टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

टैक्स रिफंड पर विभाग को देना ही होगा ब्याज, विभाग नहीं बच सकता जिम्मेदारी से, कंपनी को तीन माह में ब्याज राशि का भुगतान करने का आदेश-करदाताओं के अधिकारों के हित में हाईकोर्ट का अहम फैसला

Rajasthan High Court Refuses to Suspend Life Sentence in Murder Case, Cites Eyewitness Testimony and Weapon Recovery

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने करदाताओं के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया कि जब कानून किसी रिफंड योग्य राशि पर ब्याज देने का वैधानिक दायित्व निर्धारित करता है, तो सरकारी विभाग इससे बच नहीं सकता। केवल टैक्स की मूल राशि वापस कर देना पर्याप्त नहीं है, यदि लागू कानून उस राशि पर ब्याज के भुगतान को भी अनिवार्य बनाता है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने मेसर्स क्वालिटी कंड्यूट प्राइवेट लिमिटेड की याचिका स्वीकार करते हुए वाणिज्यिक कर विभाग को राजस्थान बिक्री कर अधिनियम, 1994 की धारा 56 के अनुसार रिफंड की गई राशि पर वैधानिक ब्याज देने का आदेश दिया हैं.

अदालत ने भुगतान के लिए आदेश की तारीख से तीन महीने की समय-सीमा तय की।

हाईकोर्ट की सबसे अहम टिप्पणी रही कि जब कानून विभाग को रिफंड की गई राशि पर ब्याज देने के लिए बाध्य करता है, तो विभाग के पास इस वैधानिक दायित्व से बचने का कोई रास्ता नहीं है।

हाईकोर्ट के इस आदेश में अदालत ने संबंधित कानून के स्पष्ट प्रावधान पर जोर देते हुए कंपनी को राहत दी।

₹5,96,035 का रिफंड मिला, लेकिन ब्याज नहीं; कंपनी ने हाईकोर्ट में उठाया सवाल

जोधपुर स्थित मेसर्स क्वालिटी कंड्यूट प्राइवेट लिमिटेड ने अपने निदेशक महेंद्र कुमार अग्रवाल के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कंपनी का वाणिज्यिक कर विभाग के साथ कर विवाद लंबित था।

विवाद के दौरान विभाग की ओर से दायर एस.बी. सिविल (सेल्स टैक्स) रिवीजन को राज्य सरकार के वाणिज्यिक कर विभाग द्वारा 14 अक्टूबर 2022 को जारी सर्कुलर के आधार पर वापस ले लिया गया।

यह कदम राजस्थान स्टेट लिटिगेशन पॉलिसी, 2018 के तहत निर्धारित मौद्रिक सीमाओं के अनुरूप उठाया गया था।

इसके बाद कंपनी को 11 अगस्त 2023 को ₹5,96,035 की कर राशि वापस कर दी गई। लेकिन इस रकम पर वैधानिक ब्याज का भुगतान नहीं किया गया।

कंपनी की ओर से अधिवक्ता ऋषि सोनी ने अदालत में दलील दी कि विभाग मूल राशि वापस करने के बाद ब्याज के भुगतान से अपने दायित्व की इतिश्री नहीं कर सकता।

जब कानून स्पष्ट रूप से ब्याज का प्रावधान करता है, तो उसका पालन करना संबंधित अधिकारियों के लिए अनिवार्य है।

याचिकाकर्ता ने ब्याज के रूप में ₹14,15,500 जारी करने की मांग की थी।

इसके अतिरिक्त, वैधानिक रिफंड अवधि के बाद हुई देरी के लिए अतिरिक्त ब्याज और अनुचित विलंब के लिए मुआवजे की मांग भी की गई थी।

हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में ब्याज की कोई निश्चित कुल राशि तय नहीं की।

अदालत ने विभाग को कानून के अनुसार वैधानिक ब्याज का भुगतान करने का निर्देश दिया।

सरकार ने मुकदमा वापस लेने के पीछे बताई लिटिगेशन पॉलिसी

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता महावीर बिश्नोई ने अधिवक्ता हर्षवर्धन सिंह के साथ पक्ष रखा और याचिका का विरोध किया।

