हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में 30 बीघा जमीन, कब्जे में करीब 23 बीघा; कृषि भवन, सिंचाई विभाग कार्यालय और कर भवन वाली जमीन वापस लेने की मांग, पूर्व बार अध्यक्ष प्रहलाद शर्मा बोले-नई जगह की जरूरत नहीं, हाईकोर्ट अपनी ही जमीन पर वैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करे
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ में लगातार बढ़ती अधिवक्ताओं की संख्या और मूलभूत सुविधाओं की कमी के बीच हाईकोर्ट की बची हुई करीब 7 बीघा जमीन वापस दिलाने का मुद्दा एक बार फिर जोर पकड़ गया है।
राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन जयपुर के अध्यक्ष राजीव सोगरवाल ने राज्य सरकार से हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज पूरी जमीन उपलब्ध कराने की मांग की है।
राजीव सोगरवाल का कहना है कि यदि हाईकोर्ट को आवंटित बची हुई करीब 7 बीघा जमीन भी मिल जाती है, तो परिसर में अधिवक्ताओं के सामने आने वाली कई प्रमुख समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
खासकर युवा अधिवक्ताओं के लिए बैठने, कार्यालय और सामान रखने जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए जगह उपलब्ध कराई जा सकेगी।

हाईकोर्ट के लिए आवंटित 30 बीघा, फिलहाल करीब 23 बीघा ही उपयोग में
राजीव सोगरवाल के अनुसार, रिकॉर्ड में राजस्थान हाईकोर्ट के लिए कुल 30 बीघा भूमि आवंटित है, लेकिन वर्तमान में करीब 23 बीघा भूमि ही हाईकोर्ट के कब्जे और उपयोग में है।
शेष करीब 7 बीघा भूमि पर फिलहाल सरकारी कार्यालय और भवन मौजूद हैं।
इनमें कृषि भवन, सिंचाई विभाग से संबंधित कार्यालय और अंबेडकर सर्किल स्थित कर भवन की जमीन शामिल है।
राजीव सोगरवाल का कहना है कि कृषि विभाग और सिंचाई विभाग के कार्यालय दूसरी जगह बनाए जा चुके हैं और इन स्थानों पर अब नाममात्र का काम हो रहा है।
ऐसे में इन भवनों को तत्काल हाईकोर्ट और अधिवक्ताओं के उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
उन्होंने अंबेडकर सर्किल स्थित कर भवन की जमीन भी हाईकोर्ट को सौंपने की मांग की है।

‘युवा वकीलों के लिए बैठने की जगह तो दूर, बैग रखने तक की जगह नहीं’
हाईकोर्ट बार अध्यक्ष ने हाल ही में नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल के सम्मान समारोह के दौरान भी हाईकोर्ट परिसर में युवा अधिवक्ताओं के सामने मौजूद सुविधाओं की कमी का मुद्दा उठाया था।
राजीव सोगरवाल के अनुसार, आज बड़ी संख्या में युवा अधिवक्ता लैपटॉप, आईपैड और टिफिन लेकर अदालत पहुंचते हैं, लेकिन हाईकोर्ट परिसर में उनके छोटे से बैग को रखने तक के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध नहीं है।
उन्होंने बताया कि कई बार ई-लाइब्रेरी के गेट के पास युवा अधिवक्ताओं के बैग का ढेर दिखाई देता है।
इस स्थिति से संबंधित एक अधिवक्ता का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था।
राजीव सोगरवाल का कहना है कि जब युवा अधिवक्ताओं के लिए बैठने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और सामान रखने के लिए भी जगह उपलब्ध नहीं है, तो परिसर में अतिरिक्त भूमि की जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

15 साल में कई सरकारी कार्यालयों की जमीन हाईकोर्ट को मिली
गौरतलब है कि पिछले करीब 15 वर्षों में राजस्थान सरकार के वन विभाग कार्यालय, समाज कल्याण विभाग और डीएलबी कार्यालय से संबंधित जमीन हाईकोर्ट को सौंपी जा चुकी है।
राजीव सोगरवाल के अनुसार, इन जमीनों के हाईकोर्ट को मिलने के बाद ही हाईकोर्ट के महाधिवक्ता कार्यालय सहित नई बिल्डिंग के निर्माण जैसी सुविधाएं विकसित हो सकीं।
अब उनका कहना है कि यदि बची हुई 7 बीघा जमीन भी हाईकोर्ट को उपलब्ध करा दी जाती है, तो वर्तमान में सामने आ रही जगह की समस्या को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।

