रा कंवर और हरि सिंह की मौत हो गई, जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए।
बाद में पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से खून से सनी कुल्हाड़ियां बरामद कीं।
ट्रायल कोर्ट ने दोनों को फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे अब राजस्थान हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए आजीवन कारावास में बदल दिया है।
बचाव में दोषियों की दलीलें
मामले में अधिनस्थ अदालत के फैसले के खिलाफ दायर अपील में बचाव में दोषी पहाड़ सिंह और डूंगर सिंह की ओर से अधिवक्ता प्रकाश चौधरी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए दलीलें पेश की.
बचाव पक्ष ने कहा कि कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला साक्ष्यों के गलत मूल्यांकन पर आधारित है।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि एफआईआर और गवाहों के बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं तथा अभियोजन पक्ष के गवाहों ने सुनवाई के दौरान अपने बयान में सुधार किया है।
स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी गवाहों का अभाव होने के कारण अभियोजन का पूरा मामला केवल मृतकों के परिजनों के बयानों पर आधारित है, जिन्हें पूरी तरह विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि दोनों आरोपियों को लंबे समय से चले आ रहे कृषि भूमि विवाद के कारण झूठा फंसाया गया है।
अभियोजन द्वारा आटा-साटा विवाह को घटना का कारण बताया गया, लेकिन इसे साबित करने के लिए कोई स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
आरोपियों की ओर से यह भी कहा गया कि यदि अभियोजन की कहानी को स्वीकार भी कर लिया जाए, तब भी घटना अचानक हुए विवाद और उकसावे का परिणाम थी, न कि पूर्व नियोजित हत्या।
ऐसे में हत्या का अपराध और विशेष रूप से मृत्युदंड उचित नहीं ठहराया जा सकता।
अधिवक्ता ने कुल्हाड़ियों की बरामदगी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि घटना के तुरंत बाद गिरफ्तारी होने के बावजूद चार दिन बाद गोबर और घास के ढेर से हथियार बरामद दिखाना अविश्वसनीय है।
जब्ती की प्रक्रिया और मलकाना रिकॉर्ड में भी कई खामियां हैं।
अंत में बचाव पक्ष ने दलील दी कि यह मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए फांसी की सजा कानून के अनुरूप नहीं है और इसे आजीवन कारावास में बदला जाना चाहिए।
सरकार का विरोध
मामले में डेथ रेफरेंस के पक्ष में राज्य सरकार ने पैरवी करते हुए दोषियों की सजा बहाल करने का अनुरोध किया.
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपक चौधरी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया।
उन्होंने हाईकोर्ट को बताया कि अभियोजन पक्ष ने प्रत्यक्षदर्शी गवाहों, घायल गवाहों, चिकित्सकीय साक्ष्यों, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फोरेंसिक रिपोर्ट और घटनास्थल से बरामद साक्ष्यों के माध्यम से दोनों आरोपियों का अपराध संदेह से परे साबित किया है।
राज्य सरकार ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने सभी साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण करने के बाद ही दोषसिद्धि और सजा का आदेश पारित किया था तथा उसके निर्णय में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि या अवैधता नहीं है।
अभियोजन के अनुसार उपलब्ध साक्ष्य पूरी तरह विश्वसनीय हैं और आरोपी हत्या सहित अन्य गंभीर अपराधों के दोषी हैं।
इसलिए आरोपियों की अपील खारिज कर ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनो पक्षों की बहस और दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि अपराध निस्संदेह अत्यंत गंभीर, क्रूर और समाज को झकझोर देने वाला है, जिसमें दो लोगों की निर्मम हत्या की गई और कई अन्य पर जानलेवा हमला हुआ।
इसके बावजूद भारतीय न्यायशास्त्र के अनुसार मृत्युदंड सामान्य नियम नहीं, बल्कि अपवाद (Exception) है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक यह पूरी तरह स्पष्ट न हो जाए कि आजीवन कारावास का विकल्प न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त है, तब तक किसी आरोपी को फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि यद्यपि यह अपराध गंभीर और जघन्य है, लेकिन उपलब्ध परिस्थितियों में इसे ऐसा असाधारण मामला नहीं माना जा सकता जिसमें मृत्युदंड ही एकमात्र उपयुक्त दंड हो।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों दोषियों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया, जबकि उनकी दोषसिद्धि और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई अन्य सजाओं को यथावत बरकरार रखा
मृतक का रिश्तेदार होने मात्र से गवाही खारिज नहीं…
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक और कानूनी बिंदू को स्पष्ट करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर किसी गवाह की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता कि वह मृतक का रिश्तेदार है।
यदि उसकी गवाही स्वाभाविक, विश्वसनीय और अन्य साक्ष्यों से पुष्ट हो, तो वह दोषसिद्धि का मजबूत आधार बन सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में घायल एवं प्रत्यक्षदर्शी गवाहों की मौजूदगी स्वाभाविक थी और उनके बयान पूरी तरह भरोसेमंद पाए गए।
मजबूत अभियोजन का मामला
हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान पूरी तरह विश्वसनीय हैं और उनकी पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, घटनास्थल से मिले साक्ष्यों तथा एफएसएल रिपोर्ट से होती है।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि आरोपियों की निशानदेही पर बरामद खून से सनी कुल्हाड़ियां और फोरेंसिक जांच अभियोजन के मामले को पूरी तरह मजबूत करती हैं।
गवाह और मजबूत साक्ष्य
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोजन पक्ष ने प्रत्यक्षदर्शी गवाहों, घायल गवाहों, मेडिकल रिपोर्ट, पोस्टमार्टम, फोरेंसिक साक्ष्यों तथा आरोपियों की निशानदेही पर बरामद हथियारों के माध्यम से यह संदेह से परे साबित कर दिया है कि दोनों आरोपियों ने साझा आपराधिक मंशा (Common Intention) के तहत इंद्रा कंवर और हरि सिंह की हत्या की तथा अन्य लोगों की हत्या का प्रयास भी किया।
हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन की मौखिक, चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्य एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं और उनमें कोई ऐसी विसंगति नहीं है जिससे अभियोजन का मामला कमजोर पड़ता हो।
ट्रायल कोर्ट ने दी थी फांसी
इस मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, भीनमाल ने 9 दिसंबर 2025 को दोनों आरोपियों को हत्या के अपराध में मृत्युदंड, हत्या के प्रयास में आजीवन कारावास तथा अन्य धाराओं में अलग-अलग अवधि की सजा और जुर्माने से दंडित किया था।
मृत्युदंड की पुष्टि के लिए मामला हाईकोर्ट भेजा गया था, जबकि दोनों दोषियों ने भी अपनी सजा और दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए अपील दायर की थी।
‘फांसी अपवाद है, आजीवन कारावास सामान्य नियम’
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने दोहराया कि भारतीय न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड एक अपवाद (Exception) है और आजीवन कारावास सामान्य नियम (Rule)।
अदालत ने कहा कि जब तक यह पूरी तरह स्पष्ट न हो जाए कि आजीवन कारावास न्याय के उद्देश्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तब तक किसी भी दोषी को फांसी नहीं दी जानी चाहिए।
इसी संवैधानिक और न्यायिक सिद्धांत के आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों दोषियों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया, जबकि उनकी दोषसिद्धि और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई अन्य सजाओं को यथावत बनाए रखा।