राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए समझाया सरकार के धर्मांतरण फैसले को
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने श्रीगंगानगर जिले के श्रीकरणपुर थाने में दर्ज कथित अवैध धर्मांतरण के मामले में आरोपी बलजिंदर सिंह खोसा, राजेश कुमार कांबोज और एम.एस. मैथ्यू की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी है।
जस्टिस अशोक कुमार जैन ने रिपोर्टेबल फैसले के जरिए दिए इस आदेश में कहा कि संज्ञान लेने के स्तर पर अदालत को यह देखना होता है कि पुलिस रिपोर्ट और जांच के दौरान एकत्र सामग्री से प्रथमदृष्टया अपराध बनता है या नहीं।
वर्तमान मामले में अदालत ने माना कि पुलिस की ओर से पेश सामग्री में प्रथमदृष्टया मामला आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है।
हाईकोर्ट ने साथ ही संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता, धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने के अधिकार तथा राज्य द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर लगाए जा सकने वाले वैधानिक प्रतिबंधों की विस्तृत व्याख्या की।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक तरफ अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्ति की अपनी आस्था चुनने के अधिकार को रेखांकित किया, वहीं यह भी स्पष्ट किया कि यह स्वतंत्रता कानून में निर्धारित सीमाओं के अधीन है।
हाईकोर्ट ने राजस्थान के 2025 के धर्मांतरण कानून को इस मामले में लागू मानते हुए कहा कि पुलिस की जांच और आरोप-पत्र में प्रथमदृष्टया अपराध की सामग्री मौजूद है।
हालांकि अदालत ने इस स्तर पर आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया है।
क्या है मामला?
मामला श्रीकरणपुर थाने में दर्ज एफआईआर से संबंधित है। शिकायतकर्ता शरद गुम्बर ने 19 दिसंबर 2025 को पुलिस को रिपोर्ट दी थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि कुछ व्यक्ति, जिनमें कुछ विदेशी नागरिक भी बताए गए, हिंदू देवी-देवताओं के बारे में कथित रूप से आपत्तिजनक बातें करते हुए तथा जादू-टोने जैसी गतिविधियों का सहारा लेकर स्थानीय लोगों को दूसरे धर्म में परिवर्तित करने का प्रयास कर रहे थे।
शिकायतकर्ता ने बलजिंदर सिंह खोसा, एम.एस. मैथ्यू, उनकी पत्नी और राजेश कांबोज उर्फ पॉपी के नाम बताए।
शिकायत के आधार पर पुलिस ने राजस्थान प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलिजन एक्ट, 2025 की धारा 3/5, विदेशी अधिनियम की धारा 14(ए) और भारतीय न्याय संहिता की धारा 223(बी) के तहत एफआईआर दर्ज की।
जांच के बाद पुलिस ने बलजिंदर सिंह खोसा, राजेश कुमार कांबोज और एम.एस. मैथ्यू के खिलाफ राजस्थान धर्मांतरण अधिनियम की धारा 3/5 के तहत आरोप-पत्र पेश किया।
आरोपियों ने हाईकोर्ट में क्या कहा?
