जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई में बर्खास्तगी से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाते हुए करीब 9 साल ड्यूटी से अनुपस्थित रहने वाली नर्स की बर्खास्तगी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि गैरहाजिरी के लिए कर्मचारी को दोषी ठहराने के बावजूद, उसके लंबे बेदाग सेवा रिकॉर्ड को नजरअंदाज कर सीधे बर्खास्तगी का दंड देना उचित नहीं था।
दरअसल शीला वर्मा 1994 में बीमारी का हवाला देकर छुट्टी पर गई थीं, लेकिन ड्यूटी पर नहीं लौटीं। विभाग ने 2003 में उन्हें बर्खास्त कर दिया।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की बेंच ने माना कि 1977 से 1994 तक उनका सेवा रिकॉर्ड बेदाग रहा था। कोर्ट ने कहा कि नियम 14 के तहत कम कठोर दंड पर विचार किए बिना सीधे बर्खास्तगी की सजा देना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी के आदेश को बदलते हुए 3 महीने में आनुपातिक पेंशन और परिणामी लाभ ब्याज सहित देने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया।
अपीलकर्ता शीला वर्मा की ओर से अधिवक्ता दिविक माथुर ने पैरवी की। राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता अदिति शर्मा और कंचन जोधा पेश हुईं।
1977 में नौकरी लगी, 1994 में छुट्टी पर जाने के बाद नहीं लौटीं
शीला वर्मा की नियुक्ति 1977 में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में नर्स ग्रेड-II के पद पर हुई थी। वर्ष 1991 में उन्हें नर्स ग्रेड-I के पद पर प्रमोशन मिला।
रिकॉर्ड के मुताबिक, वह 9 अप्रैल 1994 को छुट्टी पर गई थीं। उन्होंने तबीयत खराब होने के आधार पर छुट्टी बढ़ाने की मांग की, लेकिन इसके बाद ड्यूटी पर वापस नहीं लौटीं।
उनका कहना था कि उन्होंने कई बार दोबारा ड्यूटी जॉइन करने की अनुमति मांगी, लेकिन विभाग की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला।
इस बीच विभाग ने उन्हें ड्यूटी पर लौटने के निर्देशों की पालना नहीं करने का आरोप लगाते हुए एक और चार्जशीट जारी की। अप्रैल 1996 में उनके दो वार्षिक वेतन वृद्धि भी संचयी प्रभाव से रोक दी गईं।
विभाग ने उनकी गैरहाजिरी को बिना मंजूरी ड्यूटी से दूर रहना माना और अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी।
2003 में बर्खास्तगी, विभागीय अपील भी खारिज हुई
विभाग ने 23 दिसंबर 1995 को शीला वर्मा को चार्जशीट जारी की। उन्होंने जवाब दिया और 22 मार्च 1996 को व्यक्तिगत सुनवाई में भी शामिल हुईं। जांच आगे बढ़ी और 16 जनवरी 2002 को रिपोर्ट तैयार हुई, जिसे 2 मई 2002 के नोटिस के साथ उन्हें भेजा गया।
शीला वर्मा ने जांच पर सवाल उठाते हुए कहा कि आरोप साबित करने के लिए विभागीय गवाहों की जांच नहीं हुई और ड्यूटी पर लौटने के निर्देश दिए जाने का भी पुख्ता प्रमाण नहीं था।
इसके बावजूद विभाग ने 11 मार्च 2003 को उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया। उनकी विभागीय अपील भी 3 जनवरी 2007 को खारिज हो गई।
इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन सिंगल बेंच ने 23 अगस्त 2018 को उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके खिलाफ उन्होंने डिवीजन बेंच में अपील की।
हाईकोर्ट ने कहा- गलती के अनुपात में तय होनी चाहिए सजा
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वह विभागीय जांच में दर्ज किए गए दोष के निष्कर्षों को दोबारा जांचने नहीं जा रही है। कोर्ट ने गैरहाजिरी के मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई के नतीजे को बरकरार रखा।
