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BREAKING NEWS: राजस्थान हाईकोर्ट ने गैंगरेप-पॉक्सो मामले के चारों दोषियों को किया बरी, कहा-10वीं की मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि को साबित करने के लिए मूल रिकॉर्ड की जांच जरूरी

Rajasthan High Court Acquits Four Men in Gang Rape and POCSO Case, Cites Failure to Prove Charges Beyond Reasonable Doubt
प्राकृतिक जीवन के अंत तक उम्रकैद की सजा पाने वाले चार आरोपियों को बड़ी राहत; हाईकोर्ट ने कहा—स्कूल रिकॉर्ड में जन्मतिथि दर्ज होने का आधार साबित नहीं, तो बाद में उसी जानकारी पर बनी मार्कशीट अपने आप उम्र का निर्णायक प्रमाण नहीं बन जाती।

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म और अपहरण के एक गंभीर मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए चार आरोपियों की दोषसिद्धि और सजा रद्द कर उन्हें बरी कर दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए पेश की गई 10वीं कक्षा की मार्कशीट, स्कूल में प्रवेश के समय भरे गए फॉर्म, जन्मतिथि दर्ज करने के आधार और संबंधित गवाहों की गवाही का विस्तार से जांच करने और सभी पक्षों की 40 दिन से अधिक दिन तक चली लगातार बहस के बाद ये फैसला दिया हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी दस्तावेज का साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाना और उसमें लिखी जानकारी का प्रमाणित हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं।

जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने यह अहम फैसला सोनू उर्फ सावन सुवालिया व 3 अन्य की याचिका पर दिया हैं।

राजीव सुराणा, वरिष्ठ अधिवक्ता

मामले में ट्रायल कोर्ट ने चारों याचिकाकर्ता आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं और पॉक्सो अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए प्राकृतिक जीवन के अंत तक जेल में रहने की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि और सजा निरस्त कर दी। फैसले में उम्र निर्धारण के अलावा एफआईआर दर्ज होने की परिस्थितियों, पीड़िता के बयानों, चिकित्सकीय साक्ष्यों और DNA रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।

अलवर जिले का मामला, विशेष कोर्ट ने सुनाई थी सजा

अलवर जिले के एक पुलिस थाने में दर्ज मामले के अनुसार 27 सितंबर 2019 की रात करीब 10:30 बजे चार आरोपी पीड़िता को उसके घर से वाहन में ले गए।

गांव के पास बने एक बाड़े में और फिर गांव की नदी के पास सुनसान जगह पर ले जाया गया, जहां उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया।

उसने यह भी आरोप लगाया कि घटना का वीडियो वायरल करने और परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी गई।

शिकायतकर्ता के अनुसार, घटना के बाद उसे घर के पास छोड़ दिया गया और वह पुलिस चौकी पहुंची। बाद में पुलिस थाने में शिकायत दर्ज हुई।

शिकायतकर्ता ने अपनी उम्र 16 वर्ष बताई थी। अभियोजन पक्ष ने 10वीं की मार्कशीट और स्कूल के रिकॉर्ड के आधार पर उसकी जन्मतिथि 3 जनवरी 2003 बताई।

अलवर की विशेष पॉक्सो अदालत ने 2 जून 2023 को चारों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 के तहत सात वर्ष, धारा 366 के तहत दस वर्ष, धारा 366A के तहत दस वर्ष तथा धारा 376D और पॉक्सो अधिनियम की धाराओं 5(g)/6 के तहत प्राकृतिक जीवन के अंत तक कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

आरोपियों ने इस फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।

6 माह तक करीब 60 घंटे सुनवाई

पॉक्सो मामले से जुड़े इस मामले की सुनवाई के लिए यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट में मई 2026 से शुरू हुई।

ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद इस मामले में हाईकोर्ट ने रेगुलर सुनवाई करते हुए कानूनी बिंदु पर विस्तार से चर्चा की।

हाईकोर्ट ने इस मामले में जुलाई से अक्टूबर तक कई बार एक से दो घंटे तक लगातार सुनवाई की।

14 अक्टूबर 2026 को फैसला सुरक्षित रखे जाने से पहले तीन दिन लगातार 4–5 घंटे तक सुनवाई जारी रही।

मामले में खंडपीठ ने 26 अक्टूबर को फैसले का ऑपरेटिव पार्ट सुनाया गया, जिसके बाद विस्तृत फैसला जारी किया गया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव सुराणा, संकल्प सोगानी और पंकज शर्मा ने पैरवी की।

