टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

आस्था से नहीं मिलता जमीन पर कब्जे का हक, हिंसा रोकने के लिए रिसीवर नियुक्ति सही-गोलूवाला गुरुद्वारा प्रबंधन विवाद पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan High Court Quashes Rajasthan High Court Verdict on Goluwala Gurudwara Dispute: Faith Does Not Confer Property RightsCriminal Proceedings Against Hindustan Zinc Ex-Vice President in 2005 Gas Leak Case

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने हनुमानगढ़ जिले के गोलूवाला स्थित गुरुद्वारा मेहताबगढ़ साहिब के प्रबंधन और कब्जे को लेकर चल रहे विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि धार्मिक आस्था, लंबे समय तक सेवा और प्रबंधन संभालना किसी व्यक्ति को धार्मिक स्थल की जमीन का मालिक या उस पर अन्य कानूनी कब्जे का अधिकार नहीं देता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले के जरिए स्पष्ट किया है कि धार्मिक आस्था और संपत्ति का कानूनी अधिकार एक ही चीज नहीं हैं।

किसी धार्मिक स्थल से वर्षों का जुड़ाव, सेवा, श्रद्धा या प्रबंधन की जिम्मेदारी व्यक्ति के धार्मिक संबंध को साबित कर सकती है, लेकिन बिना वैध कानूनी आधार के वही जुड़ाव जमीन के स्वामित्व या अनन्य कब्जे का अधिकार नहीं बन जाता।

और जब धार्मिक स्थल को लेकर विवाद हथियारों, हिंसा और सार्वजनिक शांति के खतरे तक पहुंच जाए, तो प्रशासन का पहला दायित्व किसी पक्ष को विजेता घोषित करना नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था और शांति की रक्षा करना है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने हरमीत कौर उर्फ बीबी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह फैसला दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि “Faith is sacred but Possession is a question of law”

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने 3 अक्टूबर 2025 को एसडीएम पीलीबंगा द्वारा गुरुद्वारा परिसर को अटैच करने और थाना प्रभारी को रिसीवर नियुक्त करने के आदेश तथा 18 नवंबर 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्रम संख्या-2, हनुमानगढ़ द्वारा उस आदेश को बरकरार रखने के फैसले की पुष्टि करने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट की सबसे अहम टिप्पणी

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने अपने फैसले में आस्था और संपत्ति के कानूनी अधिकार के बीच स्पष्ट रेखा साफ करते हुए कहा कि गुरुद्वारा केवल जमीन या भवन नहीं है। वह धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र है, जहां गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्र उपस्थिति, दर्शन, पाठ, कीर्तन, अरदास, सेवा और लंगर जैसी गतिविधियां उसके धार्मिक स्वरूप को निर्धारित करती हैं।

लेकिन किसी व्यक्ति का किसी गुरुद्वारे में दशकों तक आना, वहां सेवा करना या लंबे समय तक प्रबंधन से जुड़ा रहना अपने आप उसे उस जमीन का मालिक या अनन्य कानूनी कब्जेदार नहीं बना देता।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि धार्मिक जुड़ाव और संपत्ति पर कानूनी प्रभुत्व दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से जहां वरिष्ठ अधिवक्ता विकास बालिया, नितीन गोकलानी ने पैरवी की.

वही

याचिकाकर्ता हरमीत कौर की ओर से क्या दलील दी गई?

याचिकाकर्ता की ओर से मुख्य तर्क यह था कि 3 अक्टूबर 2025 को एसडीएम पीलीबंगा द्वारा गुरुद्वारा परिसर को अटैच करने और थाना प्रभारी को रिसीवर नियुक्त करने का आदेश कानून के अनुसार उचित नहीं था।

याचिकाकर्ता ने इस आदेश के खिलाफ आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी, जिसे 18 नवंबर 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्रम संख्या-2, हनुमानगढ़ ने खारिज कर दिया था। इसके बाद हाईकोर्ट में वर्तमान आपराधिक विविध याचिका दाखिल की गई।

याचिका में मुख्य दलीलें

एसडीएम और सत्र न्यायालय के आदेश यांत्रिक और रिकॉर्ड के विपरीत, याचिकाकर्ता का कब्जा और मुख्य सेवादार होना खुद SHO की शिकायत से स्पष्ट, विवाद जमीन का नहीं, केवल गुरुद्वारे के प्रबंधन का था

कब्जे को लेकर कोई अनिश्चितता नहीं थी

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि गुरुद्वारे पर किसका कब्जा है, इसको लेकर कोई वास्तविक अनिश्चितता नहीं थी।