तीनों याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अजय कुमार ऑगस्टीन और मोहन राज ने हाईकोर्ट में दलील दी कि पुलिस ने एक झूठी रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज की और निष्पक्ष तथा उचित जांच किए बिना उनके खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल कर दिया।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि कथित अपराध के आवश्यक वैधानिक तत्व उनके खिलाफ उपलब्ध सामग्री में मौजूद नहीं हैं।
उनका कहना था कि मजिस्ट्रेट का दायित्व केवल पुलिस द्वारा प्रस्तुत आरोप-पत्र को स्वीकार करना नहीं है, बल्कि उपलब्ध समस्त सामग्री पर अपना न्यायिक विवेक लगाकर यह देखना है कि किसी विशिष्ट अपराध का प्रथमदृष्टया गठन होता है या नहीं।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के Bijoe Emmanuel, Lalan Kumar Singh, Rajendra Biharilal और Ratilal Pannachand Gandhi सहित विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक मामले में संज्ञान लेना और प्रक्रिया जारी करना सामान्य या यांत्रिक प्रक्रिया नहीं हो सकती।
मजिस्ट्रेट के आदेश से यह दिखाई देना चाहिए कि उन्होंने मामले की सामग्री पर अपना दिमाग लगाया है।
धार्मिक सभाओं को धर्मांतरण का प्रयास नहीं बताया
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि वे सप्ताह में दो बार चर्च अथवा अन्य स्थानों पर छोटी धार्मिक सभाएं करते थे। इन सभाओं में बाइबल और अन्य धार्मिक शिक्षाओं का वाचन किया जाता था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि केवल धार्मिक प्रार्थना करना, बाइबल पढ़ना या धार्मिक शिक्षाओं का प्रचार करना धर्मांतरण का प्रयास नहीं माना जा सकता।
उनका तर्क था कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह पता चले कि उन्होंने किसी व्यक्ति को दूसरे धर्म में परिवर्तित करने के लिए बल, धोखा, गलत प्रस्तुतीकरण, प्रलोभन, अनुचित प्रभाव या अन्य किसी कपटपूर्ण माध्यम का उपयोग किया।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन के लिए आकर्षित करने के उद्देश्य से उसके धर्म की आलोचना या उसे बदनाम करने वाला कोई प्रचार किए जाने का भी रिकॉर्ड पर पर्याप्त साक्ष्य नहीं है। इसलिए उनके अनुसार संज्ञान आदेश कानून के विपरीत था और उसे रद्द किया जाना चाहिए था।
संज्ञान आदेश में ‘धारा 3/25’ लिखने पर भी आपत्ति
याचिकाकर्ताओं की ओर से एक महत्वपूर्ण तकनीकी आपत्ति यह भी उठाई गई कि ट्रायल कोर्ट ने 23 फरवरी 2026 के आदेश में राजस्थान प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलिजन एक्ट, 2025 की धारा 3/25 के तहत संज्ञान लिया है।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इस अधिनियम में धारा 25 का कोई प्रावधान ही नहीं है और अधिनियम में अधिकतम 18 धाराएं हैं। इसलिए संज्ञान आदेश ही कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया
राजस्थान सरकार की ओर से लोक अभियोजक एन.एस. चंडावत ने याचिका का विरोध किया।
राज्य की ओर से मुख्य रूप से यह कहा गया कि पुलिस ने मामले की जांच पूरी करने के बाद आरोप-पत्र दाखिल किया है।
आरोप-पत्र दाखिल होने के बाद याचिकाकर्ताओं के पास ट्रायल कोर्ट के समक्ष बीएनएसएस की धारा 250 के तहत डिस्चार्ज आवेदन पेश करने का वैधानिक उपाय उपलब्ध है।
अभियोजन का तर्क था कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए आधारों पर इसी स्तर पर आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने के बजाय उन्हें ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपलब्ध वैधानिक उपाय का इस्तेमाल करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने पहले समझाया धर्मांतरण कानून का पूरा ढांचा
जस्टिस अशोक कुमार जैन ने मामले पर निर्णय लेने से पहले राजस्थान प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलिजन एक्ट, 2025 की योजना और विभिन्न प्रावधानों का विस्तार से विश्लेषण किया।
अदालत ने बताया कि यह कानून 6 अक्टूबर 2025 को राज्य सरकार की अधिसूचना के बाद लागू हुआ।
इसका उद्देश्य गलत प्रस्तुतीकरण, गलत सूचना, बल, अनुचित प्रभाव, दबाव, प्रलोभन, ऑनलाइन आग्रह, विवाह अथवा विवाह के बहाने या अन्य कपटपूर्ण साधनों के जरिए किए जाने वाले अवैध धर्मांतरण को प्रतिबंधित करना है।
धारा 3 में क्या प्रतिबंध है?
