नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने के कानून को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मंजूरी मिल गई है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस समेत जजों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़कर 38 हो गई है।
यानी इस बार सुप्रीम कोर्ट में जजों के 4 नए पद जोड़े गए हैं।
लेकिन हैरानी इस बात की है कि सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के 76 साल बाद भी जजों की स्वीकृत संख्या 8 से बढ़कर सिर्फ 38 हुई है।
1950 में जब सुप्रीम कोर्ट शुरू हुआ था, तब यहां जजों की स्वीकृत संख्या सिर्फ 8 थी। 76 साल बाद अब यह संख्या 38 पहुंची है।
यानी इतने लंबे सफर में स्वीकृत संख्या में कुल 30 जजों का ही इजाफा हुआ।
इसी दौरान देश में आबादी बढ़ी, मुकदमों की संख्या बढ़ी और कोर्टों पर काम का बोझ भी लगातार बढ़ता गया।
देखना होगा कि जजों के 4 नए पद बढ़ने से सुप्रीम कोर्ट में मामलों की सुनवाई और निपटारे की रफ्तार पर कितना असर पड़ता है ?क्या इससे लंबित मामलों की सुनवाई तेज होगी?
आबादी के मुकाबले जजों की संख्या में भी भारत कई बड़े देशों से पीछे है। 2025 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर करीब 15.4 जज थे।
इसके मुकाबले फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में यह अनुपात काफी ज्यादा है।
1950 में 8, अब 38 जज
सुप्रीम कोर्ट की शुरुआत 1950 में हुई थी। उस समय कोर्ट में 8 जजों की स्वीकृत संख्या थी।
इसके बाद समय-समय पर काम बढ़ने के साथ जजों के पद भी बढ़ाए गए।
आंकड़ों के मुताबिक 1956 में यह संख्या 11, 1960 में 14, 1978 में 18 और 1986 में 26 हुई। 2009 में स्वीकृत संख्या 31 और 2019 में 34 पहुंची।
अब 2026 में इसे बढ़ाकर 38 कर दिया गया है।
यानी 1950 से 2026 के बीच 8 से 38 तक पहुंचने में 76 साल लगे और कुल 30 पद बढ़े।
2019 के बाद यह पहली बार है जब सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत जज संख्या बढ़ाई गई है। सरकार ने इस बार 4 पद बढ़ाने का फैसला किया है।
4 पद क्यों बढ़ाने पड़े?
जजों की संख्या बढ़ाने की बड़ी वजह सुप्रीम कोर्ट में बढ़ता काम और लंबित मामले हैं।
सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ सामान्य मामलों की सुनवाई नहीं होती। कई बार बड़े संवैधानिक सवालों पर 5, 7 या उससे ज्यादा जजों की संविधान पीठ बनती है।
जब बड़ी पीठ बैठती है तो उसमें शामिल जज नियमित मामलों की सुनवाई नहीं कर पाते। इससे सामान्य मामलों की सुनवाई पर असर पड़ता है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने भी जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया था। उन्होंने 11 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर स्वीकृत जजों की संख्या बढ़ाने का अनुरोध किया था।
उन्होंने संविधान पीठों की वजह से नियमित मामलों की सुनवाई पर पड़ने वाले असर का भी जिक्र किया था।
पहले अध्यादेश, अब बना कानून
जजों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी। केंद्र सरकार ने मई में अध्यादेश के जरिए चीफ जस्टिस को छोड़कर जजों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी थी। चीफ जस्टिस को जोड़ने पर कुल संख्या 38 हो जाती है।
इसके बाद सरकार ने इसी बदलाव को स्थायी कानून बनाने के लिए संसद में विधेयक पेश किया।
लोकसभा ने 3 अगस्त को इसे मंजूरी दी। इसके बाद राज्यसभा ने भी विधेयक पास कर दिया। अब राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह बदलाव कानून बन गया है।
यानी अध्यादेश से शुरू हुआ बदलाव अब स्थायी कानूनी व्यवस्था बन चुका है।
76 साल में सिर्फ 30 का इजाफा
सुप्रीम कोर्ट की जज संख्या का इतिहास देखें तो बढ़ोतरी बहुत तेज नहीं रही है।
| साल | स्वीकृत जजों की संख्या |
|---|---|
| 1950 | 8 |
| 1956 | 11 |
| 1960 | 14 |
| 1978 | 18 |
| 1986 | 26 |
| 2009 | 31 |
| 2019 | 34 |
| 2026 | 38 |
इस हिसाब से 1950 से 2026 के बीच 30 जज बढ़े।
हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि ये आंकड़े स्वीकृत पदों के हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हर समय इतने ही जज कोर्ट में काम कर रहे थे। कई बार स्वीकृत पद खाली भी रहे हैं।
अब कितने जज नियुक्त होंगे?
