टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

मध्यस्थता आयातित व्यवस्था नहीं, भारत की सदियों पुरानी परंपरा, इसमें सभी पक्षों की जीत : जस्टिस विजय बिश्नोई

Justice Vijay Bishnoi: Mediation Is India's Ancient Tradition, Not an Imported Concept

जयपुर। सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस विजय बिश्नोई ने कहा कि मध्यस्थता (Mediation) भारत के लिए कोई नई अवधारणा नहीं है। यह सदियों से भारतीय समाज और न्याय परंपरा का अभिन्न हिस्सा रही है।

जस्टिस बिश्नोई ने कहा कि आधुनिक कानूनी ढांचे में इसे भले ही हाल के वर्षों में औपचारिक मान्यता मिली हो, लेकिन भारत में गांवों की पंचायतों, समुदाय के बुजुर्गों और पारंपरिक सुलह-सफाई की व्यवस्था के माध्यम से विवादों का समाधान लंबे समय से होता आया है।

जयपुर में आयोजित कॉमनवेल्थ पीस मेडिएशन कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन प्रथम सत्र को संबोधित करते हुए जस्टिस विजय बिश्नोई ने कहा कि आधुनिक मध्यस्थता व्यवस्था कोई विदेशी या आयातित विचार नहीं है, बल्कि भारत की समृद्ध और प्राचीन विवाद समाधान परंपरा का संस्थागत एवं विधिक रूप से विकसित स्वरूप है।

उन्होंने कहा कि संवाद, सहमति और पारस्परिक सम्मान भारतीय समाज की मूल पहचान रहे हैं और यही मूल्य आज भी मध्यस्थता की आत्मा हैं।

‘न्याय तक पहुंच’ ही कानून के शासन की असली कसौटी

जस्टिस विजय बिश्नोई ने कहा कि कानून के शासन (Rule of Law) का अर्थ केवल अधिकारों और दायित्वों का निर्धारण करना नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक तक सुलभ, समयबद्ध और प्रभावी न्याय पहुंचाना भी है।

उन्होंने कहा कि ‘एक्सेस टू जस्टिस’ (Access to Justice) आज कानून के शासन का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है।

उन्होंने कहा कि अदालतों में आने वाला हर मुकदमा केवल एक कानूनी विवाद नहीं होता, बल्कि उसके पीछे ऐसे लोग होते हैं जो न्याय, सम्मान और मानसिक शांति की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

उन्होंने कहा, “न्याय में देरी केवल एक कानूनी अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह उस आम नागरिक की पीड़ा है जो समाधान की उम्मीद लेकर अदालत की चौखट पर पहुंचता है।”

“मुकदमेबाजी में जीत-हार, मध्यस्थता में दोनों की जीत”

मध्यस्थता के महत्व को रेखांकित करते हुए जस्टिस बिश्नोई ने कहा कि पारंपरिक मुकदमेबाजी (Litigation) में अंततः एक पक्ष की जीत और दूसरे की हार होती है, जबकि मध्यस्थता (Mediation) ऐसा समाधान देती है जिसमें दोनों पक्ष सम्मान के साथ विवाद का अंत करते हैं।

उन्होंने कहा,

“Litigation creates a win-lose situation, whereas mediation creates a win-win solution.”

उन्होंने कहा कि मध्यस्थता केवल कानूनी समाधान नहीं देती, बल्कि रिश्तों को भी बचाती है और पक्षकारों के बीच विश्वास एवं सौहार्द को पुनर्स्थापित करती है।

अदालतों का विकल्प नहीं, बल्कि मजबूत सहयोगी है मध्यस्थता

जस्टिस विजय बिश्नोई ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता का उद्देश्य न्यायालयों की भूमिका को कम करना नहीं है।

उन्होंने कहा कि यह न्यायपालिका की सहयोगी व्यवस्था है, जो अदालतों पर बढ़ते बोझ को कम करने के साथ-साथ नागरिकों को किफायती, त्वरित और मानवीय न्याय उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

उन्होंने कहा कि कई बार अदालत में मुकदमा जीतने वाला पक्ष भी मानसिक रूप से संतुष्ट नहीं होता, जबकि मध्यस्थता दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान देकर स्थायी शांति स्थापित करती है।

जयपुर घोषणा-2026 को बताया महत्वपूर्ण पहल

जस्टिस बिश्नोई ने कहा कि सम्मेलन के समापन पर प्रस्तावित ‘जयपुर घोषणा-2026’ (Jaipur Declaration on Peace Mediation 2026) मध्यस्थता को न्याय व्यवस्था, सुशासन और वैश्विक सहयोग के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

उन्होंने कहा कि परिवार, व्यापार, कार्यस्थल, पर्यावरण और अंतरराष्ट्रीय विवादों सहित विभिन्न क्षेत्रों में मध्यस्थता की बढ़ती भूमिका यह साबित करती है कि यह केवल विवाद निपटाने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव और संस्थागत विश्वास को मजबूत करने का प्रभावी साधन भी है।

सबसे अधिक लोकप्रिय