7 बीघा जमीन को लेकर पहले भी दायर हो चुकी है PIL
हाईकोर्ट की बची हुई 7 बीघा जमीन का मुद्दा नया नहीं है। इस मामले को लेकर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष प्रह्लाद शर्मा की ओर से पूर्व में जनहित याचिका भी दायर की जा चुकी है।
इस याचिका और उसके बाद हुई कार्यवाही के संबंध में प्रह्लाद शर्मा का कहना है कि न्यायालय ने मामले को प्रशासनिक स्तर पर देखने की बात कहते हुए याचिका का निस्तारण किया था और बाद में उनके द्वारा दायर Revival Application का भी प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई जारी होने के आधार पर निस्तारण किया गया।

‘पूरी जमीन अभी नहीं मिल सकती तो कम से कम एक भवन दें’
अधिवक्ताओं की मांग है कि यदि पूरी 7 बीघा भूमि तत्काल हाईकोर्ट को उपलब्ध कराना संभव नहीं है, तो कम से कम वहां मौजूद किसी एक भवन को तत्काल हाईकोर्ट प्रशासन को सौंपा जाए।
इस भवन का उपयोग युवा अधिवक्ताओं के लिए बैग और अन्य सामान रखने के साथ-साथ उनकी मूलभूत सुविधाओं के लिए किया जा सकता है।
बार का मानना है कि इससे तत्काल राहत मिलेगी और परिसर में लगातार बढ़ रही जगह की समस्या को कुछ हद तक कम किया जा सकेगा।
मुख्यमंत्री भी हाईकोर्ट परिसर की समस्याओं पर दे चुके हैं आश्वासन
गौरतलब है कि 31 जनवरी को हाईकोर्ट बार के शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भी हाईकोर्ट परिसर से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख किया था और सरकार की ओर से सहयोग का आश्वासन दिया था।
मुख्यमंत्री ने कहा था कि हाईकोर्ट प्रशासन अपनी आवश्यकता के अनुसार उपयुक्त भूमि का चयन करे। सरकार उस भूमि को उपलब्ध कराने और नए भवन के निर्माण के लिए आवश्यक धनराशि देने के लिए तैयार है।
ऐसे में बार अध्यक्ष का कहना है कि वर्तमान जरूरतों को देखते हुए उपलब्ध जमीन का उपयोग सुनिश्चित करने के साथ भविष्य के लिए भी दीर्घकालिक योजना तैयार करने की आवश्यकता है।
‘आज की जरूरत नहीं, अगले 50-100 साल की जरूरत देखकर बने नया परिसर’
राजीव सोगरवाल का कहना है कि वर्तमान समस्याओं का तत्काल समाधान जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट के भविष्य की जरूरतों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
उनके अनुसार, यह जरूरी नहीं कि वर्तमान हाईकोर्ट परिसर आने वाले 50 या 100 वर्षों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त हो।
ऐसे में राज्य सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन के बीच उचित समन्वय और बातचीत के माध्यम से जयपुर शहर के भीतर या शहर से बहुत दूर नहीं, पर्याप्त और उपयुक्त भूमि की तलाश की जानी चाहिए।
उन्होंने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एक आधुनिक, विस्तृत और दीर्घकालिक हाईकोर्ट परिसर विकसित करने की दिशा में कदम उठाने की मांग की है।
अधिवक्ताओं के कार्यालय और आवास की जरूरत भी योजना में शामिल हो
बार अध्यक्ष ने यह भी कहा कि भविष्य में यदि हाईकोर्ट परिसर को किसी नए स्थान पर विकसित किया जाता है, तो अधिवक्ताओं की लंबे समय से चली आ रही कार्यालय और आवास संबंधी जरूरतों को भी योजना में शामिल किया जाना चाहिए।
उनकी मांग है कि नए परिसर की योजना बनाते समय आसपास लंबे समय से कार्यालय और आवास बना चुके अधिवक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार की ओर से रियायती दर पर कार्यालय और आवास उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर भी विचार किया जाए।
‘30 बीघा जमीन हाईकोर्ट के नाम, नई जगह की जरूरत नहीं’
मामले में पहले जनहित याचिका दायर कर चुके हाईकोर्ट के पूर्व अध्यक्ष प्रह्लाद शर्मा का कहना है कि हाईकोर्ट की जमीन से जुड़े दस्तावेज इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण हैं।
प्रह्लाद शर्मा के अनुसार, वर्ष 1954 में हाईकोर्ट के लिए 30 बीघा जमीन जयपुर के तत्कालीन हिज हाईनेस द्वारा आवंटित की गई थी।
प्रह्लाद शर्मा कहते हैं कि 30 बीघा जमीन का नामांकन भी हाईकोर्ट के नाम दर्ज और स्वीकृत हुआ था।
उन्होंने दावा किया कि आज भी जमीन की जमाबंदी हाईकोर्ट के नाम दर्ज है और PWD के रिकॉर्ड में भी हाईकोर्ट का ले-आउट प्लान 30 बीघा भूमि का ही है।
उनके अनुसार, इसी ले-आउट प्लान के तहत कृषि भवन, कर भवन और इंदिरा गांधी नहर मंडल की इमारतें भी हाईकोर्ट की भूमि में शामिल हैं।
प्रह्लाद शर्मा का कहना है कि यदि इन तीनों भवनों को हाईकोर्ट प्रशासन अपने कब्जे में लेने के लिए उपलब्ध वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करता है, तो नई जगह पर हाईकोर्ट परिसर विकसित करने की आवश्यकता ही नहीं होगी।

