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कंपनी के कर्ज के लिए निदेशक की निजी संपत्ति का हिसाब नहीं मांग सकती अदालत, कंपनी का कर्ज, निदेशक की निजी संपत्ति नहीं : राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Upholds Recovery of ₹2.20 Lakh Maintenance Arrears, Explains 12-Month Limitation Rule
49 लाख की वसूली के मामले में हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी-कंपनी और निदेशक अलग कानूनी इकाइयां, केवल धन-वसूली का दावा निजी संपत्ति का खुलासा कराने के लिए पर्याप्त नहीं

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने कंपनी और उसके निदेशक की कानूनी पहचान को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी कंपनी के खिलाफ धन-वसूली का मुकदमा लंबित होने मात्र से उसके निदेशक की निजी चल-अचल संपत्तियों का पूरा ब्योरा नहीं मांगा जा सकता।

केवल कंपनी का निदेशक या शेयरधारक होने के आधार पर किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत संपत्ति को कंपनी की संपत्ति नहीं माना जा सकता।

कंपनी अलग कानूनी इकाई

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने इस महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु को स्पष्ट करते हुए कहा हैं कि

कंपनी अलग कानूनी इकाई है। निदेशक की निजी संपत्ति कंपनी की संपत्ति नहीं है। केवल धन-वसूली का मुकदमा लंबित होने से निदेशक की पूरी निजी संपत्ति का ब्योरा नहीं मांगा जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि इसके लिए ठोस तथ्य और स्वतंत्र कानूनी आधार जरूरी है। और जिस आदेश का कानूनी आधार ही उचित नहीं है, उसका पालन नहीं करने पर कंपनी का बचाव का अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह फैसला राजलक्ष्मी पाइप्स प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं।

हाईकोर्ट ने कॉमर्शियल कोर्ट जोधपुर द्वारा पारित उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें कंपनी और उसके निदेशक से संपत्तियों का विवरण मांगा गया था तथा इसका पालन नहीं करने पर कंपनी का बचाव समाप्त कर दिया गया था।

मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मुक्तेश माहेश्वरी ने पैरवी की.

49 लाख रुपये की वसूली का मामला

मामला 49,06,062 रुपये की वसूली से जुड़ा था। एम/एस श्री पॉलीप्लास्ट ने एम/एस राजलक्ष्मी पाइप्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ कॉमर्शियल कोर्ट में वसूली का मुकदमा दायर किया था।

कंपनी को 17 अगस्त 2021 को एकतरफा कार्यवाही में ले लिया गया था।

बाद में कंपनी की ओर से प्रस्तुत आवेदन स्वीकार करते हुए उसे बचाव का अवसर दिया गया।

कंपनी के निदेशक की बीमारी का हवाला देते हुए लिखित बयान दाखिल करने के लिए समय मांगा गया।

11 मई 2022 को कॉमर्शियल कोर्ट ने लिखित बयान दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया, लेकिन इसके साथ कंपनी की चल-अचल संपत्तियों के अलावा कंपनी के निदेशक गणपत लाल धूत की व्यक्तिगत चल-अचल संपत्तियों का भी खुलासा करने का आदेश दे दिया। आदेश का पालन नहीं करने पर बचाव का अधिकार समाप्त करने की चेतावनी दी गई।

कंपनी ने उसी दिन लिखित बयान दाखिल कर लागत भी जमा कर दी।

इसके बावजूद 28 जून 2022 को उसका बचाव साक्ष्य पेश करने का अधिकार बंद कर दिया गया।

कंपनी का मुकदमा है तो निदेशक की निजी संपत्ति क्यों?

हाईकोर्ट ने पूरे विवाद की जड़ पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा कि यहां मुकदमे में प्रतिवादी कंपनी है, निदेशक व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपनी के गठन के बाद उसे एक अलग कानूनी व्यक्तित्व प्राप्त होता है। कंपनी अपने नाम से संपत्ति रख सकती है, अनुबंध कर सकती है, दायित्व ले सकती है और उसके खिलाफ मुकदमा चल सकता है।

इसलिए कंपनी की संपत्ति और उसके निदेशक की निजी संपत्ति को एक नहीं माना जा सकता।

“निदेशक होने मात्र से उसकी निजी संपत्ति कंपनी की संपत्ति नहीं बन जाती”

हाईकोर्ट ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई व्यक्ति कंपनी का निदेशक या शेयरधारक है, यह तथ्य अपने आप उसकी निजी संपत्तियों को कंपनी की संपत्ति नहीं बना देता।

हाईकोर्ट ने कहा कि व्यक्ति अपने स्वतंत्र स्रोतों से संपत्ति अर्जित कर सकता है और एक से अधिक कंपनियों में हिस्सेदारी भी रख सकता है।

ऐसी व्यक्तिगत संपत्तियां केवल निदेशक या शेयरधारक होने के कारण कंपनी की संपत्ति का हिस्सा नहीं बन जातीं।

अदालत ने कहा कि कंपनी की संपत्ति और व्यक्ति की व्यक्तिगत संपत्ति अलग-अलग कानूनी क्षेत्र हैं।

“लोग आते-जाते रहते हैं, कंपनी बनी रहती है”

फैसले में हाईकोर्ट ने कंपनी के स्वतंत्र कानूनी व्यक्तित्व को समझाते हुए कहा कि कंपनी में शेयरधारक बदल सकते हैं, निदेशक नियुक्त हो सकते हैं, हटाए जा सकते हैं या बदले जा सकते हैं, लेकिन इससे कंपनी का कानूनी व्यक्तित्व समाप्त नहीं होता।