हालांकि, कोर्ट ने सजा के स्तर पर हस्तक्षेप किया। सुनवाई के दौरान सामने आया कि शीला वर्मा ने 1977 में नौकरी शुरू की थी और 1994 तक उनका सर्विस रिकॉर्ड बेदाग रहा था। इसके बाद वह छुट्टी पर गईं और ड्यूटी पर वापस नहीं लौटीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को आरोप की गंभीरता को देखते हुए सजा तय करनी चाहिए थी। सेवा नियमों में कम गंभीर सजा के विकल्प मौजूद थे, लेकिन विभाग ने सीधे सबसे बड़ी सजा यानी बर्खास्तगी दे दी।
हाईकोर्ट के कहा कि कर्मचारी की गलती और उसके लिए तय की गई सजा के बीच अनुपात होना चाहिए। विभाग को यह भी देखना चाहिए कि क्या कम कठोर दंड देकर अनुशासन बनाए रखने का मकसद पूरा किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी की सजा को जरूरत से ज्यादा कठोर माना
हाईकोर्ट ने कहा कि सेवा कानून का सामान्य सिद्धांत यह है कि बर्खास्तगी जैसी सबसे कठोर सजा तभी उचित हो सकती है, जब कर्मचारी के आचरण की प्रकृति ऐसी हो कि उससे कम सजा देना उचित न हो। लेकिन हर मामले में सबसे कठोर सजा देना जरूरी नहीं है।
इस मामले में कोर्ट ने पाया कि विभाग ने शीला वर्मा के लंबे बेदाग सेवा रिकॉर्ड और कम कठोर दंड की संभावना पर विचार किए बिना सीधे बर्खास्तगी का आदेश दे दिया।
हाईकोर्ट ने उनकी गैरहाजिरी को सही नहीं ठहराया, बल्कि दंड की कठोरता को देखते हुए उसमें हस्तक्षेप किया।
‘नियम 14 के तहत कम कठोर दंड पर विचार किए बिना बर्खास्तगी अनुचित‘
हाईकोर्ट ने राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के नियम 14 का जिक्र किया। कोर्ट के मुताबिक, विभाग ने इस नियम के तहत उपलब्ध कम कठोर दंडों पर विचार किए बिना सीधे सबसे कड़ी सजा यानी बर्खास्तगी दे दी।
हाईकोर्ट ने माना कि कर्मचारी के कदाचार और सजा के बीच अनुपात होना चाहिए था। इसी आधार पर कोर्ट ने बर्खास्तगी के दंड को बदलने का फैसला किया।
आदेश के अंतिम हिस्से में कोर्ट ने नियम 14 के तहत परिकल्पित आनुपातिक पेंशन के साथ बर्खास्तगी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘देव सिंह बनाम पंजाब टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड‘ का हवाला दिया।
इस फैसले में कहा गया था कि ‘यदि कर्मचारी के आचरण की तुलना में सजा पूरी तरह असंगत हो और न्यायिक विवेक को झकझोरती हो, तो कोर्ट उसमें हस्तक्षेप कर सकती है।’
हाईकोर्ट की बेंच ने इसी कानूनी सिद्धांत और मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बर्खास्तगी की सजा में बदलाव करना उचित माना।
बर्खास्तगी की जगह अनिवार्य सेवानिवृत्ति, पेंशन भी मिलेगी
हाईकोर्ट ने शीला वर्मा की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया। कोर्ट ने उन्हें सेवा नियमों के अनुसार आनुपातिक पेंशन देने का निर्देश दिया।
इसका मतलब है कि कोर्ट ने उन्हें नौकरी पर बहाल करने का आदेश नहीं दिया। बर्खास्तगी की जगह अनिवार्य सेवानिवृत्ति का दंड दिया गया है और पेंशन व अन्य परिणामी लाभ सेवा नियमों के अनुसार तय किए जाएंगे।
3 महीने में पूरी करनी होगी प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह आदेश को कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किए जाने की तारीख से 3 महीने के भीतर शीला वर्मा के मामले में दोबारा प्रक्रिया पूरी करे। इस दौरान सेवा नियमों के अनुसार परिणामी लाभ और लागू ब्याज भी देना होगा।