सरकार की ओर से बताया गया कि राजस्थान स्टेट लिटिगेशन पॉलिसी, 2018 के तहत कम कर प्रभाव वाले मामलों में अनावश्यक मुकदमेबाजी समाप्त करने के लिए मौद्रिक सीमाएं निर्धारित की गई थीं।

इसके अनुसार, राजस्थान टैक्स बोर्ड के समक्ष लंबित मामलों में ₹5 लाख से कम और राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष लंबित रिवीजन में ₹15 लाख से कम कर प्रभाव वाले मामलों को वापस लेने की नीति अपनाई गई थी।

इसी नीति के तहत लंबित मामलों की समीक्षा की गई और निर्धारित सीमा में आने के कारण संबंधित विभागीय रिवीजन वापस ली गई।

लेकिन मामले में महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि जब विभागीय मुकदमा वापस लेने के बाद कंपनी को कर की राशि लौटा दी गई, तो क्या उस पर कानून के तहत देय ब्याज का भुगतान किए बिना विभाग अपने दायित्व से मुक्त हो सकता है?

धारा 56 का स्पष्ट प्रावधान बना फैसले का आधार

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान बिक्री कर अधिनियम, 1994 की धारा 56 का परीक्षण किया।

इस धारा की उपधारा (1) के अनुसार, अधिनियम के तहत किसी डीलर को रिफंड योग्य राशि की जमा की पुष्टि होने के बाद संबंधित आकलन प्राधिकारी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उस राशि को वापस करेगा। इसमें नकद भुगतान या अन्य कर देयता के विरुद्ध समायोजन का विकल्प शामिल है।

इसी प्रावधान में रिफंड योग्य राशि पर जमा करने की तारीख से 15 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज देने का उल्लेख है।

खंडपीठ ने पाया कि संबंधित कर विवाद का अंत विभागीय रिवीजन वापस लिए जाने के बाद हुआ और कंपनी को ₹5,96,035 की मूल राशि रिफंड कर दी गई, लेकिन वैधानिक ब्याज नहीं दिया गया।

अदालत ने धारा 56 के प्रावधान को उद्धृत करने के बाद स्पष्ट किया:

“A plain reading of Section 56 of the Act of 1994 makes it clear that once the statutory provision binds the respondents to pay interest on the refunded amount, there is no way the respondents could escape this statutory obligation.”

जब कानून प्रतिवादी अधिकारियों को रिफंड की गई राशि पर ब्याज देने के लिए बाध्य करता है, तो वे इस वैधानिक जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

अदालत ने संबंधित अधिकारियों के दायित्व को कानून के स्पष्ट प्रावधान से जोड़ते हुए ब्याज के भुगतान को अनिवार्य माना।

याचिका स्वीकार, तीन महीने में ब्याज चुकाने का निर्देश

अपने अंतिम निष्कर्ष में हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका स्वीकार किए जाने योग्य है।

इसके साथ ही खंडपीठ ने प्रतिवादी अधिकारियों को राजस्थान बिक्री कर अधिनियम, 1994 की धारा 56 के अनुसार रिफंड की गई राशि पर वैधानिक ब्याज का भुगतान करने का निर्देश दिया।

अदालत ने आदेश दिया कि ब्याज का भुगतान आदेश की तारीख से तीन महीने के भीतर किया जाए।

इस तरह हाईकोर्ट ने कंपनी को राहत देते हुए स्पष्ट कर दिया कि लागू कानून के तहत ब्याज देय होने पर विभाग केवल मूल रकम लौटाकर अपनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं मान सकता।

गौरतलब है कि कंपनी ने ब्याज के रूप में ₹14,15,500 की मांग की थी, लेकिन अदालत ने अपने आदेश में इस रकम को अंतिम रूप से निर्धारित नहीं किया। भुगतान धारा 56 के अनुसार किया जाना है।

सबसे अधिक लोकप्रिय