हाईकोर्ट ने कहा कि निदेशक कंपनी का अधिकारी है। केवल निदेशक पद पर होने के कारण वह कंपनी की संपत्तियों का मालिक नहीं हो जाता और न ही उसकी व्यक्तिगत संपत्तियां कंपनी की संपत्ति बन जाती हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का गलत विस्तार नहीं किया जा सकता

कॉमर्शियल कोर्ट ने संपत्तियों का विवरण मांगने के लिए सुप्रीम कोर्ट के राहुल एस. शाह बनाम जिनेंद्र कुमार गांधी फैसले पर भरोसा किया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि उस फैसले में धन-वसूली के मुकदमों में उचित परिस्थितियों में दावे की सुरक्षा के लिए प्रतिवादी से सुरक्षा देने को कहा जा सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर धन-वसूली के मुकदमे में प्रतिवादी की प्रत्येक चल-अचल संपत्ति का पूरा ब्योरा मांगने की असीमित शक्ति निचली अदालत को मिल गई है।

अदालत ने साफ किया कि सुरक्षा मांगना और सभी संपत्तियों का खुलासा कराना दो अलग-अलग बातें हैं।

सिर्फ पैसा मांगने का मुकदमा है, इसलिए संपत्ति की पूरी सूची नहीं मांग सकते

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति या कंपनी के खिलाफ धनराशि का दावा लंबित होना संपत्तियों का पूरा ब्योरा मांगने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

वादी को ऐसे तथ्य और परिस्थितियां सामने रखनी होंगी जिनसे यह पता चले कि प्रतिवादी संभावित डिक्री के निष्पादन को रोकने या उसमें देरी करने के इरादे से अपनी संपत्ति बेचने या हटाने वाला है।

महज आशंका या धन-वसूली का दावा अपने आप में पर्याप्त नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि असाधारण सुरक्षा उपाय को सामान्य प्रक्रियात्मक औपचारिकता में नहीं बदला जा सकता।

निदेशक की निजी संपत्ति मांगने के लिए अलग और ठोस कानूनी आधार जरूरी

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कंपनी के खिलाफ दावे की सुरक्षा के लिए किसी प्रकार का आदेश जरूरी हो, तो कंपनी से उचित सुरक्षा या गारंटी मांगी जा सकती है।

लेकिन कंपनी के निदेशक को उसकी व्यक्तिगत हैसियत में अपनी सभी निजी संपत्तियों का पूरा ब्योरा देने का आदेश देने के लिए अलग और स्वतंत्र कानूनी आधार होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई ठोस आधार सामने नहीं रखा गया था।

बचाव का अधिकार अनुचित आदेश के उल्लंघन पर नहीं छीना जा सकता

फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू कंपनी के बचाव के अधिकार से जुड़ा रहा।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी धन-वसूली के मुकदमे में पक्षकार को केवल इसलिए मुकदमे में भाग लेने से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने ऐसे आदेश का पालन नहीं किया, जो स्वयं अदालत की शक्ति और कानूनी आधार से आगे चला गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि दीवानी मुकदमे में प्रक्रियात्मक अनुशासन जरूरी है, लेकिन बचाव का अधिकार ऐसे आदेश के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता जो संबंधित कानून या जिस फैसले पर भरोसा किया गया है, उसके दायरे में ही न आता हो।

अदालत की प्रक्रिया का उद्देश्य मामले का गुण-दोष के आधार पर फैसला करना है, न कि किसी पक्ष के लिए अतिरिक्त नुकसान का कारण बनना।

राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनों आदेश रद्द किए

हाईकोर्ट ने माना कि 11 मई 2022 के आदेश में कंपनी की सभी चल-अचल संपत्तियों और उसके निदेशक की व्यक्तिगत संपत्तियों का खुलासा कराने का निर्देश इस मामले की परिस्थितियों में उचित नहीं था।

इसके साथ ही 28 जून 2022 को कंपनी का बचाव समाप्त करने वाला परिणामी आदेश भी कायम नहीं रह सकता।

हाईकोर्ट ने दोनों आदेशों को संबंधित हिस्से तक रद्द कर दिया।

कंपनी को फिर मिला मुकदमा लड़ने का पूरा अधिकार

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि कंपनी द्वारा दाखिल लिखित बयान को रिकॉर्ड पर लिया जाए। कंपनी को साक्ष्य पेश करने और कानून के अनुसार मुकदमे का बचाव करने की पूरी अनुमति दी जाए।

साथ ही कॉमर्शियल कोर्ट को मामले की आगे की कार्यवाही शीघ्रता से करने का आदेश दिया गया। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश में की गई टिप्पणियों का प्रभाव मूल धन-वसूली के दावे के गुण-दोष पर नहीं पड़ेगा।

भविष्य में सुरक्षा का आदेश देने की शक्ति निचली अदालत के पास रहेगी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण संतुलन भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि निचली अदालत भविष्य में संभावित डिक्री के लाभ को सुरक्षित करने के लिए कोई उचित आदेश नहीं दे सकती।

यदि मामले के तथ्य और परिस्थितियां कानून के अनुसार ऐसी हों कि दावे की सुरक्षा जरूरी हो, तो निचली अदालत उचित आदेश पारित कर सकती है।

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