जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि जेल में बंद होने से किसी व्यक्ति के संपत्ति संबंधी अधिकार खत्म नहीं हो जाते।
हाईकोर्ट ने जयपुर की सेंट्रल जेल में बंद एक आरोपी को अपने भाई के नाम जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) बनवाने और उसका रजिस्ट्रेशन कराने के निर्देश दिए हैं।
आरोपी परिवार की आर्थिक तंगी के चलते अपनी संयुक्त संपत्ति में हिस्सेदारी बेचना चाहता है, लेकिन जेल में बंद होने के कारण खुद दस्तावेजों की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पा रहा था।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने स्पेशल जज, NDPS केस, जयपुर मेट्रोपॉलिटन-I के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की मांग खारिज कर दी गई थी।
हाईकोर्ट ने जयपुर सेंट्रल जेल के सुपरिंटेंडेंट को GPA प्रमाणित कराने और उसका रजिस्ट्रेशन जल्द कराने के निर्देश दिए। हालांकि, प्रॉपर्टी बेचने से पहले आरोपी को ट्रायल कोर्ट से अनुमति लेनी होगी।
याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट अश्विन गर्ग के साथ अनुतोष मिश्रा ने पैरवी की। वहीं, सरकार की ओर से स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर जितेंद्र सिंह पूनिया और पब्लिक प्रॉसिक्यूटर मानवेंद्र सिंह शेखावत पेश हुए।
परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण संपत्ति बेचना चाहता था आरोपी
मामला जयपुर निवासी आनंद सिंह से जुड़ा है, जो NDPS मामले में न्यायिक हिरासत में है। वो अपने भाई दिलीप सिंह के नाम GPA बनाना चाहता था, ताकि संयुक्त रूप से मालिकाना हक वाली संपत्ति को बेचने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सके।
आनंद सिंह की ओर से कोर्ट को बताया गया कि परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और संपत्ति का कुछ हिस्सा बेचने की जरूरत है।
उसने कहा कि जेल में बंद होने के कारण वह खुद दस्तावेज तैयार कराने और रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए बाहर नहीं जा सकते।
इसलिए वह अपने भाई को पावर ऑफ अटॉर्नी देना चाहते थे, ताकि भाई उनकी ओर से जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर सके।
NDPS कोर्ट ने खारिज कर दी थी मांग
आरोपी आनंद सिंह ने स्पेशल जज, NDPS केस, जयपुर मेट्रोपॉलिटन-I के सामने आवेदन देकर मांग की थी कि जेल में रहते हुए उन्हें अपने भाई दिलीप सिंह के नाम GPA बनवाने और उसका रजिस्ट्रेशन कराने की अनुमति दी जाए।
इसके लिए जेल सुपरिंटेंडेंट को जरूरी निर्देश देने की मांग की गई थी। लेकिन 3 जून 2025 को NDPS कोर्ट ने उनका आवेदन खारिज कर दिया।
इसके बाद आरोपी आनंद सिंह ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस आदेश को चुनौती दी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने भी याचिका का विरोध किया।
सरकार ने कहा- अपराध की कमाई से खरीदी हो सकती है प्रॉपर्टी
सरकारी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि संबंधित आपराधिक मामले का ट्रायल अंतिम चरण में है।
यह आशंका भी जताई गई कि जिस प्रॉपर्टी में आरोपी अपना हिस्सा बेचना चाहता है, वह अपराध से हासिल रकम से खरीदी गई हो सकती है। ऐसे में संपत्ति से जुड़े लेनदेन की अनुमति देने से पहले सावधानी बरतना जरूरी है।
दूसरी तरफ, आरोपी ने कहा कि जांच एजेंसी ने न तो चार्जशीट के समय और न ही ट्रायल के दौरान ऐसा कोई सबूत पेश किया, जिससे साबित हो कि संबंधित संपत्ति अपराध से हुई कमाई से खरीदी गई थी।
याचिकाकर्ता आनंद सिंह का कहना था कि संपत्ति बेचने की जरूरत परिवार की आर्थिक परेशानी के कारण है और केवल जेल में बंद होने की वजह से उसे अपने अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
‘बिना सबूत सिर्फ शक के आधार पर नहीं छीन सकते अधिकार‘
हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड पर गौर करते हुए कहा कि ऐसा कोई सबूत सामने नहीं है, जिससे यह साबित हो कि संबंधित संपत्ति अपराध से हासिल रकम से खरीदी गई थी।
केवल आशंका या कल्पना के आधार पर किसी व्यक्ति को उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मामले में आरोपी होना अपने आप में संपत्ति संबंधी अधिकार खत्म होने का आधार नहीं है। जेल में बंद व्यक्ति भी कानून के दायरे में अपनी संपत्ति की देखभाल और उससे जुड़े जरूरी फैसले लेने का अधिकार रखता है।
हाईकोर्ट ने कहा- जेल में बंद होना ‘सिविल डेथ’ नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि जेल में बंद होना किसी व्यक्ति की ‘सिविल डेथ’ यानी उसके नागरिक और निजी अधिकारों का पूरी तरह खत्म हो जाना नहीं है।
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 300A का भी जिक्र किया। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा है, जबकि अनुच्छेद 300A के तहत किसी व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ कैदी होने के कारण किसी व्यक्ति के संपत्ति संबंधी अधिकार अपने आप समाप्त नहीं हो जाते।
जेल में GPA बनवाने और रजिस्ट्रेशन कराने का है प्रावधान
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 की धारा 38(1)(b) का हवाला दिया।
इसके तहत जेल में बंद व्यक्ति को रजिस्ट्रेशन कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की जरूरत नहीं होती। रजिस्ट्रेशन अधिकारी जेल जाकर दस्तावेज की प्रक्रिया पूरी कर सकता है या इसके लिए अधिकारी नियुक्त कर सकता है।।
हाईकोर्ट ने राजस्थान प्रिजन रूल्स, 2022 के नियम 202 और नियम 526 का भी जिक्र किया, जिनमें कैदियों के पावर ऑफ अटॉर्नी और संपत्ति संबंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर एवं सत्यापन से जुड़े प्रावधान हैं।
इन नियमों में विचाराधीन और दोषसिद्ध कैदियों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत GPA बनाने की सुविधा दी गई है।
हाईकोर्ट ने दिया GPA रजिस्टर कराने का आदेश
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने NDPS कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए जयपुर सेंट्रल जेल के सुपरिंटेंडेंट को निर्देश दिया कि आनंद सिंह के भाई दिलीप सिंह के पक्ष में GPA प्रमाणित कराने और उसका रजिस्ट्रेशन कराने की प्रक्रिया जल्द पूरी की जाए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जेल में बंद होने के कारण आरोपी को पावर ऑफ अटॉर्नी बनवाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। हालांकि, GPA रजिस्टर कराने के इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि आरोपी को प्रॉपर्टी बेचने की भी अनुमति मिल गई है।
प्रॉपर्टी बेचने से पहले ट्रायल कोर्ट की मंजूरी जरूरी
हाईकोर्ट ने साफ किया कि आनंद सिंह को अपनी संपत्ति में हिस्सेदारी बेचने से पहले ट्रायल कोर्ट में आवेदन देना होगा।
ट्रायल कोर्ट इस आवेदन पर कानून के मुताबिक फैसला करेगा। यानी आरोपी अपने भाई को GPA दे सकता है, लेकिन संपत्ति की बिक्री के लिए पहले ट्रायल कोर्ट की अनुमति लेना जरूरी होगा।