प्रयागराज। WhatsApp पर अधिकारी के ‘OK’ लिखने भर से छुट्टी मंजूर होने का निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता।
सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) की इलाहाबाद बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए प्रयागराज से फतेहपुर ट्रांसफर किए गए रेलवे कर्मचारी को राहत देने से इनकार कर दिया और उसकी ट्रांसफर रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।
कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि उसका ट्रांसफर छुट्टी को लेकर हुए विवाद और उसके बाद शुरू हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़ा था।
उसका दावा था कि वरिष्ठ अधिकारी ने WhatsApp पर ‘OK’ लिखकर 17 और 18 जुलाई 2025 की अतिरिक्त छुट्टी मंजूर कर दी थी।
हालांकि, रेलवे ने दलील दी कि छुट्टी की औपचारिक मंजूरी सक्षम अधिकारी से ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट सिस्टम (HRMS) के जरिए मिलना जरूरी थी।
ट्रिब्यूनल ने पाया कि रेलवे ने फतेहपुर में स्टाफ की जरूरत और खाली पद समेत ट्रांसफर के स्वतंत्र प्रशासनिक कारण बताए थे। कर्मचारी ट्रांसफर को दुर्भावना से प्रेरित या छिपी हुई सजा साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सका।
CAT ने स्पष्ट किया कि WhatsApp पर मिला कथित ‘OK’ अपने आप में सक्षम अधिकारी की ओर से छुट्टी मंजूर किए जाने का निर्णायक प्रमाण नहीं है।
मामले में कर्मचारी की ओर से एडवोकेट राकेश कुमार दीक्षित और रेलवे की ओर से एडवोकेट अनिल कुमार ने पैरवी की। सदस्य (न्यायिक) रजनीश कुमार राय ने 7 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाते हुए कर्मचारी की ओर से दायर ओरिजिनल एप्लीकेशन खारिज कर दी।
WhatsApp पर ‘OK’ को लेकर क्या था विवाद?
रेलवे कर्मचारी प्रिया रंजन कुमार प्रयागराज में नॉर्थ सेंट्रल रेलवे के DRM ऑफिस में तैनात थे। उन्होंने 25 जुलाई 2025 के ट्रांसफर ऑर्डर और 28 जुलाई 2025 के रिलीविंग ऑर्डर को CAT में चुनौती दी थी। वह चाहते थे कि ट्रांसफर रद्द कर उन्हें प्रयागराज में ही तैनात रहने दिया जाए।
कर्मचारी का कहना था कि वह 14 से 16 जुलाई 2025 तक तीन दिन की लीव अवेलिंग परमिशन (LAP) पर अपने पैतृक गांव गए थे। उन्होंने 16 जुलाई को WhatsApp के जरिए 17 और 18 जुलाई की दो अतिरिक्त दिनों की छुट्टी मांगी थी।
उनका दावा था कि सीनियर डिविजनल कमर्शियल मैनेजर/कोचिंग हिमांशु शुक्ला ने उनके मैसेज पर ‘OK’ लिखकर छुट्टी मंजूर कर दी थी।
कर्मचारी ने यह भी कहा कि उसने 17 जुलाई को इस बारे में सीनियर डिविजनल कमर्शियल मैनेजर/फ्रेट अतुल यादव को फोन पर जानकारी दी थी। बाद में हुए ट्रांसफर को उसने छुट्टी के विवाद से जोड़ते हुए दंडात्मक कार्रवाई बताया।
CAT ने WhatsApp के ‘OK’ पर क्या कहा?
ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में WhatsApp के जवाब पर विशेष रूप से विचार किया। उसने कहा कि कर्मचारी की ओर से जिस ‘OK’ मैसेज पर भरोसा किया गया, उसे अपने आप में सक्षम अधिकारी द्वारा छुट्टी मंजूर किए जाने का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
इस मामले में रेलवे ने बताया कि हिमांशु शुक्ला 14 से 25 जुलाई 2025 तक ट्रेनिंग पर थे। इस दौरान कमर्शियल डिपार्टमेंट का प्रशासनिक काम सीनियर डिविजनल कमर्शियल मैनेजर/फ्रेट अतुल यादव के पास था।
रेलवे का कहना था कि कर्मचारी की छुट्टी मंजूर करने के लिए सक्षम अधिकारी अतुल यादव थे।
रेलवे ने यह भी बताया कि उसके और नॉर्थ सेंट्रल रेलवे के निर्देशों के अनुसार छुट्टी की मंजूरी HRMS पोर्टल के जरिए लेना जरूरी था। केवल छुट्टी का आवेदन देना ही उसकी मंजूरी नहीं माना जा सकता।
WhatsApp पर ‘OK’ को छुट्टी की मंजूरी का पक्का सबूत नहीं माना
ट्रिब्यूनल ने इन तथ्यों पर गौर करते हुए WhatsApp के जवाब को छुट्टी की मंजूरी का निर्णायक प्रमाण मानने से इनकार कर दिया। इस तरह मामले में अहम सवाल केवल यह नहीं था कि अधिकारी ने ‘OK’ लिखा था या नहीं, बल्कि यह भी था कि क्या छुट्टी सक्षम अधिकारी ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मंजूर की थी।
