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कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा ट्रायल से पहले खारिज नहीं कर सकते: राजस्थान हाईकोर्ट सख्त, सिविल कोर्ट का आदेश रद्द; वादपत्र दर्ज करने के आदेश

Rajasthan High Court Holds Special Hearing on Holiday, Orders Dental College to Return Student’s Original Documents by 11 AM Saturday

जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने लंबे समय से जमीन पर कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा करने वाले एक परिवार को राहत दी है।

जस्टिस फरजंद अली ने जोधपुर की जमीन से जुड़े मामले में सिविल कोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें वादपत्र दर्ज करने से पहले जमीन के बाजार मूल्य के आधार पर मुकदमे का मूल्यांकन करने और कोर्ट फीस जमा कराने के निर्देश दिए गए थे।

साथ ही हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट को वादपत्र दर्ज कर मामले की नियमित सुनवाई करने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमा दर्ज करने से पहले ही यह तय नहीं किया जा सकता कि लंबे समय से चले आ रहे कब्जे के आधार पर जमीन का मालिकाना हक हासिल हुआ है या नहीं।

केवल प्रतिकूल कब्जे (एडवर्स पजेशन) से टाइटल मिलने का दावा करने के आधार पर कब्जे की सुरक्षा के लिए दायर मुकदमे को मालिकाना हक की घोषणा वाला मामला नहीं माना जा सकता।

हालांकि, हाईकोर्ट ने साफ किया कि इस आदेश से याचिकाकर्ताओं का मालिकाना हक साबित नहीं होता। प्रतिकूल कब्जे और टाइटल से जुड़े सवालों पर फैसला नियमित सुनवाई के दौरान ही होगा।

प्लॉट पर कब्जे को लेकर सिविल कोर्ट पहुंचा था परिवार

मामला जोधपुर के कमला नेहरू नगर फर्स्ट एक्सटेंशन स्कीम स्थित प्लॉट नंबर 8 से जुड़ा है। निकिता, परमेश्वरी देवी और जयश्री ने इस जमीन पर अपने और अपने पूर्वजों के लंबे समय से कब्जे का दावा करते हुए सिविल कोर्ट में वाद पेश किया था।।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उनके पूर्वजों का कब्जा वर्ष 1987 से और उनका अपना कब्जा वर्ष 2010 से चला आ रहा है।

उन्होंने दावा किया कि यह कब्जा खुला, शांतिपूर्ण, लगातार और बिना रुकावट के रहा है। इसी आधार पर उन्होंने प्रतिकूल कब्जे से जमीन पर मालिकाना हक मिलने की बात कही।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि प्लॉट नंबर 8 उनकी जमीन प्लॉट नंबर 9 के पास स्थित है। प्लॉट नंबर 9 की रजिस्टर्ड सेल डीड में प्लॉट नंबर 8 को उसकी उत्तरी सीमा के रूप में बताया गया है।

याचिका में प्लॉट नंबर 8 को खाली जमीन बताया गया, लेकिन दावा किया गया कि वहां निर्माण नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि उनका कब्जा समाप्त हो गया।

जमीन से बेदखली का डर, परिवार ने कोर्ट से मांगी सुरक्षा

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि 16 अगस्त 2026 को जमीन पर दखल देने और उन्हें जबरन बेदखल करने की आशंका पैदा हुई।

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि 16 अगस्त 2026 को जमीन पर दखल देने और उन्हें जबरन बेदखल करने की आशंका पैदा हुई। इसके बाद उन्होंने सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर प्रतिवादी राजू सिंह को प्लॉट में प्रवेश करने, उस पर कब्जा करने, उन्हें बेदखल करने या उनके मौजूदा कब्जे में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने से रोकने की मांग की।

याचिकाकर्ताओं ने मुकदमे के दौरान अंतरिम राहत के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39, नियम 1 और 2 के तहत आवेदन भी दिया।

उनका दावा था कि लंबे समय से चले आ रहे प्रतिकूल कब्जे के आधार पर जमीन पर उनका मालिकाना हक बन चुका है। ऐसे में वे जमीन पर अपने कब्जे को सुरक्षित रखने के लिए कोर्ट से राहत चाहते हैं।

सिविल कोर्ट ने बाजार कीमत के आधार पर कोर्ट फीस मांगी

याचिकाकर्ताओं ने 17 अगस्त 2026 को सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। 19 अगस्त को अतिरिक्त सिविल जज एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट नंबर-1, जोधपुर मेट्रोपॉलिटन ने जमीन के मूल्यांकन और कोर्ट फीस के सवाल पर विचार किया।

सिविल कोर्ट का मानना था कि याचिकाकर्ता जब प्रतिकूल कब्जे के आधार पर जमीन पर मालिकाना हक मिलने का दावा कर रहे हैं, तो यह केवल स्थायी निषेधाज्ञा का मामला नहीं, बल्कि मालिकाना हक की घोषणा से जुड़ा दावा भी है।

सिविल कोर्ट ने माना कि मालिकाना हक की घोषणा के साथ स्थायी निषेधाज्ञा की राहत भी मांगी गई है।

