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राजमंदिर में बच्चों को ‘धुरंधर’ दिखाने पर प्रबंधन को राहत, पुलिस जांच की मांग खारिज; कोर्ट बोला-संज्ञेय अपराध के ठोस आधार नहीं

Dhurandhar Screening Row: Jaipur Court Rejects Plea Seeking Police Probe Against Raj Mandir Cinema

जयपुर: राजमंदिर सिनेमा हॉल में नाबालिग को ‘धुरंधर’ फिल्म दिखाने के मामले में थिएटर प्रबंधन के खिलाफ पुलिस जांच कराने की मांग वाली शिकायत खारिज कर दी गई।

परिवादी ने आरोप लगाया था कि 22 दिसंबर 2025 को 15 से 20 नाबालिग बच्चे और बच्चियां फिल्म देखने गए थे। थिएटर प्रबंधन ने नियमों की अनदेखी करते हुए बच्चों को फिल्म देखने दी।

शिकायत में इसे बच्चों के नैतिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक हितों के खिलाफ बताते हुए थिएटर प्रबंधन पर जानबूझकर नियमों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए पुलिस जांच कराने की मांग की थी।

लेकिन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जयपुर महानगर प्रथम की कोर्ट ने मामले में FIR के लिए ठोस आधार नहीं मानते हुए शिकायत खारिज कर दी।

CrPC की धारा 156(3) के तहत पुलिस जांच की थी मांग

परिवादी ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत पुलिस को जांच का आदेश देने की मांग की थी। इस प्रावधान के तहत मजिस्ट्रेट किसी संज्ञेय अपराध की जांच के लिए पुलिस को निर्देश दे सकता है।

शिकायत में आरोप लगाया गया कि नाबालिग बच्चों को ऐसी फिल्म दिखाई गई, जिससे उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। परिवादी का कहना था कि यह बच्चों के हितों के खिलाफ है।

शिकायत में नहीं मिले अपराध के ठोस आधार

परिवादी की CrPC की धारा 156(3) के तहत पुलिस जांच कराने की मांग पर सुनवाई करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट पुलकित शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया।

इनमें सुप्रीम कोर्ट के Kankra Vs State of UP & Another मामले का भी जिक्र किया गया। इस फैसले के मुताबिक, धारा 156(3) के तहत पुलिस जांच का आदेश देते समय मजिस्ट्रेट को मामले के तथ्यों और उपलब्ध सामग्री पर विचार करना चाहिए और आदेश के संभावित परिणामों के प्रति सजग रहना चाहिए।

न्यायिक मजिस्ट्रेट ने माना कि इस मामले में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ऐसा स्पष्ट नहीं हुआ कि कोई संज्ञेय अपराध हुआ है, जिसके लिए धारा 175(3) BNSS के तहत पुलिस जांच का आदेश दिया जाए।

अभिभावकों की शिकायत का भी नहीं मिला जिक्र

आदेश में कहा गया कि परिवादी की शिकायत में ऐसा कोई स्पष्ट तथ्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि किसी नाबालिग बच्चे के अभिभावक ने इस संबंध में शिकायत की थी।

आदेश में यह भी जिक्र किया गया कि परिवादी ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की, जिससे लगे कि ये मामला संज्ञेय अपराध है।

FIR दर्ज कराने के लिए ठोस आधार जरूरी, शिकायत खारिज

आदेश में कहा गया कि किसी परिवाद को यांत्रिक तरीके से FIR दर्ज कराने के लिए पुलिस के पास नहीं भेजा जाना चाहिए। पहले यह देखना जरूरी है कि शिकायत में अपराध के शुरुआती आधार मौजूद हैं या नहीं।

उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पहली नजर में ऐसा कोई संज्ञेय अपराध सामने नहीं आया, जिसके लिए पुलिस जांच का आदेश दिया जाए। इसी आधार पर परिवाद को अस्वीकार कर खारिज कर दिया गया।

हालांकि शिकायत खारिज होने का अर्थ यह नहीं कि किसी फिल्म को नाबालिगों को दिखाने की अनुमति से जुड़े सभी कानूनी सवालों का अंतिम निपटारा हो गया है। आदेश में उपलब्ध शिकायत और सामग्री के आधार पर निर्णय लिया गया है।

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