जयपुर, 21 सितंबर
देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ पूर्व कानून मंत्री के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कि गयी हैं.
पूरण चन्द्र सेन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले पर विस्तृत सुनवाई के लिए 23 सितंबर को दोपहर 2 बजे सुनवाई तय की हैं.
साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने इस याचिका पर कोर्ट की सहायता के लिए राज्य के महाधिवक्ता और एडिशनल सॉलिस्टर जनरल को कहा हैं.
पूरण चन्द्र सेन एक अधिवक्ता है जिनके द्वारा यह याचिका दायर कि गयी हैं. जस्टिस सुदेश बंसल की अदालत ने अधिवक्ता से भी उनकी सनद पेश करने के आदेश दिए हैं.
याचिका में आरोप है कि नागरिकता अधिनियम का संशोधन भारत की धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध है और शीर्ष पदाधिकारियों द्वारा संविधान की धारा 99 के तहत ली गई शपथ का उल्लंघन हुआ है.
नोटिस जारी करने से पहले..
हाईकोर्ट ने याचिका पर अभी तक औपचारिक रूप से सुनवाई शुरू नहीं की है, और नोटिस जारी करने से पहले कुछ अहम निर्देश जारी किए गए हैं.
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया है कि वह याचिका की प्रति राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (Additional Solicitor General) को सौंपें, ताकि वे इस मामले में अदालत की सहायता कर सकें.
हाईकोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता द्वारा लक्ष्मणगढ़, अलवर की न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में दर्ज की गई आपराधिक शिकायत से संबंधित रिकॉर्ड भी तत्काल प्रभाव से मंगवाने के आदेश दिए हैं.
साथ ही हाईकोर्ट ने अधिवक्ता को भी आदेश दिया हैं कि वह अगली सुनवाई पर हाईकोर्ट में राजस्थान राज्य बार काउंसिल द्वारा जारी अपना अधिवक्ता पंजीकरण प्रमाणपत्र (Sanad) अदालत में प्रस्तुत करें.
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई 23 सितंबर को तय की हैं. अगली सुनवाई की तिथि पर हाईकोर्ट यह तय करेगी कि नोटिस जारी किए जाएं या नहीं।
नागरिकता संशोधन अधिनियम
याचिका में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) से संबंधित गंभीर आरोपों की अनदेखी करने के लिए पुलिस और न्यायालयों पर निष्क्रियता का आरोप लगाया गया है.
याचिका पुरन चंदर सेन द्वारा दायर की गई है, जिसमें उन्होंने राज्य सरकार, पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाम, पूर्व कानून मंत्री रविशंकर और अन्य प्रतिवादियों को पक्षकार बनाया है।
क्या हैं मामला
यह मामला नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 से जुड़ी कथित साम्प्रदायिक घटनाओं पर प्राथमिकी दर्ज न होने, पुलिस की निष्क्रियता और न्यायिक प्रक्रिया में अनदेखी को लेकर दायर कि गयी हैं.
याचिकाकर्ता पूरण चंदर सेन ने 12 अक्टूबर 2020 को थाना गोविंदगढ़, अलवर में गंभीर संज्ञेय अपराधों की रिपोर्ट दी थी.
एफआईआर दर्ज न होने पर उन्होंने पुलिस अधीक्षक को धारा 154(3) सीआरपीसी के तहत आवेदन दिया, लेकिन फिर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई।
इसके बाद उन्होंने लक्ष्मणगढ़ के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आपराधिक शिकायत प्रस्तुत की, जिसे क्षेत्राधिकार की कमी बताकर 21 अक्टूबर 2020 को खारिज कर दिया गया.
रिवीजन याचिका के स्थान पर उच्च न्यायालय में धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दाखिल की गई, जिस पर कोर्ट ने उन्हें 30 दिनों में रिवीजन दाखिल करने का निर्देश दिया.
समय रहते याचिकाकर्ता ने रिवीजन दाखिल कि लेकिन उसे भी 20 फरवरी 2025 को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि ‘ललिता कुमारी बनाम राज्य’ का मामला इस पर लागू नहीं होता.
मुख्य कानूनी मुद्दा
याचिकाकर्ता ने इस याचिका में कानूनी मुद्दा उठाते हुए कि क्या पुलिस को संज्ञेय अपराध की सूचना पर अनिवार्य रूप से एफआईआर दर्ज करनी चाहिए?
याचिकाकर्ता का कहना है कि पुलिस और निचली अदालतों की निष्क्रियता संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन है.
याचिका में यह भी आरोप है कि नागरिकता अधिनियम का संशोधन भारत की धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध है और शीर्ष पदाधिकारियों द्वारा संविधान की धारा 99 के तहत ली गई शपथ का उल्लंघन हुआ है.