इसी आधार पर राजस्थान कोर्ट फीस एंड सूट्स वैल्यूएशन एक्ट, 1961 की धारा 24(b) लागू करते हुए याचिकाकर्ताओं से जमीन का बाजार मूल्य बताने और उसके अनुसार कोर्ट फीस जमा कराने को कहा गया।

इस आदेश के चलते वादपत्र का रजिस्ट्रेशन आगे नहीं बढ़ सका। याचिकाकर्ताओं ने इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।

‘कोर्ट फीस की जांच जरूरी, लेकिन मुकदमा रोकना सही नहीं‘

जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि वादपत्र दर्ज करने से पहले कोर्ट फीस और मुकदमे के मूल्यांकन की जांच करना कोर्ट की कानूनी जिम्मेदारी है।

राजस्थान कोर्ट फीस एंड सूट्स वैल्यूएशन एक्ट की धारा 11(1) के तहत कोर्ट को वादपत्र में बताए गए तथ्यों के आधार पर तय करना होता है कि कितनी कोर्ट फीस देय है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कोर्ट वादपत्र दर्ज करने से पहले ही विवाद से जुड़े सभी कानूनी और तथ्यात्मक सवालों का अंतिम फैसला कर दे।

इस शुरुआती स्तर पर यह तय करना कि प्रतिकूल कब्जे (एडवर्स पजेशन) से वास्तव में मालिकाना हक मिला है या नहीं, जमीन पर किसका हक है और याचिकाकर्ता मुकदमे में सफल होंगे या नहीं, नियमित सुनवाई का विषय है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वादपत्र की शुरुआती जांच को मुकदमे के ट्रायल में नहीं बदला जा सकता। इस स्तर पर कोर्ट को मुख्य रूप से यह देखना चाहिए कि याचिकाकर्ताओं ने वास्तव में कौन-सी राहत मांगी है और उस पर कोर्ट फीस का कौन-सा प्रावधान लागू होता है।

‘मालिकाना हक का दावा करना और घोषणा मांगना अलग-अलग बातें’

हाईकोर्ट ने कहा कि वादपत्र में किसी अधिकार के पहले से मौजूद होने का दावा करना और कोर्ट से उस अधिकार की घोषणा करने की राहत मांगना अलग-अलग बातें हैं।

अगर कोई व्यक्ति कहता है कि प्रतिकूल कब्जे के कारण उसे पहले ही मालिकाना हक मिल चुका है और वह अपने कब्जे को बचाने के लिए रोक लगाने की मांग करता है, तो सिर्फ इस दावे के आधार पर मुकदमे को मालिकाना हक की घोषणा से जुड़ा मामला नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के K.M. Krishna Reddy v. Vinod Reddy & Anr. फैसले का भी जिक्र किया।

इसमें कहा गया था कि टाइटल या प्रतिकूल कब्जे का सवाल सामने आने भर से हर निषेधाज्ञा वाले मुकदमे में अलग से मालिकाना हक की घोषणा मांगना जरूरी नहीं हो जाता।

हालांकि, हर मामले में वादपत्र और उसमें मांगी गई राहत को संबंधित तथ्यों के आधार पर देखना जरूरी है।

प्रतिकूल कब्जे से मालिकाना हक मिला या नहीं, फैसला बाद में होगा

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमा दर्ज करने के शुरुआती चरण में यह तय करना सही नहीं है कि लंबे समय से चला आ रहा कब्जा कानूनी रूप से प्रतिकूल कब्जे में बदलकर मालिकाना हक दिलाने के लिए पर्याप्त है या नहीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि जमीन खाली होने, कब्जे की अवधि, कब्जा लगातार और खुले तौर पर रहने तथा असली मालिक के खिलाफ होने जैसे सवालों का फैसला केवल वादपत्र देखकर नहीं किया जा सकता।

इन मुद्दों पर जरूरत के मुताबिक पक्षकारों की दलीलें, दस्तावेज और सबूत देखने होंगे।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि उसने याचिकाकर्ताओं के मालिकाना हक या प्रतिकूल कब्जे के दावे पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।

प्रतिवादी मुकदमे में शामिल होने के बाद कोर्ट फीस, जमीन के मूल्यांकन, मालिकाना हक, कब्जे और मुकदमे की सुनवाई योग्य होने से जुड़े कानूनी सवाल उठा सकते हैं।

हाईकोर्ट ने वादपत्र दर्ज करने के दिए आदेश

हाईकोर्ट ने 19 अगस्त 2026 का सिविल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए याचिका स्वीकार कर ली।

सिविल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह वादपत्र कानून के अनुसार दर्ज करे और उसके बाद मामले को नियमित सिविल मुकदमे के रूप में आगे बढ़ाए। अंतरिम निषेधाज्ञा की अर्जी पर भी कानून के मुताबिक विचार किया जाएगा।

हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि याचिकाकर्ताओं के मालिकाना हक, प्रतिकूल कब्जे और मांगी गई राहत की वैधता से जुड़े सवालों पर सिविल कोर्ट उचित स्तर पर फैसला कर सकती है।

इस तरह हाईकोर्ट ने मुकदमे को शुरुआती स्तर पर रोकने के बजाय नियमित सुनवाई का रास्ता खोल दिया है।

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