उनका दावा था कि याचिकाकर्ता लंबे समय से गुरुद्वारे का प्रबंधन कर रही थीं और उनका कब्जा रिकॉर्ड में स्पष्ट था। ऐसे में रिसीवर नियुक्त करने की जरूरत नहीं थी।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि ऐसी कोई आपात स्थिति (emergent situation) नहीं थी जिसके कारण गुरुद्वारा परिसर को अटैच करने और रिसीवर नियुक्त करने की आवश्यकता पड़ती।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि गुरुद्वारे को लेकर स्थानीय निवासियों के साथ व्यापक विवाद होने का जो दावा किया गया, उसके समर्थन में रिकॉर्ड पर पर्याप्त सामग्री नहीं थी।

याचिकाकर्ता की ओर से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की ओर से जारी संचार/पत्र पर भी भरोसा किया गया।

इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि याचिकाकर्ता की गुरुद्वारे के प्रबंधन से जुड़ी स्थिति और उनके कब्जे को गंभीरता से देखा जाना चाहिए।

राज्य सरकार यानी प्रतिवादी का पूरा पक्ष

राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेन्द्रसिंह और अधिवक्ता प्रियंका बोराणा ने पैरवी करते हुए कहा कि विवाद 3 सितंबर 2025 से शुरू हुआ था। इसके बाद थाना प्रभारी ने लगातार स्थिति की निगरानी की और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई।

राज्य के अनुसार 3 अक्टूबर 2025 को दो FIR दर्ज होने के बाद थाना प्रभारी ने एसडीएम पीलीबंगा के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की।

एसडीएम ने उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए 3 अक्टूबर 2025 को गुरुद्वारा परिसर अटैच करने और रिसीवर नियुक्त करने का आदेश पारित किया।

राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि विवाद से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखे गए हैं।

राज्य के पक्ष का मूल आधार यह था कि विवाद को केवल गुरुद्वारे के प्रबंधन का सामान्य विवाद मानकर नहीं देखा जा सकता।

रिकॉर्ड के अनुसार क्षेत्र में कई महीनों से तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई थी और पिछले दो-तीन महीनों में लगभग हर दिन विवाद से जुड़ी कोई न कोई घटना सामने आने की बात रिकॉर्ड में थी।

राज्य के रिकॉर्ड के अनुसार 3 अक्टूबर 2025 को एक बड़ा समूह कथित रूप से लाठी, तलवार, गंडासी और भालों से लैस होकर गुरुद्वारे में प्रवेश करने का प्रयास कर रहा था।

पुलिस के अनुसार भीड़ को रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन लोगों ने कथित रूप से चारदीवारी पार कर गुरुद्वारे में प्रवेश करने का प्रयास किया।

2016 से मुख्य सेवादार होने का दावा, फिर भी जमीन पर मालिकाना हक नहीं

याचिकाकर्ता हरमीत कौर का दावा था कि वह 2016 से गुरुद्वारा मेहताबगढ़ साहिब की मुख्य सेवादार हैं और गुरुद्वारे के प्रबंधन तथा रोजमर्रा के कामकाज को संभालती रही हैं।

याचिकाकर्ता का यह भी दावा था कि उनकी नियुक्ति शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) द्वारा की गई थी।

लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही यह मान लिया जाए कि एसजीपीसी ने उन्हें प्रबंधन के लिए नियुक्त किया था, तब भी ऐसी नियुक्ति से जमीन या भवन पर मालिकाना हक स्वतः पैदा नहीं होता।

अदालत के सामने ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान, टाइटल दस्तावेज, सरकारी अनुदान, हस्तांतरण, विरासत, अधिग्रहण या अन्य कानूनी आधार पेश नहीं किया गया, जिससे संबंधित जमीन पर एसजीपीसी का स्वामित्व या प्रभुत्व स्थापित हो सके।

मैनेजमेंट अलग, मालिकाना हक अलग

हाईकोर्ट ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी संपत्ति का मैनेजमेंट अलग और मालिकाना हक अलग-अलग होता है।

कोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी धार्मिक संस्था का प्रबंधन संभालना और उस संस्था की जमीन का मालिक होना एक ही बात नहीं है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की लंबे समय तक मौजूदगी, धार्मिक जुड़ाव, सेवा या प्रबंधन को जमीन पर मालिकाना या दूसरों को बाहर रखने के पूर्ण अधिकार के बराबर नहीं माना जा सकता।

हर गुरुद्वारे का प्रबंधन SGPC के अधीन होना जरूरी नहीं

फैसले में हाईकोर्ट ने गुरुद्वारों के प्रशासन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया।