10वीं की मार्कशीट में 3 जनवरी 2003 जन्मतिथि, लेकिन मूल आधार साबित नहीं

मामले में अभियोजन पक्ष का दावा था कि पीड़िता की जन्मतिथि 3 जनवरी 2003 है और 28 सितंबर 2019 को घटना के समय उसकी उम्र 17 वर्ष से कम थी।

उम्र साबित करने के लिए अभियोजन ने 10वीं कक्षा की मार्कशीट, स्कूल का प्रवेश आवेदन फॉर्म और ट्रांसफर सर्टिफिकेट पेश किए।

पीड़िता, उसकी बहन और मां की गवाही भी इस संबंध में प्रस्तुत की गई।

हालांकि, बचाव पक्ष ने इन दस्तावेजों की प्रमाणिकता और उनमें दर्ज जन्मतिथि के मूल आधार पर सवाल उठाए।

वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव सुराणा ने तर्क दिया कि मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि स्वतंत्र रूप से तैयार की गई जानकारी नहीं थी, बल्कि स्कूल के प्रवेश आवेदन फॉर्म में लिखी गई जन्मतिथि पर आधारित थी।

इसलिए यदि मूल प्रवेश फॉर्म में जन्मतिथि दर्ज करने का आधार प्रमाणित नहीं हुआ, तो उसी जानकारी को दोहराने वाली मार्कशीट और ट्रांसफर सर्टिफिकेट से स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो जाती।

स्कूल के प्रवेश फॉर्म में 4 साल की बच्ची के हस्ताक्षर कैसे?

मामले में बचाव पक्ष ने पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए पेश किए गए स्कूल रिकॉर्ड की प्रमाणिकता पर सवाल उठाए।

बचाव पक्ष ने स्कूल में प्रवेश के समय भरे गए फॉर्म और उसमें दर्ज हस्ताक्षरों को लेकर सवाल उठाए।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जब पीड़िता की उम्र लगभग चार वर्ष बताई जा रही थी, तब पहली कक्षा में प्रवेश के समय उसके हस्ताक्षर कैसे दर्ज हुए? इस आधार पर दस्तावेजों की विश्वसनीयता की जांच की मांग की गई।

जस्टिस महेंद्र गोयल की खंडपीठ ने इस पहलू पर विशेष ध्यान दिया।

हाईकोर्ट के अनुसार, मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि का साक्ष्यगत महत्व उस मूल प्रविष्टि की विश्वसनीयता पर निर्भर करता है, जिससे वह जानकारी ली गई थी।

यदि मूल प्रविष्टि का आधार साबित नहीं किया गया या यह स्पष्ट नहीं हुआ कि जन्मतिथि किस जानकारी के आधार पर दर्ज की गई थी, तो बाद के दस्तावेजों में उसी जन्मतिथि का दोहराया जाना अपने आप में स्वतंत्र या अतिरिक्त पुष्टि नहीं माना जा सकता।

पिता ने लिखवाई थी जन्मतिथि, लेकिन उन्हें अदालत में पेश नहीं किया गया

हाईकोर्ट के सामने तथ्य आया कि पीड़िता की मां ने गवाही में बताया था कि स्कूल के प्रवेश आवेदन फॉर्म में जन्मतिथि उसके पिता ने लिखवाई थी।

हालांकि, मां ने यह भी कहा कि उन्हें जानकारी नहीं थी कि पिता ने जन्मतिथि किस आधार पर दर्ज कराई थी।

इस मामले में पीड़िता के पिता, संबंधित स्कूल के प्रधानाध्यापक अथवा स्कूल के किसी ऐसे कर्मचारी को गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया, जो यह बता सकता कि प्रवेश फॉर्म में 3 जनवरी 2003 की जन्मतिथि किस स्रोत से दर्ज की गई थी।

हाईकोर्ट ने पाया कि स्कूल का प्रवेश आवेदन फॉर्म और ट्रांसफर सर्टिफिकेट जांच अधिकारी के माध्यम से प्रदर्शित किए गए थे, लेकिन जन्मतिथि की मूल जानकारी का स्रोत बताने वाला संबंधित व्यक्ति अदालत में पेश नहीं हुआ।

ऐसे में यह स्पष्ट नहीं हो सका कि प्रवेश फॉर्म में दर्ज जन्मतिथि किस आधार पर लिखी गई थी।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Rishipal Singh Solanki v. State of Uttar Pradesh और Birka Shiva v. State of Telangana सहित कई फैसलों का हवाला दिया और समझाया कि स्कूल रिकॉर्ड में जन्मतिथि की प्रविष्टि प्रासंगिक हो सकती है, लेकिन उसका वास्तविक साक्ष्यगत महत्व उसकी प्रमाणिकता और मूल जानकारी के स्रोत पर निर्भर करता है।

