जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़की को पैसे देकर खरीदने और उसकी शादी कराने के आरोप में दोषी ठहराए गए 2 लोगों को राहत दी है।
हाईकोर्ट ने दोनों की 20 साल तक की सजा निलंबित कर अपील का फैसला होने तक जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
जस्टिस फरजंद अली ने आदेश में कहा कि मामले में लड़की को बेचने के बदले पैसे दिए जाने या लिए जाने के ठोस सबूत नहीं हैं। कोर्ट ने एक अहम गवाह के बयान को भी महत्वपूर्ण माना।
हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ नाबालिग की शादी होने से यह अपने आप साबित नहीं हो जाता कि आरोपियों ने उन सभी अपराधों को अंजाम दिया है, जिनमें उन्हें दोषी ठहराया गया।
हाईकोर्ट ने माना कि पैसों के कथित लेन-देन, गवाह के बयान और शादी की परिस्थितियों पर अपील की सुनवाई के दौरान विस्तार से विचार करने की जरूरत है।
हालांकि, कोर्ट ने अभी दोषसिद्धि पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। दोनों की सजा अपील का फैसला आने तक निलंबित की गई है। यानी उन्हें सिर्फ अपील का फैसला आने तक जेल से बाहर रहने की राहत मिली है।
मामले में श्रवण नाथ की ओर से अधिवक्ता जे.वी.एस. देवड़ा और आर.एस. रावल ने पैरवी की। वहीं, राज्य सरकार की ओर से डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट नरेंद्र गहलोत और राजेंद्र चारण ने पक्ष रखा।
ट्रायल कोर्ट ने पॉक्सो मामले में सुनाई थी 20 साल की सजा
मामला श्रवण नाथ और मांगूनाथ से जुड़ा है। उदयपुर की विशेष पॉक्सो कोर्ट ने 25 मार्च 2026 को दोनों को दोषी ठहराते हुए अधिकतम 20 साल के कठोर कारावास और एक लाख रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी।
दोनों को पॉक्सो एक्ट की धारा 6/17 और 5/6 के तहत सजा दी गई थी। अन्य अपराधों में भी कम अवधि की सजा सुनाई गई थी।
दोनों ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की और अपील के अंतिम निपटारे तक सजा सस्पेंड करने की मांग की। वहीं राज्य सरकार की ओर से इस मांग का विरोध किया गया।
दोषियों ने सबूतों का दोबारा आकलन करने की मांग की
दोनों दोषियों की ओर से वकीलों ने कहा कि ट्रायल के दौरान वे जमानत पर थे और उन्होंने जमानत की शर्तों का उल्लंघन नहीं किया।
वकीलों ने कहा कि हाईकोर्ट अपील की सुनवाई के दौरान गवाहों के बयान और दूसरे सबूतों का दोबारा आकलन कर सकता है। चूंकि अपील के निपटारे में समय लग सकता है, इसलिए तब तक सजा निलंबित उन्हें जेल से बाहर रहने की राहत दी जाए।
वहीं हाईकोर्ट ने माना कि सजा निलंबित करने के मामले में यह देखना जरूरी है कि अपील में ऐसे आधार हैं या नहीं, जिन पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है।
अगर सबूतों और ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों पर सवाल उठते हैं, तो अपील का अंतिम फैसला आने तक सजा निलंबित करने पर विचार किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा- पैसे देकर नाबालिग को बेचने के ठोस सबूत नहीं
हाईकोर्ट ने मामले के सबूतों पर विचार करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने के लिए ठोस और भरोसेमंद सबूत पेश नहीं कर पाया कि लड़की को किसी रकम के बदले बेचा गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि कथित पैसों का लेन-देन अभियोजन की कहानी का अहम हिस्सा था, लेकिन रकम दिए जाने या लिए जाने की बात साबित करने वाला संतोषजनक सबूत सामने नहीं आया।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी को अपराध का दोषी ठहराने के लिए सिर्फ शक या अंदाजे के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
