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बीमार बेटे की सर्जरी के लिए अमेरिका जा सकेंगे माता-पिता, लुक आउट सर्कुलर रहेगा अप्रभावी -राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा मानवीय फैसला

Couldn’t Pay ₹10,000, Sent to Jail After Probation: Rajasthan HC Orders Release, Restores Probation
हाईकोर्ट ने कहा-केवल जांच लंबित होने से आरोपी को नहीं रोका जा सकता अस्थायी विदेश यात्रा से, बच्चे की बीमारी में माता-पिता का साथ रहना स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील आदेश में स्पष्ट किया है कि केवल इसलिए किसी आरोपी की अस्थायी विदेश यात्रा पर रोक नहीं लगाई जा सकती कि उसके खिलाफ आपराधिक मामले की जांच अभी लंबित है।

कोर्ट ने कहा कि यदि जांच के दौरान आरोपी की व्यक्तिगत मौजूदगी की कोई विशेष आवश्यकता सामने नहीं आती है और वह न्यायालय द्वारा लगाई जाने वाली शर्तों का पालन करने को तैयार है, तो उचित परिस्थितियों में उसे विदेश जाने की अनुमति दी जा सकती है।

मामला उस समय और अधिक संवेदनशील हो गया, जब याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उनका पुत्र अमेरिका में एक सर्जरी से गुजरने वाला है और ऐसे समय में माता-पिता उसके साथ रहना चाहते हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने इस मानवीय परिस्थिति को गंभीरता से लेते हुए कहा कि भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश में माता-पिता और संतान के बीच प्रेम एवं स्नेह का अपना विशिष्ट महत्व है।

बीमार पुत्र के पास पहुंचना माता-पिता की स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है और ऐसी वास्तविक पारिवारिक परिस्थिति को केवल इस आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि चिकित्सकीय सलाह ओपीडी आधार पर दी गई है।

हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए दिए फैसले में याचिकाकर्ता महेश कुमार गुप्ता, चंदा गुप्ता और विनायक गुप्ता की आपराधिक विविध याचिका स्वीकार करते हुए अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-4, बीकानेर द्वारा 7 अगस्त 2026 को पारित आदेश को निरस्त कर दिया।

चार माह विदेश जाने की अनुमति

हाईकोर्ट ने तीनों याचिकाकर्ताओं को अधिकतम चार महीने की अवधि के लिए विदेश जाने की अनुमति दी।

साथ ही उनके खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर को उनकी विदेश यात्रा में बाधा डालने के लिए प्रभावी नहीं करने का निर्देश दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट के इस आदेश में एक ओर जांच एजेंसी को कानून के अनुसार जांच जारी रखने की स्वतंत्रता बरकरार रखी गई, वहीं दूसरी ओर यह भी माना गया कि महज जांच लंबित होने के कारण किसी व्यक्ति की अस्थायी विदेश यात्रा को स्वतः नहीं रोका जा सकता।

विशेष रूप से जब यात्रा का कारण बीमार पुत्र की प्रस्तावित शल्य चिकित्सा हो, याचिकाकर्ता न्यायालय की शर्तों का पालन करने को तैयार हों और उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति जांच के वर्तमान चरण में आवश्यक होने का कोई ठोस आधार रिकॉर्ड पर न हो, तब न्यायालय ने पारिवारिक परिस्थिति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी महत्व दिया।

क्या है पूरा मामला?

मामला बीकानेर के गंगाशहर थाना क्षेत्र में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है। एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 318(4), 338, 336(3), 316(2) और 61(2) के तहत अपराध दर्ज किए गए हैं।

एफआईआर को रद्द करने की मांग को लेकर याचिकाकर्ताओं ने पहले ही हाईकोर्ट का दरवाजा खटखा रखा है।

जिस पर हाईकोर्ट की दूसरी पीठ ने याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा रखी है।

इसी बीच याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में नई याचिका पेश कर विदेश जाने की अनुमति मांगी और अधीनस्थ अदालत के उस आदेश को चुनौती दी जिसके माध्यम से याचिकाकर्ताओं को विदेश जाने की अनुमति नहीं दी गई थी और उनके खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर को बनाए रखा गया था।

याचिकाकर्ताओं के पुत्र को अमेरिका में सर्जरी

ऐसे में तीनों ने अस्थायी रूप से अमेरिका जाने की अनुमति मांगी। अपने पक्ष में उन्होंने चिकित्सकीय दस्तावेज, पासपोर्ट और निश्चित यात्रा कार्यक्रम भी रिकॉर्ड पर प्रस्तुत किए थे।

लेकिन अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-4, बीकानेर ने 7 अगस्त 2026 को उनकी विदेश यात्रा की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

निचली अदालत के समक्ष मुख्य चिंता यह थी कि जांच लंबित है और याचिकाकर्ताओं के भारत से बाहर चले जाने की स्थिति में उनके कानूनी प्रक्रिया से बचने की आशंका हो सकती है।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

याचिकाकर्ताओं की ओर से क्या कहा गया?

