जयपुर। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि मध्यस्थता (Mediation) भारत के लिए कोई नई अवधारणा नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति और न्याय परंपरा की आत्मा में सदियों से समाहित रही है।
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और विश्वास के माध्यम से विवादों का स्थायी समाधान तलाशने की भारतीय परंपरा का आधुनिक स्वरूप है।

जयपुर में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता सम्मेलन के दूसरे दिन विशेष संबोधन में सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हर विवाद का समाधान अदालत में ही हो, यह कानून का उद्देश्य नहीं है।
कानून का वास्तविक उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को सुलभ, सम्मानजनक, प्रभावी और सार्थक न्याय उपलब्ध कराना है।
उन्होंने कहा कि मुकदमेबाजी अक्सर पक्षकारों की ‘पोजीशन’ (Position) पर केंद्रित होती है, जबकि मध्यस्थता उनके वास्तविक ‘हितों’ (Interests) को समझने और दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य समाधान खोजने का प्रयास करती है।
‘संतरे’ की कहानी से समझाया मध्यस्थता का महत्व
अपने संबोधन में सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने दो बहनों और एक संतरे की प्रसिद्ध कहानी सुनाते हुए मध्यस्थता का मूल सिद्धांत समझाया।
उन्होंने कहा कि दोनों बहनें एक ही संतरे पर झगड़ रही थीं। बाद में पता चला कि एक को केवल संतरे का छिलका चाहिए था, जबकि दूसरी को केवल उसका रस।
यदि शुरुआत में उनकी वास्तविक आवश्यकता जान ली जाती, तो विवाद उत्पन्न ही नहीं होता।
उन्होंने कहा, “वाद यह तय करता है कि संतरे का मालिक कौन है, जबकि मध्यस्थता यह जानने का प्रयास करती है कि वास्तव में किसे क्या चाहिए। कई बार समाधान अधिकार तय करने में नहीं, बल्कि वास्तविक आवश्यकता समझने में होता है।”
भारतीय संस्कृति में रची-बसी है मध्यस्थता की परंपरा
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि रामायण, महाभारत और भारतीय इतिहास में संवाद और सहमति के माध्यम से विवादों के समाधान की समृद्ध परंपरा रही है।
उन्होंने कहा कि भारत की न्याय संस्कृति हमेशा टकराव से पहले संवाद और समझौते को महत्व देती रही है।
उन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख करते हुए कहा कि शासन के चार सिद्धांत— साम, दाम, दंड और भेद— में ‘साम’, अर्थात संवाद, समझाइश और सहमति, को सबसे पहले स्थान दिया गया है।
यह दर्शाता है कि भारतीय परंपरा में विवादों का पहला समाधान बातचीत और मध्यस्थता ही माना गया है।
उन्होंने कुल, श्रेणी और गण जैसी प्राचीन भारतीय संस्थाओं का भी उल्लेख किया, जहाँ समुदाय आपसी संवाद और सहमति से विवादों का समाधान करता था।
महात्मा गांधी का भी किया उल्लेख
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि महात्मा गांधी स्वयं मानते थे कि उनके वकालत जीवन के सबसे संतोषजनक क्षण वे थे, जब उन्होंने अदालत में लंबी कानूनी लड़ाई के बजाय पक्षकारों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौता कराया।
उन्होंने कहा कि यह विचार आज भी मध्यस्थता की मूल भावना को मजबूत करता है।

गोपनीयता मध्यस्थता की सबसे बड़ी ताकत
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि मध्यस्थता की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार गोपनीयता (Confidentiality) है। विशेषकर व्यावसायिक और वाणिज्यिक मामलों में यदि पक्षकारों को गोपनीयता का भरोसा नहीं होगा, तो वे खुलकर अपनी बात सामने नहीं रख पाएंगे।
उन्होंने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के ‘मोती राम’ मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायपालिका ने मध्यस्थता में गोपनीयता के सिद्धांत को मजबूत कानूनी संरक्षण प्रदान किया है।
मेडिएशन एक्ट, 2023 बना बड़ा बदलाव
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि मेडिएशन एक्ट, 2023 ने देश में मध्यस्थता को पहली बार व्यापक वैधानिक ढांचा प्रदान किया है।
सुप्रीम कोर्ट की मेडिएशन एंड कंसिलिएशन प्रोजेक्ट कमेटी, विभिन्न हाईकोर्टों, जिला न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में स्थापित मध्यस्थता केंद्रों ने प्रशिक्षित मध्यस्थों का मजबूत नेटवर्क तैयार किया है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के कार्यकारी अध्यक्ष रहते हुए “मेडिएशन फॉर द नेशन” अभियान शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य मध्यस्थता को जनआंदोलन बनाना और आम नागरिक के लिए न्याय तक आसान पहुँच सुनिश्चित करना था।
‘हर विवाद का अंत अदालत में होना जरूरी नहीं’
अपने संबोधन के अंत में सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा,
“कानून का शासन यह नहीं कहता कि हर विवाद का अंत अदालत में ही हो। कानून का वास्तविक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक नागरिक को सस्ता, सम्मानजनक और सार्थक न्याय मिल सके।”
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता न्यायिक व्यवस्था का विकल्प नहीं, बल्कि उसका सशक्त सहयोगी है। यह न केवल अदालतों पर बढ़ते बोझ को कम करती है, बल्कि पक्षकारों के बीच रिश्तों को भी बनाए रखते हुए त्वरित, किफायती और मानवीय न्याय सुनिश्चित करती है।
उन्होंने विश्वास जताया कि मेडिएशन एक्ट, 2023 के प्रभावी क्रियान्वयन और संस्थागत ढांचे के सुदृढ़ होने से भारत में मध्यस्थता आने वाले वर्षों में न्याय प्रणाली का एक मजबूत स्

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