हालांकि, इस फैसले को यह कहते हुए नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि WhatsApp पर किसी भी तरह की अनुमति का कोई कानूनी महत्व नहीं हो सकता।
ट्रिब्यूनल ने इस मामले के तथ्यों, संबंधित अधिकारी की भूमिका और छुट्टी मंजूर करने की निर्धारित प्रक्रिया को ध्यान में रखकर निष्कर्ष निकाला।
रेलवे ने ट्रांसफर के पीछे बताई प्रशासनिक जरूरत
रेलवे ने ट्रिब्यूनल को बताया कि फतेहपुर रेलवे स्टेशन पर नया एंट्री और बुकिंग ऑफिस बनाया गया था। वहां कामकाज के लिए स्टाफ की तत्काल जरूरत थी और कर्मचारी को एक खाली पद पर तैनात किया गया था।
रेलवे के मुताबिक, कर्मचारी 2019 से प्रयागराज स्थित DRM ऑफिस में काम कर रहे थे और वहां चार साल से अधिक समय पूरा कर चुके थे।
विभाग ने सामान्य कार्यकाल चार साल बताया। ट्रांसफर का प्रस्ताव प्लेसमेंट कमेटी की सिफारिश के बाद सक्षम अधिकारी की मंजूरी से लागू किया गया था।
रेलवे ने इस आरोप से भी इनकार किया कि ट्रांसफर किसी अधिकारी की दुर्भावना के कारण किया गया। उसका कहना था कि यह सामान्य प्रशासनिक फैसला था, जिसका उद्देश्य फतेहपुर में कामकाज की जरूरत पूरी करना था।
सस्पेंशन पहले, ट्रांसफर बाद में और चार्जशीट सबसे आखिर में
कर्मचारी ने दलील दी थी कि छुट्टी से जुड़े विवाद के बाद उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई और उसका ट्रांसफर भी इसी का हिस्सा था। ट्रिब्यूनल ने घटनाक्रम की तारीखों पर गौर किया।
मामले में कर्मचारी को 21 जुलाई 2025 को सस्पेंड किया गया था। इसके बाद 25 जुलाई को ट्रांसफर ऑर्डर जारी हुआ और 28 जुलाई को उसे रिलीव कर दिया गया। कर्मचारी के खिलाफ चार्जशीट 31 जुलाई 2025 को जारी की गई थी।
ट्रिब्यूनल ने माना कि चार्जशीट ट्रांसफर ऑर्डर के बाद जारी हुई थी। केवल बाद में अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ट्रांसफर पहले से ही सजा देने के मकसद से किया गया था।
कर्मचारी ने यह भी आरोप लगाया था कि ट्रांसफर के कारण अनुशासनात्मक कार्रवाई करने वाले सक्षम अधिकारी में बदलाव होगा।
हालांकि, रेलवे ने कहा कि ट्रांसफर से अनुशासनात्मक अथॉरिटी नहीं बदली थी। ट्रिब्यूनल ने पाया कि कर्मचारी यह साबित नहीं कर सका कि ट्रांसफर के कारण उसे अनुशासनात्मक कार्यवाही में कोई नुकसान हुआ।
ट्रांसफर के मामलों में कब दखल दे सकते हैं कोर्ट और ट्रिब्यूनल?
CAT ने सुप्रीम कोर्ट के Somesh Tiwari v. Union of India मामले का हवाला देते हुए ट्रांसफर से जुड़े कानूनी सिद्धांतों पर भी विचार किया।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि ट्रांसफर सामान्यतः सेवा का हिस्सा है। प्रशासनिक जरूरत या जनहित में किए गए ट्रांसफर में कोर्ट और ट्रिब्यूनल आम तौर पर दखल नहीं देते।
हालांकि, अगर ट्रांसफर दुर्भावना से किया गया हो, मनमाना हो, वैधानिक नियमों का उल्लंघन करता हो, अक्षम अधिकारी ने जारी किया हो या निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना सजा देने के लिए किया गया हो, तो उसमें हस्तक्षेप किया जा सकता है।
ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि दुर्भावना के आरोप केवल आशंका या अनुमान के आधार पर स्वीकार नहीं किए जा सकते। इसके लिए विशिष्ट और ठोस तथ्यों का होना जरूरी है।
इस मामले में CAT ने पाया कि रेलवे ने ट्रांसफर के लिए प्रशासनिक कारण बताए थे। कर्मचारी यह साबित करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं बता सका कि आदेश दुर्भावना से प्रेरित था या अनुशासनात्मक सजा देने के लिए प्रशासनिक ट्रांसफर का सहारा लिया गया था।
याचिका खारिज की, अंतरिम आदेश भी हटाया
ट्रिब्यूनल ने सभी दलीलों, दस्तावेजों और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद कहा कि कर्मचारी के ट्रांसफर को दंडात्मक कार्रवाई मानने का पर्याप्त आधार नहीं है।
उसने 25 जुलाई 2025 के ट्रांसफर ऑर्डर और 28 जुलाई 2025 के रिलीविंग ऑर्डर में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
CAT ने कर्मचारी की ओर से दायर ओरिजिनल एप्लीकेशन खारिज कर दी। साथ ही, 19 अगस्त 2025 को जारी अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिया। मामले में खर्च को लेकर कोई आदेश नहीं दिया गया और लंबित विविध आवेदन भी निस्तारित कर दिए गए।
