जोधपुर, 17 सितंबर
राजस्थान हाईकोर्ट ने नागौर पुलिस द्वारा दहेज प्रताड़ना मामले में बिना नोटिस दिए दो भाइयों को गिरफतार करने पर कड़ी फटकार लगाई हैं.
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार मामले में जारी गाइडलाइन का हवाला देते हुए नागौर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं.
जस्अिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने कहा कि गिरफतारी से पूर्व किसी भी व्यक्ति को धारा 41ए के तहत नोटिस देना जरूरी हैं.
बीकानेर के गंगाशहर निवासी दो भाइयों को नागौर महिला थाने की पुलिस ने 15 जून 2024 को दहेज प्रताड़ना सहित अन्य धाराओं में गिरफ्तार किया था.
गिरफ्तारी से पहले पुलिस ने धारा 41ए के तहत अनिवार्य नोटिस तक नहीं दिया, जबकि सात वर्ष या उससे कम सजा वाले अपराधों में आरोपी को नोटिस देकर पूछताछ के लिए बुलाना जरूरी होता हैं.
याचिका में यह भी बताया गया कि दोनों भाइयों को 16 जून को मकराना न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया, जहां से उन्हें 18 जून तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.
मजिस्ट्रेट ने अनदेखी की
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में मजिस्ट्रेट ने भी अर्नेश कुमार गाइडलाइन की अनदेखी की. गिरफ्तारी की वैधता और आवश्यकता सुनिश्चित करना मजिस्ट्रेट का कर्तव्य था।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस ने भ्रष्टाचार करते हुए निष्पक्ष जांच नहीं की और जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का उल्लंघन किया.
याचिका में कहा गया कि पुलिस ने धारा 377 जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही असंवैधानिक घोषित की जा चुकी है को भी मामले में जोड़ा, ताकि गाइडलाइन से बचा जा सके.
हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीर मानते हुए स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और रजिस्ट्रार जनरल को छह सप्ताह के भीतर इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की नजीर में गाईडलाईन जारी करने के आदेश दिए.