‘मैंने दस्तावेजों के साथ जनहित याचिका दायर की थी’
प्रह्लाद शर्मा ने बताया कि उन्होंने इन सरकारी भवनों को हाईकोर्ट के कब्जे में लेने के लिए पूर्व में जनहित याचिका दायर की थी।
याचिका में हाईकोर्ट की जमाबंदी, 30 बीघा जमीन से संबंधित मुख्य सचिव का आदेश और PWD के नक्शे सहित संबंधित दस्तावेज भी पेश किए गए थे।
उन्होंने बताया कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस प्रदीप नन्द्राजोग और तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने याचिका को इस आधार पर निस्तारित किया था कि इस विषय को प्रशासनिक स्तर पर देखा जाएगा।
प्रहलाद शर्मा के अनुसार, उन्हें यह स्वतंत्रता भी दी गई थी कि यदि छह महीने में प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई नहीं होती है तो वे याचिका को पुनः सुनवाई के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकते हैं।
‘छह महीने बाद Revival Application भी पेश की’
प्रहलाद शर्मा के अनुसार, छह महीने की अवधि बीतने के बाद उन्होंने Revival Application भी पेश की थी।
प्रहलाद शर्मा कहते हैं कि बाद में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मनीन्द्र मोहन श्रीवास्तव की खंडपीठ ने उक्त प्रार्थना पत्र का भी यह कहते हुए निस्तारण कर दिया कि मामले को प्रशासनिक स्तर पर देखा जा रहा है।
प्रहलाद शर्मा का कहना है कि इन परिस्थितियों में अब हाईकोर्ट प्रशासन को अपनी वैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इस मामले को आगे बढ़ाना चाहिए।
‘अधिवक्ता साथ आएं तो कल ही नया प्रार्थना पत्र देने को तैयार’
प्रहलाद शर्मा ने अधिवक्ताओं से भी इस मामले में आगे आने की अपील की है।
उन्होंने कहा कि उनकी पूर्व याचिका में अभी भी पुनः प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता उपलब्ध है।
उनका कहना है कि यदि अधिवक्तागण उनके साथ न्यायालय में उपस्थित हों, तो वे तुरंत नया प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करने को तैयार हैं।
इस तरह मौजूदा विवाद में एक ओर बार अध्यक्ष राजीव सोगरवाल की ओर से बची हुई 7 बीघा जमीन तत्काल हाईकोर्ट को उपलब्ध कराने की मांग है, वहीं पूर्व बार अध्यक्ष प्रह्लाद शर्मा का कहना है कि हाईकोर्ट के पास पहले से ही 30 बीघा भूमि का अधिकार दर्ज है और मौजूदा सरकारी भवनों को वापस लेकर इसी परिसर की समस्या का समाधान किया जा सकता है।
अब सवाल सिर्फ 7 बीघा जमीन का नहीं
राजस्थान हाईकोर्ट की बची हुई 7 बीघा जमीन का मुद्दा अब केवल भूमि हस्तांतरण तक सीमित नहीं रह गया है।
इसके साथ युवा अधिवक्ताओं के लिए जगह, मूलभूत सुविधाएं, भविष्य के हाईकोर्ट परिसर की जरूरत और अधिवक्ताओं के कार्यालय एवं आवास का सवाल भी जुड़ गया है।
बार अध्यक्ष राजीव सोगरवाल की मांग है कि वर्तमान जरूरतों को देखते हुए सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन इस मुद्दे पर ठोस और दीर्घकालिक समाधान की दिशा में कदम उठाएं।