नई दिल्ली। बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI के PEARL-FIRST Trust को लेकर विवाद एक बार फिर सामने आया है।
BCI चेयरमैन मनन मिश्रा ने ट्रस्ट में परमानेंट मैनेजिंग ट्रस्टी की व्यवस्था खत्म करने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन अब BCI के तीन सदस्यों ने इस प्रस्ताव पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
इन सदस्यों का कहना है कि पहले यह साफ होना चाहिए कि 2020 के ट्रस्ट डीड में परमानेंट मैनेजिंग ट्रस्टी की व्यवस्था लाई ही क्यों गई थी और इसे किस प्रक्रिया से मंजूरी मिली थी। इसके लिए उन्होंने पूरी Tट्रस्ट डीड और उससे जुड़े दस्तावेजों की जांच की मांग की है।
यह विवाद तब और बढ़ गया जब 2 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने भी पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट की इसी व्यवस्था पर सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि जब BCI एक इलेक्टेड स्टैच्यूटरी बॉडी है, तो उसके पदाधिकारी BCI में अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद भी ट्रस्ट में परमानेंट ट्रस्टी कैसे बने रह सकते हैं।
अब सीनियर एडवोकेट वाईआर सदाशिव रेड्डी, एडवोकेट श्रीनाथ त्रिपाठी और एडवोकेट एन मनोज कुमार ने BCI चेयरमैन और सदस्यों को पत्र भेजा।
इसमें उन्होंने ट्रस्ट की पूरी लीगल और फाइनेंशियल व्यवस्था की जांच की मांग की है। तीनों ने AIBE से मिलने वाली फीस, BCI और ट्रस्ट के बीच पैसों के लेनदेन और लीगल एजुकेशन से जुड़े खर्चों की जानकारी भी मांगी है।
पहले समझिए पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट क्या है?
PEARL-FIRST का पूरा नाम है- Promotion of Education (Legal and Professional) and Reforms in Law and Improvement of Research and Social Training। आसान भाषा में कहें तो यह ट्रस्ट लीगल एजुकेशन, प्रोफेशनल ट्रेनिंग, रिसर्च और कानून से जुड़े दूसरे कामों के लिए बनाया गया है।
अभी विवाद ट्रस्ट के इन कामों को लेकर नहीं, बल्कि इसे चलाने की व्यवस्था यानी गवर्नेंस को लेकर है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि BCI के किसी पदाधिकारी का BCI में कार्यकाल खत्म होने के बाद भी क्या वह पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट में ट्रस्टी बना रह सकता है? इसी व्यवस्था में परमानेंट ट्रस्टी बनाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाया था।
2 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाया था
इस पूरे विवाद को समझने के लिए 2 सितंबर की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई अहम है।
BCI चेयरमैन मनन मिश्रा के BCI में बने रहने और BCI के कामकाज से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट का मुद्दा भी कोर्ट के सामने आया था। कोर्ट ने ट्रस्ट डीड में मौजूद उस व्यवस्था पर सवाल उठाया था जिसके तहत BCI के मौजूदा पदाधिकारी BCI में अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद भी परमानेंट ट्रस्टी बने रह सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का सवाल सीधा था कि जब BCI एक इलेक्टेड स्टैच्यूटरी बॉडी है, तो उसके पदाधिकारी BCI में अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद भी ट्रस्ट में ट्रस्टी के तौर पर कैसे बने रह सकते हैं?
यानी विवाद सिर्फ ट्रस्ट बनाने तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि BCI में किसी पदाधिकारी का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी ट्रस्ट में उसकी भूमिका कैसे जारी रह सकती है।
मनन मिश्रा के प्रस्ताव में क्या बदलने की बात कही गई?
सुप्रीम कोर्ट के इन सवालों के कुछ दिन बाद BCI चेयरमैन मनन मिश्रा ने BCI के आधिकारिक व्हाट्सऐप ग्रुप में एक प्रस्ताव रखा था। जिसमें परमानेंट मैनेजिंग ट्रस्टी की व्यवस्था खत्म करने की बात कही गई थी।
जो लोग उस समय BCI के सदस्य हैं, वही ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी रहें। जैसे ही किसी व्यक्ति की BCI सदस्यता खत्म होगी, ट्रस्ट में मैनेजिंग ट्रस्टी के तौर पर उसकी भूमिका भी खत्म हो जाएगी। यानी BCI में सदस्यता खत्म होते ही ट्रस्ट में मैनेजिंग ट्रस्टी का पद भी खत्म हो जाएगा।
लेकिन तीन BCI सदस्यों ने इस पर भी सवाल उठा दिया है। उनका कहना है कि सिर्फ परमानेंट मैनेजिंग ट्रस्टी की व्यवस्था हटाना काफी नहीं है। पहले यह भी सामने आना चाहिए कि 2020 की ट्रस्ट डीड में यह व्यवस्था आई कैसे और इसे मंजूरी किस तरह दी गई थी।
तीन BCI सदस्यों ने कहा- पहले पूरी ट्रस्ट डीड सामने आए
