तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत से पहले प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में बोले सीजे-हर साल जितने मुकदमे दर्ज हों, कम से कम उतने निस्तारित भी होने चाहिए
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों को अपने न्यायिक कार्यों पर प्राथमिकता से ध्यान देने और लंबित मुकदमों के निस्तारण पर विशेष फोकस करने के निर्देश दिए हैं।
वर्ष 2026 की तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत से पहले गुरुवार देर शाम आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने प्रदेशभर के न्यायिक अधिकारियों को संबोधित करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि उन्हें अन्य कार्यों की अपेक्षा अपने न्यायिक दायित्वों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
राजस्थान की अदालतों में मुकदमों के निस्तारण की दर 93 प्रतिशत होने के कारण हर साल लंबित मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है।
यानी प्रतिवर्ष जितने मुकदमे दर्ज हो रहे हैं, उनमें से लगभग 7 प्रतिशत का निस्तारण नहीं हो पा रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में राजस्थान की न्यायपालिका पर लंबित मुकदमों का बोझ और बढ़ सकता है।
इस स्थिति को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों को दोटूक संदेश दिया है कि वे अपने न्यायिक कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दें और लंबित मुकदमों के निस्तारण में तेजी लाएं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि प्रतिवर्ष जितने मुकदमे दर्ज होते हैं, कम से कम उतने ही मुकदमों का निस्तारण भी होना चाहिए। निस्तारण की दर को 100 प्रतिशत तक पहुंचाने के लिए न्यायिक अधिकारियों को अपने मूल न्यायिक कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना होगा।
करीब आधे घंटे तक चली इस बैठक में राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (रालसा) के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस विनीत कुमार माथुर भी मौजूद रहे। बैठक में आगामी राष्ट्रीय लोक अदालत की तैयारियों, मुकदमों के निस्तारण और न्यायिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई।
हर साल 7 प्रतिशत मुकदमे जुड़ रहे पेंडिंग मुकदमों में
प्रदेश में प्रतिवर्ष दर्ज होने वाले मुकदमों में से लगभग 93 प्रतिशत का ही निस्तारण हो पा रहा है।
इस तरह हर साल दर्ज होने वाले मुकदमों की तुलना में करीब 7 प्रतिशत मामले निस्तारित नहीं हो पाते।
इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि नए दर्ज होने वाले मुकदमों की संख्या और निस्तारित होने वाले मुकदमों की संख्या के बीच यह अंतर बना रहता है, तो लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जाएगा। आने वाले समय में यह स्थिति न्यायपालिका के सामने बड़ी चुनौती बन सकती है।
मुख्य न्यायाधीश ने इसी अंतर को समाप्त करने पर जोर देते हुए कहा कि मुकदमों के निस्तारण की दर को 100 प्रतिशत तक पहुंचाना आवश्यक है।
यानी एक वर्ष में जितने मुकदमे अदालतों में दर्ज हों, कम से कम उतने ही मुकदमों का निस्तारण भी सुनिश्चित किया जाए, ताकि नए मुकदमों के कारण लंबित मामलों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी न हो।
हालांकि, 93 प्रतिशत निस्तारण दर का अर्थ यह नहीं है कि राजस्थान में कुल लंबित मुकदमों में से केवल 7 प्रतिशत ही लंबित हैं। यह आंकड़ा प्रतिवर्ष दर्ज होने वाले मुकदमों की तुलना में उनके निस्तारण की दर को दर्शाता है।
न्यायिक अधिकारियों को साफ संदेश-पहले न्यायिक काम, बाकी गतिविधियां बाद में
बैठक के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक अधिकारियों को अपने न्यायिक दायित्वों पर प्राथमिकता से ध्यान देने के निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालतों में लंबित मुकदमों का निस्तारण उनकी प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश का जोर इस बात पर रहा कि न्यायिक अधिकारी अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहने के बजाय अपने मूल न्यायिक कार्यों को अधिक समय दें।
अदालतों में मुकदमों की सुनवाई, लंबित मामलों का निस्तारण और न्यायिक दायित्वों का प्रभावी निर्वहन न्यायिक अधिकारियों की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश का संदेश स्पष्ट था कि न्यायपालिका पर बढ़ते लंबित मुकदमों के बोझ को नियंत्रित करने के लिए केवल नए प्रयास करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौजूदा न्यायिक व्यवस्था में निस्तारण की गति को भी बढ़ाना होगा। इसके लिए न्यायिक अधिकारियों को अपने कार्यों पर विशेष फोकस करना होगा।
राष्ट्रीय लोक अदालत में एमवी एक्ट के मामलों को लेकर भी सवाल
तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत से पहले आयोजित इस बैठक में मुख्य न्यायाधीश ने राष्ट्रीय लोक अदालत में शामिल किए गए मोटर वाहन अधिनियम (एमवी एक्ट) से संबंधित मामलों को लेकर भी सवाल उठाए।
राष्ट्रीय लोक अदालत में पात्र मामलों का आपसी सहमति के आधार पर निस्तारण किया जाता है। ऐसे में लोक अदालत के लिए मामलों का चयन और उनके निस्तारण की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने एमवी एक्ट के मामलों को लेकर किन विशिष्ट पहलुओं पर सवाल उठाए, इसकी विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।
बैठक के दौरान राष्ट्रीय लोक अदालत की तैयारियों और उसके माध्यम से अधिक से अधिक मामलों के निस्तारण की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर ने दी रालसा के प्रयासों की जानकारी
बैठक में रालसा के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस विनीत कुमार माथुर ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से राष्ट्रीय लोक अदालत के आयोजन को लेकर किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी।
उन्होंने रालसा की तैयारियों और विभिन्न गतिविधियों का उल्लेख किया।
वहीं, मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश देते हुए लंबित मुकदमों के निस्तारण में तेजी लाने और न्यायिक कार्यों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया।
न्यायपालिका के सामने दोहरी चुनौती
मुख्य न्यायाधीश के निर्देशों के पीछे सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राजस्थान की अदालतें प्रतिवर्ष दर्ज होने वाले मुकदमों के बराबर मामलों का निस्तारण कैसे सुनिश्चित करें।
जब निस्तारण की दर 93 प्रतिशत रहती है, तो हर साल नए दर्ज होने वाले मुकदमों की तुलना में लगभग 7 प्रतिशत मामलों का अंतर बना रहता है।
ऐसे में न्यायपालिका के सामने दोहरी चुनौती है।
पहली, पहले से लंबित मुकदमों का निस्तारण करना और दूसरी, नए दर्ज होने वाले मामलों के बराबर मुकदमों का निस्तारण सुनिश्चित करना, ताकि लंबित मामलों का बोझ लगातार न बढ़े।
तीसरी राष्ट्रीय लोक अदालत से पहले न्यायिक अधिकारियों के साथ हुई इस बैठक में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने इसी चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित किया।
उनका स्पष्ट संदेश है कि न्यायिक कार्यों को प्राथमिकता देकर और निस्तारण की दर को 100 प्रतिशत तक पहुंचाने का