अदालत ने धारा 3 का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून किसी व्यक्ति को दूसरे धर्म में परिवर्तन या परिवर्तन के प्रयास से तभी रोकता है जब उसके लिए कानून में बताए गए प्रतिबंधित साधनों का उपयोग किया गया हो।
इनमें गलत प्रस्तुतीकरण, गलत सूचना, बल, अनुचित प्रभाव, दबाव, प्रलोभन, ऑनलाइन आग्रह, विवाह या विवाह के बहाने तथा अन्य कपटपूर्ण साधन शामिल हैं।
धारा 3 में ऐसे धर्मांतरण को उकसाने, समझाने, प्रेरित करने, सहायता करने, सहयोग करने अथवा षड्यंत्र करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई का प्रावधान है।
शिकायतकर्ता को एफआईआर दर्ज कराने का अधिकार था या नहीं?
इस मुद्दे पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि अधिनियम की धारा 4 किसी भी व्यक्ति को इस कानून के उल्लंघन से संबंधित सूचना पुलिस को देने की अनुमति देती है।
अदालत ने कहा कि धारा 4 और धारा 7 को साथ पढ़ने पर यह स्पष्ट है कि इस अधिनियम के तहत अपराधों की सूचना देने के लिए शिकायतकर्ता का स्वयं पीड़ित होना आवश्यक नहीं है।
अदालत ने इसलिए माना कि शरद गुम्बर द्वारा दी गई शिकायत पर पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करना कानून के दायरे में था।
कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता पर क्या कहा?
फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा संविधान के अनुच्छेद 25 की व्याख्या से संबंधित है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतरात्मा की स्वतंत्रता तथा धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के K.S. Puttaswamy फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति का धार्मिक विश्वास उसकी अंतरात्मा, निजता, स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय से जुड़ा हुआ है।
धर्म का प्रचार और धर्मांतरण में अंतर
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि राजस्थान का धर्मांतरण अधिनियम किसी व्यक्ति के धर्म को मानने, उसका पालन करने या उसका प्रचार करने के अधिकार पर सामान्य प्रतिबंध नहीं लगाता।
अदालत के अनुसार कानून का प्रतिबंध उन परिस्थितियों पर है जिनमें धर्मांतरण के लिए धारा 3 में बताए गए साधनों का उपयोग किया जाता है।
अदालत ने कहा कि इसलिए धार्मिक गतिविधि और कानून द्वारा प्रतिबंधित धर्मांतरण के बीच अंतर किया जाना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों पर विचार किया। इनमें Rajendra Bihari Lal, Bijoe Emmanuel, Ratilal Pannachand Gandhi, S.R. Bommai और K.S. Puttaswamy सहित अन्य निर्णय शामिल हैं।
Rajendra Bihari Lal के संदर्भ में अदालत ने धार्मिक विश्वास और व्यक्ति की अपनी पसंद से धर्म अपनाने की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 21 और 25 से जोड़ा।
वहीं S.R. Bommai के संदर्भ में अदालत ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है और राज्य को सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करना है।
सुप्रीम कोर्ट के ‘Rev. Stainislaus’ फैसले का भी उल्लेख
हाईकोर्ट ने Rev. Stainislaus बनाम State of Madhya Pradesh के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने धर्म के प्रचार के अधिकार और दूसरे व्यक्ति को धर्म में परिवर्तित करने के अधिकार के बीच अंतर किया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य विधानमंडल सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े आधारों पर कुछ प्रकार के धर्मांतरण को प्रतिबंधित करने के लिए कानून बना सकता है।
धारा 3/25 की गलती को हाईकोर्ट ने कैसे देखा?
हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में धारा 3/25 का उल्लेख किया गया है, जबकि अधिनियम में धारा 25 है ही नहीं।
लेकिन अदालत ने इसे लिपिकीय या टाइपोग्राफिकल त्रुटि माना।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने आरोप-पत्र धारा 3/5 के तहत पेश किया था और अधिनियम में धारा 25 का कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए आदेश में लिखी धारा 3/25 को धारा 3/5 पढ़ा जाना चाहिए।
अदालत ने बीएनएसएस की धारा 403 का भी उल्लेख किया, जो लिपिकीय या अंकगणितीय त्रुटि को सुधारने की अनुमति देती है।
पुनरीक्षण अदालत की शक्ति पर भी टिप्पणी
जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि हाईकोर्ट की पुनरीक्षण शक्ति अपीलीय शक्ति के समान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के Kaptan Singh, State of Kerala v. Puttumana Illath Jathavedan Namboodiri और Amit Kapoor के फैसलों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि पुनरीक्षण अधिकार का प्रयोग गंभीर कानूनी त्रुटि, स्पष्ट अवैधता या न्याय के गंभीर हनन की स्थिति में किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि पुनरीक्षण के दौरान वह अधीनस्थ अदालत के आदेश की वैधता और उचितता की जांच कर सकता है, लेकिन अपीलीय अदालत की तरह पूरे साक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन करना उसका उद्देश्य नहीं है।
संज्ञान लेने के स्तर पर क्या देखना है?
हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञान लेने का अर्थ है कि मजिस्ट्रेट ने कथित अपराध का न्यायिक संज्ञान लिया और कार्यवाही आगे बढ़ाने का निर्णय किया।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Prasad Shrikant Purohit, Lalan Kumar Singh, Dharam Pal और Sachin Garg के फैसलों का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया जारी करना महज औपचारिकता नहीं है और मजिस्ट्रेट को उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह संतुष्ट होना चाहिए कि प्रथमदृष्टया मामला बनता है।
लेकिन इस मामले में अदालत ने पाया कि पुलिस की जांच के बाद आरोप-पत्र में ऐसा पर्याप्त आधार मौजूद था जिसके आधार पर संज्ञान लिया जा सकता था।
जज की मुख्य टिप्पणी- प्रथमदृष्टया अपराध बनता है
अदालत ने मामले की सामग्री पर विचार करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता ने लिखित रिपोर्ट दी थी, पुलिस ने जांच की, गवाहों के बयान दर्ज किए और जांच के बाद आरोप-पत्र दाखिल किया।
हाईकोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथमदृष्टया आपराधिक मामला बनता है और ऐसा कोई आधार रिकॉर्ड पर नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकले कि आरोपियों के खिलाफ बिना किसी सामग्री के संज्ञान लिया गया।
अदालत ने इसलिए याचिकाकर्ताओं की यह दलील स्वीकार नहीं की कि संज्ञान आदेश पूरी तरह सामग्री-विहीन था।
धार्मिक गतिविधि अपने आप में अपराध नहीं
फैसले में अदालत ने महत्वपूर्ण रूप से कहा कि कानून धर्म को मानने, धार्मिक आस्था रखने और उसका प्रचार करने पर सामान्य रोक नहीं लगाता।
अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने धर्म का पालन करता है या उसकी धार्मिक गतिविधियों में भाग लेता है तो केवल इस आधार पर उसे अपराधी नहीं माना जा सकता।
अपराध तभी बनता है जब धर्मांतरण कानून में निर्धारित प्रतिबंधित परिस्थितियों और साधनों के अनुरूप प्रथमदृष्टया सामग्री सामने आए।
अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता और कानून द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बीच इसी अंतर को मामले में महत्वपूर्ण माना।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला
सभी दलीलों, रिकॉर्ड और लागू कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद जस्टिस अशोक कुमार जैन ने तीनो की रिवीजन याचिकाए खारिज कर दी।
अदालत ने कहा कि संज्ञान आदेश में धारा 3/25 लिखना केवल लिपिकीय/टाइपोग्राफिकल त्रुटि है और इसे धारा 3/5 के रूप में पढ़ा जाएगा।
अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि मामला सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है, आरोपियों के पास बीएनएसएस की धारा 250 के तहत डिस्चार्ज आवेदन पेश करने का वैधानिक अधिकार है। यदि डिस्चार्ज आवेदन स्वीकार नहीं होता है, तभी सत्र न्यायालय धारा 251 के तहत आरोप तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा।
अंततः हाईकोर्ट ने तीनों याचिकाकर्ताओं की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और लंबित आवेदन, यदि कोई हो, को भी निस्तारित कर दिया।