तीनों सदस्यों ने 19 सितंबर के पत्र में कहा कि बार-बार मांगने के बावजूद उन्हें पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट की पूरी ट्रस्ट डीड नहीं दी गई।
उन्होंने 17 सितंबर 2020 को रजिस्टर्ड हुई ट्रस्ट डीड की पूरी जांच की मांग की है। वे यह भी जानना चाहते हैं कि 2020 में ट्रस्ट को लेकर BCI जनरल काउंसिल की बैठक में क्या प्रस्ताव रखा गया था, सदस्यों के सामने कौन-कौन से कागज रखे गए थे और आखिर ट्रस्ट डीड को मंजूरी और रजिस्टर कैसे किया गया।
तीनों सदस्यों ने यह भी सवाल उठाया है कि अगर BCI के किसी काम से पैसा मिलता है, तो क्या उस पैसे को ट्रस्ट से जोड़ा या ट्रस्ट में ट्रांसफर किया जा सकता है? उनका कहना है कि पहले यह साफ होना चाहिए कि BCI को ऐसा करने की अनुमति थी या नहीं।
इसी तरह उनका कहना है कि परमानेंट ट्रस्टी की व्यवस्था हटाने से पहले यह भी देखा जाना चाहिए कि 2020 में यह व्यवस्था ट्रस्ट डीड में शामिल कैसे हुई और इसे मंजूरी किसने और किस प्रक्रिया के तहत दी।
1974 के पुराने ट्रस्ट और पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट की व्यवस्था पर भी सवाल
तीनों BCI सदस्यों ने 2020 के पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट की व्यवस्था की तुलना BCI के 1974 में बनाए गए पुराने ट्रस्ट से भी की है।
1974 वाले ट्रस्ट में ट्रस्टी बनने के लिए BCI का सदस्य होना जरूरी था। किसी व्यक्ति की BCI सदस्यता खत्म होते ही ट्रस्ट में उसकी ट्रस्टी की भूमिका भी खत्म हो जाती थी। इस ट्रस्ट पर BCI का कंट्रोल और निगरानी भी रहती थी।
सदस्यों का कहना है कि 2020 के पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट में व्यवस्था अलग है। इसमें मूल मैनेजिंग ट्रस्टी BCI में अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद भी ट्रस्टी बने रह सकते हैं।
यही फर्क अब पूरे विवाद का अहम हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी सवाल पर गौर किया है और BCI के तीन सदस्यों ने भी इसी व्यवस्था की जांच की मांग की है।
लीगल एजुकेशन से जुड़े कामों की भी जांच की मांग
तीनों BCI सदस्यों ने ट्रस्ट से जुड़े लीगल एजुकेशन सेंटर्स और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल एजुकेशन एंड रिसर्च यानी IIULER के कामकाज की जानकारी भी मांगी है।
उन्होंने इनसे जुड़े नियुक्तियों के रिकॉर्ड, आवेदन, सेलेक्शन प्रोसेस, सेलेक्शन कमेटी की कार्यवाही, नियुक्ति आदेश और रेम्यूनरेशन की जानकारी देने की मांग की है।
इसके अलावा, पत्र में जिन लीगल एजुकेशन सेंटर्स को लेकर डोनेशन से जुड़े सवाल उठाए गए हैं, उनकी जानकारी भी मांगी गई है।
हालांकि, यहां यह साफ रखना जरूरी है कि ये BCI के तीन सदस्यों की ओर से उठाए गए सवाल और जांच की मांग हैं। इन्हें अभी साबित तथ्य के तौर पर नहीं लिखा जा सकता।
AIBE की फीस और पैसों का हिसाब भी मांगा
तीनों BCI सदस्यों ने ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन यानी AIBE से जुड़ी फाइनेंस डिटेल भी मांगी है। वे जानना चाहते हैं कि AIBE से कितनी फीस मिली, पैसा कहां गया और BCI के रिकॉर्ड में उसका हिसाब कैसे रखा गया।
उन्होंने यह भी पूछा है कि AIBE से मिली कोई रकम पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट को दी गई थी या नहीं। अगर दी गई थी, तो किस आधार पर और उसका इस्तेमाल किस काम में हुआ।
ट्रस्ट की व्यवस्था के साथ पैसों पर भी उठे सवाल
तीनों BCI सदस्यों ने पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट की ट्रस्ट डीड, बैंक रिकॉर्ड, फाइनेंशियल लेजर, रिजॉल्यूशन, नियुक्तियों और लीगल एजुकेशन से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग की है। साथ ही ट्रस्ट के कामकाज की स्वतंत्र लीगल और फॉरेंसिक जांच की मांग भी की है।
उन्होंने BCI जनरल काउंसिल से 2019 के बाद ट्रस्ट से जुड़े लीगल और फाइनेंशियल रिकॉर्ड की जांच करने को कहा है, ताकि यह साफ हो सके कि ट्रस्ट से जुड़े फैसले BCI के अधिकारों के दायरे में लिए गए थे या नहीं।
यानी मामला अब सिर्फ परमानेंट मैनेजिंग ट्रस्टी की व्यवस्था हटाने तक सीमित नहीं है। मनन मिश्रा इसे हटाने का प्रस्ताव दे चुके हैं, जबकि तीनों सदस्य चाहते हैं कि पहले ट्रस्ट कैसे बना, 2020 की ट्रस्ट डीड कैसे मंजूर हुई और ट्रस्ट से जुड़े पैसों का लेनदेन कैसे हुआ, इसकी पूरी जानकारी सामने आए।
2 सितंबर के सुप्रीम कोर्ट के सवाल के बाद अब विवाद ट्रस्ट की गवर्नेंस के साथ-साथ BCI और ट्रस्ट के बीच संबंध और AIBE से जुड़े पैसों तक पहुंच गया है।