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता राजेश सहारण ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि विदेश जाने का उद्देश्य किसी प्रकार से जांच या न्यायिक प्रक्रिया से बचना नहीं है, बल्कि अपने उस पुत्र के पास जाना है, जिसकी अमेरिका में सर्जरी निर्धारित है।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष चिकित्सा दस्तावेजों के साथ अपने पासपोर्ट और यात्रा संबंधी दस्तावेज भी प्रस्तुत किए।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे न्यायालय द्वारा लगाई जाने वाली सभी उचित शर्तों का पालन करने के लिए तैयार हैं और यात्रा पूरी होने के बाद भारत वापस आएंगे।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि अदालत के सामने रखी गई कि उन्हें संबंधित एफआईआर में पहले ही गिरफ्तारी से संरक्षण प्राप्त है।

पहले भी हाईकोर्ट ने माना था-विवाद में कारोबारी और पारिवारिक रंग

24 जून 2026 को हाईकोर्ट की दूसरी पीठ के समक्ष हुई कार्यवाही में याचिकाकर्ताओं की ओर से यह दलील दी गई थी कि शिकायतकर्ता और याचिकाकर्ता संबंधित कंपनी के निदेशक रहे हैं तथा वे उस अवधि में कंपनी के कारोबार से जुड़े हुए थे, जिस अवधि के लेन-देन को लेकर बाद में एफआईआर दर्ज की गई।

रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित व्यवसाय वर्ष 2025 में बेच दिया गया था, जबकि एफआईआर 18 जून 2026 को दर्ज हुई और उसमें पूर्व अवधि से संबंधित कारोबारी अनियमितताओं के आरोप लगाए गए।

उस समय याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया था कि दोनों पक्ष परिवार से जुड़े हुए हैं और विवाद मूल रूप से वित्तीय एवं पारिवारिक प्रकृति का है, जिसे आपराधिक रूप दिया गया है।

हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड देखने के बाद मामले में वित्तीय विवाद को आपराधिक रंग दिए जाने के पहलू को नोट किया था और याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान किया था।

राज्य सरकार ने विदेश जाने का किया विरोध

राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विनीत जैन, सहायक अधिवक्ता राजीव बिश्नोई तथा उप राजकीय अधिवक्ता नरेंद्र गेहलोत उपस्थित हुए।

राज्य की ओर से याचिकाकर्ताओं की विदेश यात्रा का विरोध किया गया।

राज्य पक्ष की ओर से विशेष रूप से यह तर्क रखा गया कि मामले की जांच अभी जारी है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत चिकित्सकीय सलाह ओपीडी आधार पर है और उसमें अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता नहीं बताई गई है।

इसी आधार पर राज्य की ओर से विदेश यात्रा की आवश्यकता पर सवाल उठाया गया।

राज्य की आपत्ति का मूल आधार यह था कि जांच लंबित होने के दौरान याचिकाकर्ताओं के भारत से बाहर जाने से जांच और कानूनी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है तथा उनके वापस लौटने को लेकर आशंका बनी रह सकती है।

बच्चे की देखभाल के लिए अस्पताल में भर्ती होना जरूरी नहीं

जस्टिस फरजंद अली ने राज्य की उस दलील को स्वीकार नहीं किया कि चूंकि चिकित्सा सलाह ओपीडी स्तर की है और अस्पताल में भर्ती होने की बात नहीं है, इसलिए माता-पिता का विदेश जाना आवश्यक नहीं माना जा सकता।

पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी माता-पिता के लिए अपने बीमार बच्चे के पास जाने के लिए बच्चे का अस्पताल में भर्ती होना कोई अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती।

हाईकोर्ट ने माता-पिता की चिंता और पुत्र के स्वास्थ्य को लेकर उनके भावनात्मक जुड़ाव को महत्व दिया।

पीठ ने कहा कि भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश में माता-पिता और उनकी संतान के बीच प्रेम एवं स्नेह का विशेष महत्व है।

यदि पुत्र अस्वस्थ है और उसकी शल्य चिकित्सा निर्धारित है, तो उसके साथ रहने की माता-पिता की इच्छा न केवल समझने योग्य है, बल्कि एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी वास्तविक पारिवारिक परिस्थिति को केवल इस आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि चिकित्सकीय परामर्श ओपीडी में दिया गया था।