नई व्यवस्था के बाद कुल 38 पद मंजूर हैं। अभी सुप्रीम कोर्ट में 32 जज काम कर रहे हैं। इसलिए मौजूदा कार्यरत संख्या और नई स्वीकृत संख्या के बीच 6 पदों की जगह है।
यानी आगे 6 जज नियुक्त किए जा सकते हैं।
लेकिन यहां एक जरूरी अंतर है। कानून ने 6 नए पद नहीं बनाए हैं। नए पद सिर्फ 4 बढ़े हैं। पहले कुल 34 पद मंजूर थे, अब 38 हैं। बाकी 2 पद पहले से मंजूर थे लेकिन खाली थे।
इसलिए नियुक्तियों के बाद ही यह साफ होगा कि नई व्यवस्था का कोर्ट के कामकाज पर कितना असर पड़ता है।
दुनिया के मुकाबले भारत में कितने जज?
भारत में आबादी के मुकाबले जजों की संख्या कई बड़े देशों से कम है।
2025 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रति 10 लाख आबादी पर करीब 15.4 जज थे।
करीब 40 साल पहले, 1987 में विधि आयोग ने अपनी 120वीं रिपोर्ट में प्रति 10 लाख आबादी पर कम से कम 50 जज रखने की सिफारिश की थी।
लेकिन आज भी भारत इस आंकड़े से काफी दूर है।
हालांकि, सिर्फ आबादी के आधार पर जजों की जरूरत तय नहीं की जा सकती।
2014 की विधि आयोग की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि जजों की जरूरत समझने के लिए मामलों की संख्या, अलग-अलग इलाकों में मुकदमों की दर और जजों पर काम के बोझ जैसे दूसरे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।
दूसरे देशों के मुकाबले भारत कहां?
आबादी के मुकाबले जजों की संख्या में भारत कई बड़े देशों से पीछे है। यह तुलना प्रति 10 लाख आबादी पर जजों की संख्या के आधार पर है, सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के जजों की नहीं।
प्रति 10 लाख आबादी पर जजों की संख्या
• फ्रांस: 418.7
• ब्रिटेन: 286.9
• जर्मनी: 249.8
• चीन: 241.8
• रूस: 184.5
• इटली: 119.3
• अमेरिका: 104.6
• ब्राजील: 84.9
• जापान: 30.9
• भारत: 15.4
इन आंकड़ों में भारत सबसे नीचे है। उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय तुलना में भारत का जज-आबादी अनुपात कई बड़े देशों से कम है।
जापान का अनुपात भी भारत से करीब दोगुना है, जबकि फ्रांस जैसे देशों से अंतर काफी बड़ा है।
हालांकि अलग-अलग देशों में जजों की जिम्मेदारियां और काम करने का तरीका अलग हो सकता है।
इसलिए इन आंकड़ों से सीधे यह तय नहीं किया जा सकता कि किस देश में न्याय व्यवस्था बेहतर है। लेकिन इतना जरूर साफ है कि भारत में जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जाती रही है।
4 नए पदों से कम होगा बोझ?
सुप्रीम कोर्ट में 4 नए पद बढ़ना जजों की संख्या बढ़ाने की दिशा में अहम कदम है। बड़ी संविधान पीठ बनने पर भी नियमित मामलों की सुनवाई के लिए ज्यादा जज मिल सकेंगे।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट में 95 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। ऐसे में सिर्फ 4 नए पद बढ़ने से लंबित मामलों का पूरा बोझ तुरंत खत्म होने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
नए पदों पर नियुक्तियां होने के साथ पहले से खाली पद भरना भी जरूरी होगा।
इसके अलावा मामलों की सुनवाई का तरीका और कोर्ट में जरूरी सुविधाएं भी निपटारे की रफ्तार पर असर डालती हैं।
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद सुप्रीम कोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या अब 38 हो गई है।
अब इन पदों पर नियुक्तियां होने के बाद ही पता चलेगा कि जजों की बढ़ी संख्या से मामलों के निपटारे की रफ्तार कितनी तेज होती है।