केवल किसी दस्तावेज को प्रदर्शित कर देना उसमें दर्ज तथ्य को स्वतः साबित नहीं कर देता।

मां की गवाही में भी उम्र को लेकर स्पष्टता नहीं

हाईकोर्ट ने पीड़िता की मां की गवाही का भी परीक्षण किया। मां ने पीड़िता की उम्र 15 से 16 वर्ष बताई थी, लेकिन जिरह के दौरान उन्होंने कहा कि प्रवेश फॉर्म में जन्मतिथि पीड़िता के पिता ने दर्ज की थी और उन्हें उसका आधार मालूम नहीं था।

अदालत के समक्ष मां का यह बयान भी आया कि जब पीड़िता पहली बार स्कूल गई थी, तब उसकी उम्र लगभग 10 से 12 वर्ष थी।

हाईकोर्ट ने इस कथन को भी रिकॉर्ड पर उपलब्ध अन्य तथ्यों के साथ रखते हुए फैसले में इस बात पर ध्यान दिया गया कि मां ने इसी कथन के दौरान अपनी बात पर प्रश्नचिह्न भी लगाया था।

पीड़िता की बहन ने जन्मतिथि 3 जनवरी 2003 बताई, लेकिन वह भी इस तारीख का आधार नहीं बता सकी।

वहीं, पीड़िता ने स्वयं जन्मतिथि के संबंध में मार्कशीट पर भरोसा किया और जिरह में यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि उसने पहली कक्षा में कब प्रवेश लिया था।

इन परिस्थितियों को एक साथ देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की जन्मतिथि की मूल प्रविष्टि का आधार साबित करने में विफल रहा।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि केवल प्रस्तुत मार्कशीट के आधार पर घटना के समय पीड़िता को नाबालिग मानना सुरक्षित नहीं था। अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।

क्या हर पॉक्सो मामले में 10वीं की मार्कशीट पर्याप्त नहीं होगी?

इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि 10वीं कक्षा की मार्कशीट को पॉक्सो मामलों में महत्व नहीं दिया जाएगा। महत्वपूर्ण अंतर यह है कि किसी प्रमाणपत्र में जन्मतिथि दर्ज होना और विवाद की स्थिति में उस जन्मतिथि का विश्वसनीय रूप से साबित होना अलग-अलग प्रश्न हैं।

हाईकोर्ट ने स्कूल दस्तावेजों की स्वीकार्यता और उनकी प्रमाणिकता के बीच अंतर स्पष्ट किया।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 35 के तहत सरकारी या आधिकारिक रिकॉर्ड में विधिवत दर्ज प्रविष्टियां प्रासंगिक हो सकती हैं।

लेकिन किसी प्रविष्टि की प्रासंगिकता या दस्तावेज का साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य होना अपने आप में उसकी सामग्री को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं करता।

इस मामले में मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि स्कूल के प्रवेश आवेदन फॉर्म से ली गई थी। जब उस मूल प्रविष्टि का आधार साबित नहीं हुआ और जन्मतिथि दर्ज करने वाले व्यक्ति या संबंधित स्कूल अधिकारी की गवाही उपलब्ध नहीं थी, तब अदालत ने उस मार्कशीट को पीड़िता की उम्र निर्णायक रूप से स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।

फैसले में स्पष्ट किया कि जब उम्र विवादित हो और जन्मतिथि के मूल स्रोत पर सवाल उठाए जाएं, तब अदालत को दस्तावेजों की प्रमाणिकता, जानकारी के स्रोत और उपलब्ध मौखिक साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करना होता है।

एफआईआर दर्ज होने की परिस्थितियों पर बहस

उम्र निर्धारण के अतिरिक्त हाईकोर्ट ने एफआईआर दर्ज होने की परिस्थितियों का भी परीक्षण किया।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि शिकायतकर्ता सुबह पुलिस चौकी पहुंची थी, लेकिन वहां दी गई पहली सूचना से संबंधित रिपोर्ट और अभिलेख अभियोजन पक्ष ने पेश नहीं किए।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में उपलब्ध तथ्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करते हुए पाया कि पुलिस चौकी पर दी गई पहली सूचना की वास्तविक परिस्थितियां स्पष्ट करने के लिए आवश्यक साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे।

फैसले में जांच एजेंसी द्वारा मामले की वास्तविक शुरुआत को स्पष्ट नहीं करने पर गंभीर टिप्पणी की गई।

DNA रिपोर्ट पर भरोसा क्यों नहीं किया गया?