जांच जारी रहेगी, लेकिन हर चरण में आरोपी की मौजूदगी जरूरी नहीं

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को मिली गिरफ्तारी से सुरक्षा का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें जांच से कोई प्रतिरक्षा मिल गई है।

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि जांच एजेंसी कानून के अनुसार अपनी जांच जारी रखने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

लेकिन रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री को देखने के बाद अदालत को ऐसा कोई विशिष्ट आधार नहीं मिला जिससे यह कहा जा सके कि जांच के दौरान याचिकाकर्ताओं की व्यक्तिगत उपस्थिति आवश्यक है।

यही वह बिंदु रहा, जिसने विदेश यात्रा की अनुमति के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पीठ ने कहा कि जांच का लंबित होना और जांच के प्रत्येक चरण में आरोपी की शारीरिक मौजूदगी आवश्यक होना दो अलग-अलग बातें हैं।

हाईकोर्ट के अनुसार यदि मामला सुनवाई के चरण में पहुंच चुका होता तो आरोपी की अनुपस्थिति से न्यायिक कार्यवाही प्रभावित होने का सवाल अलग तरीके से देखा जा सकता था।

लेकिन वर्तमान चरण में जांच स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ सकती है।

कोर्ट को नहीं मिला यात्रा से जांच प्रभावित होने का ठोस आधार

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस तथ्य नहीं लाया गया जिससे यह प्रदर्शित हो कि याचिकाकर्ताओं की अस्थायी विदेश यात्रा से जांच बाधित होगी या उस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

ऐसे में केवल इस तथ्य को कि जांच लंबित है, विदेश यात्रा रोकने का पूर्ण और स्वतः लागू होने वाला आधार नहीं माना जा सकता।

पीठ ने विशेष रूप से इस बात को भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता पहले से गिरफ्तारी से संरक्षण प्राप्त कर रहे हैं और वे न्यायालय द्वारा लगाई जाने वाली उचित शर्तों का पालन करने को तैयार हैं।

मोहम्मद सदीक मामले का भी दिया हवाला

हाईकोर्ट ने समान प्रकृति के मोहम्मद सदीक बनाम राजस्थान राज्य, आपराधिक विविध याचिका में 2 सितंबर 2024 को दिए गए राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश का भी हवाला दिया।

उस मामले में आरोपी ने अपनी बेटी के सगाई समारोह में शामिल होने के लिए विदेश जाने की अनुमति मांगी थी।

समन्वय पीठ ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और महत्वपूर्ण पारिवारिक अवसरों में शामिल होने के अधिकार के पहलू पर विचार किया था।

उस निर्णय में यह भी कहा गया था कि आरोपी होने मात्र से व्यक्ति का व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।

यदि किसी व्यक्ति के विदेश भागने की वास्तविक आशंका हो तो उसकी यात्रा पर उचित शर्तें लगाई जा सकती हैं।

इस पूर्व निर्णय में निश्चित तिथि तक भारत लौटने का वचन, यात्रा दस्तावेज और अन्य उचित शर्तों के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित करने के विकल्प पर भी विचार किया गया था।

चार महीने तक विदेश रह सकेंगे

सभी पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद जस्टिस फरजंद अली ने याचिका स्वीकार कर ली।

हाईकोर्ट ने 7 अगस्त 2026 के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-4, बीकानेर के आदेश को निरस्त और रद्द कर दिया।

तीनों याचिकाकर्ताओं को इमिग्रेशन चेकआउट के बाद अधिकतम चार महीने की अवधि के लिए विदेश जाने की अनुमति दी गई है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता जमानत पर नहीं हैं। एफआईआर एवं संबंधित कार्यवाही को पूरी तरह निरस्त करने की उनकी याचिका अभी हाईकोर्ट में विचाराधीन है और उसमें पारित अंतरिम आदेश उनके पक्ष में प्रभावी है।

इसी कारण हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में जमानत बांड या जमानतदार प्रस्तुत करने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता।

हालांकि, विदेश यात्रा चार महीने से अधिक नहीं होनी चाहिए और इस संबंध में न्यायालय के समक्ष दिया गया उपक्रम पर्याप्त होगा।

एलओसी पर भी हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश

मामले में हाईकोर्ट ने केवल विदेश जाने की अनुमति देकर ही बात समाप्त नहीं की, बल्कि संबंधित अधिकारियों को भी स्पष्ट निर्देश जारी किए।

हाईकोर्ट ने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों, आव्रजन अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को आदेश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं की विदेश यात्रा में किसी प्रकार की बाधा या रुकावट उत्पन्न न करें तथा उनकी यात्रा को सुगम बनाएं।

साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ जारी लुक आउट सर्कुलर को उनकी विदेश यात्रा रोकने या उसमें बाधा डालने के लिए प्रभावी नहीं किया जाएगा।

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