अदालत ने यह जानना चाहा कि क्या राजस्थान में कोई कानून, नियम, स्थापित परंपरा या प्रथा है जिसके तहत हर गुरुद्वारे का प्रबंधन अनिवार्य रूप से SGPC द्वारा गठित समिति के माध्यम से ही किया जाना चाहिए।

अदालत के समक्ष ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान या सार्वभौमिक परंपरा प्रस्तुत नहीं की जा सकी।

कोर्ट ने इस मुद्दे पर सिख समुदाय से जुड़े अधिवक्ताओं की सहायता भी ली।

सामने आया कि कई स्थानों पर गुरुद्वारे स्थानीय श्रद्धालुओं और सिख समुदाय के सदस्यों के योगदान से स्थापित होते हैं और उनका दैनिक प्रबंधन स्थानीय स्तर पर गठित समिति करती है।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ऐसा कोई सार्वभौमिक नियम सामने नहीं आया जिससे यह माना जाए कि हर गुरुद्वारे का प्रबंधन अनिवार्य रूप से SGPC के केंद्रीय नियंत्रण में होना चाहिए।

गुरुद्वारे में प्रवेश का सवाल भी निजी संपत्ति जैसा नहीं

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में धार्मिक स्थल और निजी संपत्ति के बीच अंतर को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि निजी संपत्ति में किसी तीसरे व्यक्ति का प्रवेश सामान्यतः मालिक की अनुमति पर निर्भर करता है। लेकिन धार्मिक स्थल की प्रकृति अलग है।

कानूनन निर्धारित समय या समान रूप से लागू प्रतिबंधों को छोड़कर, धार्मिक स्थल सामान्यतः लोगों की धार्मिक आस्था और उपासना के लिए खुले होते हैं।

किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर प्रवेश से नहीं रोका जा सकता कि वह अलग धर्म या आस्था से संबंधित है अथवा उसने किसी विशेष व्यक्ति से व्यक्तिगत अनुमति नहीं ली है।

50-60 हथियारबंद लोगों के पहुंचने से बिगड़ा था मामला

विवाद ने गंभीर रूप तब लिया जब 3 अक्टूबर 2025 को करीब 50-60 लोगों की भीड़ कथित तौर पर लाठी, तलवार, गंडासी और भालों से लैस होकर गुरुद्वारे के पिछले गेट तक पहुंची।

एफआईआर के अनुसार पुलिस द्वारा रोकने के बावजूद भीड़ के लोगों ने कथित तौर पर सीमा दीवार पार कर गुरुद्वारा परिसर में घुसने का प्रयास किया।

पुलिसकर्मियों के साथ बल प्रयोग और सरकारी कार्य में बाधा डालने के भी आरोप लगाए गए।

इसी घटना में दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज हुईं।

FIR No. 243/2025 एएसआई विजय सिंह की रिपोर्ट पर दर्ज हुई, जबकि FIR No. 244/2025 याचिकाकर्ता की रिपोर्ट पर दर्ज हुई।

दोनों ही एफआईआर घटना से संबंधित थीं, लेकिन घटनाक्रम के अलग-अलग पक्ष सामने आए। हाईकोर्ट ने कहा कि एक ही घटना की दो प्रतिस्पर्धी एफआईआर अपने आप में विवाद की गंभीरता और संवेदनशीलता दर्शाती हैं।

पिछले कई महीनों से तनाव, लगभग रोजाना सामने आ रहे थे विवाद

हाईकोर्ट ने पाया कि यह सिर्फ गुरुद्वारे के प्रबंधन का शांतिपूर्ण विवाद नहीं था।

राज्य की ओर से प्रस्तुत सामग्री के अनुसार क्षेत्र में पिछले कई महीनों से स्थिति तनावपूर्ण थी और पिछले दो-तीन महीनों में लगभग हर दिन विवाद से जुड़ी कोई न कोई घटना सामने आने की बात कही गई।

हाईकोर्ट ने माना कि जब प्रतिद्वंद्वी समूह लगातार आमने-सामने हों, हथियारों के इस्तेमाल के आरोप हों, पुलिस को रोका जा रहा हो और धार्मिक परिसर में जबरन प्रवेश के प्रयास हो रहे हों, तब प्रशासन केवल इस आधार पर मूकदर्शक नहीं बना रह सकता कि एक पक्ष पहले से परिसर में मौजूद था।

