जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी से दुष्कर्म की कोशिश के मामले में 10 साल की सजा काट रहे दोषी पिता को राहत दी है।
जस्टिस अशोक कुमार जैन ने दोषी पिता की दूसरी सस्पेंशन ऑफ सेंटेंस याचिका स्वीकार करते हुए अपील का फैसला होने तक सजा सस्पेंड कर दी और जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने यह राहत इस आधार पर दी कि आरोपी करीब 6 साल 5 महीने जेल में बिता चुका है और उसकी अपील का अभी तक निस्तारण नहीं हुआ है।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सजा सस्पेंड करने का फैसला मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना किया गया है।
10 साल की सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में की थी अपील
जयपुर की विशेष POCSO कोर्ट ने 12 अक्टूबर 2023 को कालूराम को नाबालिग बेटी से यौन अपराध के प्रयास के मामले में दोषी ठहराते हुए अधिकतम 10 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी।
इसके खिलाफ कालूराम ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील लंबित रहने के दौरान उसने सजा निलंबित करने के लिए याचिका लगाई।
पहले भी खारिज हो चुकी थी सजा निलंबित करने की अर्जी
इससे पहले कालूराम की सजा सस्पेंड करने की पहली याचिका 29 अप्रैल 2025 को खारिज हो गई थी। इसके बाद उसने दूसरी बार हाईकोर्ट में याचिका लगाई। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मामले में कुछ जरूरी बातों पर ध्यान नहीं दिया।
आरोपी के वकील का कहना था कि मामले में गवाहों के बयानों में अंतर था और घटना की पुष्टि के लिए किसी दूसरे स्वतंत्र व्यक्ति की गवाही भी नहीं ली गई। उन्होंने यह भी कहा कि हाईकोर्ट में कालूराम की अपील पर अभी तक फैसला नहीं आया है।
दोषी ने अपील के लंबित रहने का दिया हवाला
आरोपी के वकील ने कोर्ट को बताया कि कालूराम अधिकतम 10 साल की सजा में से करीब 6 साल 5 महीने जेल में बिता चुका है। बचाव पक्ष ने उसकी हिरासत की अवधि और अपील के लंबित रहने को सजा निलंबित करने के पक्ष में आधार बनाया।
हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2026 के कस्टडी सर्टिफिकेट का जिक्र करते हुए कहा कि आरोपी 6 साल, 5 महीने और 6 दिन की सजा भुगत चुका था। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि उसकी अपील का अभी तक निस्तारण नहीं हुआ है।
सरकारी वकील ने किया विरोध
राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध किया गया। सरकारी वकील ने आरोपी की हिरासत से संबंधित सर्टिफिकेट कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने इस रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले पर विचार किया।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के तीन फैसलों का हवाला दिया। इनमें भगवान रामा शिंदे गोसाई बनाम गुजरात राज्य (1999), NCB बनाम लखविंदर सिंह (2025) और अतुल बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2024) के फैसले शामिल हैं।
इन फैसलों में अपील लंबित रहने के दौरान सजा सस्पेंड करने और दोषी को जमानत देने से जुड़े कानूनी सिद्धांतों पर विचार किया गया था।
इन फैसलों का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए सजा सस्पेंड करने की अर्जी पर विचार किया जा सकता है।
कालूराम के मामले में कोर्ट ने उसकी जेल में बिताई गई अवधि और अपील का अब तक फैसला नहीं होने के तथ्य पर गौर किया। इसके बाद जस्टिस अशोक कुमार जैन ने उसकी दूसरी याचिका स्वीकार कर ली।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सजा सस्पेंड करने का फैसला मामले के अंतिम नतीजे या अपील के गुण-दोष पर कोई राय दिए बिना किया गया है।
50 हजार रुपए के बॉन्ड पर सजा सस्पेंड
हाईकोर्ट ने अपील का निस्तारण होने तक कालूराम की सजा निलंबित करने का आदेश दिया है। जमानत पर रिहाई के लिए उसे ₹50,000 का व्यक्तिगत मुचलका और ₹25,000-₹25,000 के दो जमानती पेश करने होंगे।
उसे 17 नवंबर 2026 को हाईकोर्ट में पेश होना होगा। इसके बाद भी अपील का फैसला होने तक जब भी कोर्ट बुलाएगा, उसे उपस्थित होना पड़ेगा।
हाईकोर्ट ने जमानत की शर्तें भी लगाईं
हाईकोर्ट ने शर्त लगाई है कि रिहाई के बाद कालूराम किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होगा। ऐसा पाए जाने पर सजा निलंबित करने का आदेश वापस लिया जा सकता है। इसके अलावा उसे हर साल जनवरी में ट्रायल कोर्ट में उपस्थित होना होगा।
यदि कालूराम अपना निवास स्थान बदलता है, तो उसे नए पते की लिखित जानकारी ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट में पैरवी कर रहे अपने वकील को देनी होगी। उसके जमानती अपना पता बदलते हैं, तो इसकी लिखित सूचना भी ट्रायल कोर्ट को देनी होगी।
हाईकोर्ट का यह आदेश केवल अपील लंबित रहने के दौरान सजा निलंबित करने से संबंधित है। इससे ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि का फैसला रद्द नहीं हुआ है। मामले में अपील पर अंतिम निर्णय होना अभी बाकी है।