इस केस में बचाव पक्ष के लिए दूसरा सबसे बड़ा बिंदु घटना से लिए गए DNA सबूतों को एकत्रित करने से जुड़ा रहा।

मामले में DNA एकत्रित करने से लेकर लैब में पहुंचने के बीच 15 दिन का समय लगा।

इस दौरान DNA कहाँ रखे गए, कैसे रखे गए, सहित कई बिंदुओं पर बचाव पक्ष ने सवाल खड़े किए।

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि नमूनों के संग्रह से लेकर फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी में उनकी प्राप्ति तक उनकी सुरक्षित अभिरक्षा की चैन श्रृंखला नहीं बन रही थी।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि DNA रिपोर्ट पर भरोसा करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि जांच के लिए भेजे गए नमूने वही थे जिन्हें संबंधित व्यक्तियों या स्थानों से एकत्र किया गया था और उनके साथ छेड़छाड़ की संभावना को दूर करने वाली प्रक्रिया प्रमाणित थी।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब नमूनों की सुरक्षित अभिरक्षा और ट्रांसफर की श्रृंखला साबित नहीं हो, तो DNA रिपोर्ट को आरोपियों की संलिप्तता साबित करने के लिए भरोसेमंद आधार नहीं माना जा सकता।

कार की जब्ती और जांच के तरीके पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने इस मामले में गैंगरेप के लिए कथित घटना में इस्तेमाल की गई सफेद डैटसन कार की जब्ती से जुड़ी परिस्थितियों का भी हवाला दिया।

फैसले के अनुसार, कार 2 अक्टूबर 2019 को अलवर जिले के रामबास गांव से लावारिस हालत में जब्त की गई थी। अदालत ने इस प्रक्रिया से संबंधित रिकॉर्ड और जांच के तरीके पर सवाल उठाए।

हाईकोर्ट ने जांच के तरीके को लेकर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि जांच में महत्वपूर्ण कड़ियों का विश्वसनीय रूप से स्थापित होना आवश्यक था।

पीड़िता की गवाही, चिकित्सकीय साक्ष्य और अपहरण के आरोप

हाईकोर्ट ने पीड़िता की गवाही पर भी सवाल खड़े किए। हाईकोर्ट ने माना कि दुष्कर्म के मामलों में यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय, स्वाभाविक और लगातार एक जैसी हो, तो दोषसिद्धि के लिए हमेशा स्वतंत्र पुष्टि अनिवार्य नहीं होती।

लेकिन इस मामले में अदालत को पीड़िता की गवाही उस स्तर की विश्वसनीय नहीं लगी, जिस पर अकेले भरोसा करके दोषसिद्धि कायम रखी जा सके।

मामले में पीड़िता लगातार अपने बयान बदलती रही, जिसे हाईकोर्ट ने बयान में विरोधाभासों, चिकित्सकीय साक्ष्यों और अन्य परिस्थितियों के साथ देखा।

कोर्ट के अनुसार, उपलब्ध चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्य अभियोजन की कहानी को उस तरह से पुष्ट नहीं कर सके, जिस तरह इस मामले में आवश्यक था। अपहरण और अन्य आरोपों से जुड़े साक्ष्यों का भी परीक्षण किया गया।

चारों आरोपियों की दोषसिद्धि और सजा निरस्त

इस महत्वपूर्ण फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट का मुख्य निष्कर्ष रहा कि इस मामले में 10वीं की मार्कशीट में दर्ज जन्मतिथि का मूल आधार साबित नहीं हुआ, पीड़िता की नाबालिग होने की स्थिति संदेह से परे प्रमाणित नहीं हुई और DNA रिपोर्ट के लिए नमूनों को एकत्रित करने से लेकर रिपोर्ट तक सुरक्षित अभिरक्षा की चैन श्रृंखला भी स्थापित नहीं की जा सकी।

अपील पर सुनवाई के बाद खंडपीठ ने चारों दोषियों की अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि और सजा रद्द कर चारों आरोपियों को बरी कर दिया।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित या हिरासत में नहीं हैं, तो उन्हें रिहा किया जाए।

Case Details :

Rajasthan High Court, Jaipur Bench
Case Number :D.B. Criminal Appeal (DB) No. 212/2023
Neutral Citation 2026:RJ-JP:43128-DB
Justice Mahendar Kumar Goyal and Justice Bhuwan Goyal
Date of Judgment : 26 October 2026

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