अभियोजन को आरोपों को भरोसेमंद सबूतों से साबित करना होता है। अगर मामले के किसी अहम हिस्से में सबूतों की कमी है, तो अपील की सुनवाई के दौरान उस पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने गवाह के बयान और शादी की परिस्थितियों पर सवाल उठाए
हाईकोर्ट ने गवाह के बयान को भी अहम माना। गवाही के दौरान उसने कहा था कि उसे जानकारी नहीं थी कि उसे किसी रकम के बदले बेचा गया था या नहीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस बयान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि कथित लेन-देन मामले का अहम हिस्सा था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि शादी किन परिस्थितियों में हुई और संबंधित लोगों के बीच क्या संबंध थे, इन पहलुओं को भी दूसरे सबूतों के साथ रखकर देखना होगा।
हाईकोर्ट ने माना कि किसी एक बयान या परिस्थिति के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय पूरे मामले के सबूतों का एक साथ आकलन करना जरूरी है।
नाबालिग की शादी होना हर अपराध का सबूत नहीं- हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड के मुताबिक, घटना के समय लड़की की उम्र 18 साल से कम थी और उसकी शादी श्रवण नाथ से हुई थी।
नाबालिग होना कानूनी रूप से अहम है, लेकिन सिर्फ इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि आरोपियों ने वे सभी अपराध भी किए हैं, जिनमें उन्हें दोषी ठहराया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग की शादी से जुड़े कानूनी पहलुओं और उससे जुड़े दूसरे आपराधिक आरोपों के बीच अंतर करना जरूरी है। अभियोजन को हर अपराध के जरूरी तत्वों को सबूतों के आधार पर साबित करना होता है।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि शादी की परिस्थितियों और लड़की की इच्छा से जुड़े पहलुओं को रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों के आधार पर समझना होगा। हालांकि, नाबालिग की कथित सहमति अपने आप में उसे कानून से मिलने वाली सुरक्षा को खत्म नहीं करती।
‘सजा सस्पेंड करने के लिए अपील में ठोस आधार जरूरी‘
हाईकोर्ट ने कहा कि दोषसिद्धि के बाद आरोपी के पक्ष में निर्दोष होने की धारणा पहले जैसी नहीं रहती। इसलिए सजा सस्पेंड करने का फैसला सामान्य जमानत से अलग होता है।
हालांकि, यदि अपील में ऐसे ठोस और विचार करने योग्य आधार हों जिनसे दोषसिद्धि पर दोबारा विचार की जरूरत दिखे, तो अपील लंबित रहने के दौरान सजा सस्पेंड की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आपराधिक अपीलों के निपटारे में लंबा समय लग सकता है। ऐसे में अपील में उठाए गए महत्वपूर्ण सवालों को देखते हुए सजा सस्पेंड करने पर विचार किया जा सकता है।
सजा सस्पेंड, दोनों को 50 हजार के मुचलके पर जमानत
हाईकोर्ट ने दोनों की सजा निलंबित करने की अर्जियां स्वीकार कर लीं। कोर्ट ने आदेश दिया कि अपील का अंतिम फैसला आने तक उनकी सजा निलंबित रहेगी और उन्हें जमानत पर रिहा किया जाए।
इसके लिए दोनों आरोपी को 50 हजार रुपये का निजी मुचलका और 25-25 हजार रुपये के दो जमानतदार देने होंगे।
दोनों को हर साल जनवरी में ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होना होगा। अगर वे अपना पता बदलते हैं, तो इसकी लिखित जानकारी ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट में अपने वकील को देनी होगी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अगर दोनों पेश नहीं होते हैं, तो ट्रायल कोर्ट जमानत रद्द करने के लिए हाईकोर्ट को रिपोर्ट भेज सकता है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने अपील के अंतिम नतीजे पर कोई राय नहीं दी है। दोनों की दोषसिद्धि बरकरार रहेगी या उसमें बदलाव होगा, यह अपील की अंतिम सुनवाई के दौरान तय किया जाएगा।