संपत्ति का अंतिम फैसला नहीं, शांति बचाना मकसद

हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 164 और 165 के दायरे को भी स्पष्ट किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि इन धाराओं के तहत कार्यवाही का उद्देश्य मालिकाना हक या स्थायी अधिकार का अंतिम फैसला करना नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति में शांति बनाए रखना है जहां संपत्ति को लेकर विवाद से शांति भंग होने का वास्तविक खतरा हो।

साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अस्पष्ट या सामान्य आरोपों के आधार पर ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती। तत्काल खतरे या शांति भंग की आशंका के समर्थन में विश्वसनीय, ठोस और मजबूत सामग्री होनी चाहिए।

“Preventive jurisdiction का उद्देश्य विजेता घोषित करना नहीं”

याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि वह पहले से गुरुद्वारे का प्रबंधन और कब्जा संभाल रही थीं, इसलिए प्रशासन उन्हें हटाकर रिसीवर नियुक्त नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने इस तर्क को मौजूदा परिस्थितियों में स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि प्रतिद्वंद्वी समूह लगातार टकरा रहे हों, हथियार लेकर आ रहे हों, पुलिसकर्मियों को बाधित किया जा रहा हो और धार्मिक परिसर में जबरन प्रवेश की कोशिश हो रही हो, तो प्रशासन केवल इसलिए चुप नहीं रह सकता कि एक पक्ष पहले से कब्जे में होने का दावा कर रहा है।

निवारक अधिकार क्षेत्र का उद्देश्य ही ऐसी स्थिति को रोकना है। इसका लक्ष्य किसी पक्ष को विजेता घोषित करना नहीं, बल्कि शांति बनाए रखना है।

रिसीवर नियुक्त करना हाईकोर्ट ने माना उचित

हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में स्थिति सामान्य प्रबंधन विवाद से आगे निकल चुकी थी। रिकॉर्ड में बार-बार टकराव, जबरन प्रवेश के आरोप, हथियारों का इस्तेमाल और शारीरिक झड़प जैसे तथ्य सामने आए।

ऐसे हालात में प्रशासन का प्राथमिक उद्देश्य किसी एक पक्ष को अधिकार देना नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के बीच टकराव को रोकना और आगे की हिंसा की आशंका को समाप्त करना था।

कोर्ट ने माना कि परिस्थितियों को देखते हुए रिसीवर नियुक्त करने की कार्रवाई मनमानी, अवैध या अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं थी। यह तत्काल और वास्तविक आवश्यकता के तहत आगे के टकराव को रोकने के लिए की गई निवारक कार्रवाई थी।

हाईकोर्ट ने स्वामित्व का फैसला नहीं किया-यह सबसे अहम बात

फैसले का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने गुरुद्वारे या जमीन के मालिकाना हक पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके सामने विचार का प्रश्न केवल निवारक कार्यवाही तक सीमित था। गुरुद्वारे अथवा उससे जुड़ी जमीन के टाइटल, स्वामित्व, स्थायी प्रबंधन या अंतिम अधिकार का निर्धारण इस फैसले से नहीं हुआ है। संबंधित पक्ष अपने मूल अधिकारों के लिए सक्षम न्यायिक मंच के सामने जा सकते हैं।

अब पुलिस को नए सिरे से करनी होगी कानून-व्यवस्था की समीक्षा

हाईकोर्ट ने वर्तमान थाना प्रभारी, गोलूवाला को क्षेत्र की मौजूदा कानून-व्यवस्था की स्थिति का नए सिरे से आकलन कर रिपोर्ट एसपी हनुमानगढ़ को देने का निर्देश दिया है।

एसपी को वर्तमान परिस्थितियों, शांति भंग की संभावना और आवश्यक कदमों पर नई रिपोर्ट प्राप्त कर उसका परीक्षण करने तथा सक्षम अधिकारी के समक्ष रखने को कहा गया है। अदालत ने वर्तमान थाना प्रभारी को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से कानून के अनुसार काम करने को कहा है।

याचिका खारिज, दोनों निचली अदालतों के आदेश बरकरार

जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने हरमीत कौर की याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने 3 अक्टूबर 2025 का SDM पीलीबंगा का आदेश बरकरार रखा, जिसमें गुरुद्वारा परिसर की अटैचमेंट और रिसीवर नियुक्ति को परिस्थितियों में उचित माना है।

साथ ही 18 नवंबर 2025 का अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्रम संख्या-2, हनुमानगढ़ का आदेश कायम रखा गया है।

लेकिन हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इस फैसले से गुरुद्वारे या जमीन के स्वामित्व अथवा स्थायी प्रबंधन का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ है।

सबसे अधिक लोकप्रिय