नई दिल्ली। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी NGT की दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में पर्यावरण और जलवायु बदलाव से जुड़ी कई अहम चुनौतियों पर चर्चा के साथ ही कॉन्फ्रेंस का समापन हो गया।
कॉन्फ्रेंस के समापन सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने भी पर्यावरण से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर बात रखी।
राष्ट्रपति ने जलवायु बदलाव से निपटने में स्थानीय समुदायों की भूमिका पर जोर दिया, तो वहीं जस्टिस नागरत्ना ने प्रकृति के हित को भी पर्यावरण से जुड़े फैसलों में शामिल करने की बात कही। उन्होंने इंसान-केंद्रित सोच से प्रकृति-केंद्रित यानी इकोसेंट्रिक सोच की ओर बढ़ने की बात कही।
यह कॉन्फ्रेंस 19 और 20 सितंबर को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित हुई। जिसका विषय था- ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’। इसमें पर्यावरण कानून, जलवायु बदलाव, जैव विविधता, जंगलों और पर्यावरण से जुड़े मामलों में बेहतर गवर्नेंस पर चर्चा हुई।
समापन सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शिरकत की। केंद्रीय आवास और शहरी मामलों तथा बिजली मंत्री मनोहर लाल, सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना, NGT चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी इस दौरान मौजूद रहे।
कॉन्फ्रेंस में 17 देशों के विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा
NGT का यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 19 सितंबर 2026 को शुरू हुआ था। इसमें 17 देशों के जज, प्रोफेसर, नीति बनाने वाले, वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ शामिल हुए।
सम्मेलन में पर्यावरण और जलवायु से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों, साझा प्राकृतिक संसाधनों, सीमा पार सहयोग, वन संरक्षण, जैव विविधता और तकनीक आधारित निगरानी पर चर्चा हुई।
समापन सत्र में NGT की पर्यावरण से जुड़ी यात्रा पर आधारित ‘हरित न्यायम्’ स्मारिका भी जारी की गई।
सम्मेलन में पर्यावरण की बेहतर व्यवस्था, जलवायु न्याय और अलग-अलग संस्थाओं के बीच सहयोग पर जोर दिया गया। साथ ही पर्यावरण से जुड़े फैसलों और वादों को जमीन पर लागू करने की जरूरत बताई गई।
पारंपरिक ज्ञान को साथ लेना जरूरी-राष्ट्रपति मुर्मू
समापन सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने स्थानीय समुदायों को साथ लेने पर जोर दिया। उन्होंने पारंपरिक समुदायों के पुराने अनुभव और ज्ञान का भी जिक्र किया।
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि जलवायु बदलाव का असर सिर्फ मौसम पर नहीं, बल्कि पानी, जमीन, स्वास्थ्य और लोगों की रोजी-रोटी पर भी पड़ता है। इससे निपटने के लिए स्थानीय लोगों के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को साथ लेना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण और वनवासी समाज, छोटे किसान और महिलाएं जलवायु बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं से ज्यादा प्रभावित होते हैं। इसलिए जलवायु से जुड़ी योजनाओं में उनकी जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए।
राष्ट्रपति ने कहा कि स्थानीय लोग प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर रहते आए हैं। उनके अनुभव से जलवायु बदलाव से निपटने में मदद मिल सकती है। साथ ही स्थानीय अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को साथ लेकर जलवायु बदलाव से निपटने की तैयारी को और मजबूत किया जा सकता है।
प्रकृति के हित को भी फैसलों में जगह मिलनी चाहिए-जस्टिस नागरत्ना
इस दौरान सत्र को संबोधित करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने आने वाली पीढ़ियों के हितों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय समस्याओं का असर अलग-अलग समुदायों और पीढ़ियों पर अलग-अलग तरीके से पड़ता है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण से जुड़े मामलों में सिर्फ इंसानों की जरूरतों को देखना काफी नहीं है। प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के हितों का भी ध्यान रखना जरूरी है।
उन्होंने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण से जुड़े मामलों में इंसान-केंद्रित सोच से प्रकृति-केंद्रित सोच की ओर बढ़ रहा है। यानी पर्यावरण से जुड़े फैसलों में प्रकृति के हित को भी महत्व दिया जा रहा है।
जस्टिस नागरत्ना ने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए मजबूत संस्थाओं, नियमों के सही पालन, पारदर्शिता और जवाबदेही को जरूरी बताया। साथ ही कहा कि लोगों के लिए न्याय तक पहुंच भी आसान होनी चाहिए।
‘पर्यावरण की समस्या किसी एक देश तक सीमित नहीं’
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जलवायु बदलाव, प्रदूषण, जैव विविधता को नुकसान और पानी की कमी जैसी समस्याएं एक-दूसरे से जुड़ी हैं। इनका असर सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं रहता।
उन्होंने कहा कि ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए अलग-अलग देशों के बीच सहयोग जरूरी है। इसके साथ ही जानकारी साझा करने और मिलकर जिम्मेदारी निभाने की जरूरत है।
NGT चेयरपर्सन ने कानून को बदलने पर दिया जोर
इस दौरान NGT चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव ने कानूनों को समय के मुताबिक बदलने की बात कही।
NGT चेयरपर्सन ने कहा कि सिर्फ पर्यावरण की समस्याओं की पहचान करना काफी नहीं है। ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए मजबूत कानून, संस्थाएं और आपसी सहयोग जरूरी है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण कानून को समय के साथ बदलती जरूरतों के हिसाब से बदलना होगा। इसमें टेक्नोलॉजी, नए तरीके और टिकाऊ फाइनेंस को शामिल करना जरूरी है, ताकि पर्यावरण की सुरक्षा के साथ कमजोर समुदायों के हित भी सुरक्षित रहें।
कॉन्फ्रेंस में जंगल और पर्यावरण कानून पर भी चर्चा
NGT की इस कॉन्फ्रेंस में 17 देशों के प्रतिनिधियों के साथ संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और एशियाई विकास बैंक के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया।
कॉन्फ्रेंस के दौरान पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों और देशों के बीच सहयोग के साथ जंगलों के संरक्षण और उन्हें फिर से विकसित करने पर भी चर्चा हुई। इसमें जंगलों की गवर्नेंस, स्थानीय लोगों की भागीदारी, जैव विविधता और पर्यावरण की निगरानी में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर बात हुई।
कॉन्फ्रेंस में पर्यावरण की बेहतर गवर्नेंस, जलवायु न्याय और अलग-अलग संस्थाओं के बीच सहयोग पर जोर दिया गया। साथ ही, पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों पर सिर्फ चर्चा नहीं, बल्कि जमीन पर काम करने की जरूरत बताई गई।
