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स्वर्गीय पिता के बैंक लॉकर से मिले 15.50 लाख के पुराने नोट, मुद्रा विनिमय को लेकर हाईकोर्ट ने केन्द्र और रिजर्व बैंक को जारी किया नोटिस

Rajasthan High Court,

जोधपुर, 16 अक्टूबर

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अनोखे विमुद्रीकरण मामले में केंद्र सरकार, भारतीय रिज़र्व बैंक और ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स को नोटिस जारी किया है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद मामले में नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है

हाईकोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए कहा कि यह मामला “न्यायसंगतता और संपत्ति के संवैधानिक संरक्षण” से जुड़ा गंभीर प्रश्न उठाता है।

लॉकर से मिले पुराने नोट

याचिकाकर्ता रणवीर सिंह ने अधिवक्ता विपुल सिंघवी के जरिए याचिका दायर करते हुए अदालत से अनुरोध किया कि याचिकाकर्ता के स्वर्गीय पिता का एक बैंक लॉकर ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स में था।

संपत्ति विवाद के चलते यह बैंक लॉकर उत्तराधिकार वाद के दौरान कोर्ट और बैंक की अभिरक्षा में सील था।

इसी दौरान नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी के चलते देश में 500 और 1000 रुपये के नोट विमुद्रीकृत किए गए।

जिसके चलते देश में 500 और 1000 रुपये के नोट खत्म कर दिए गए और एक समयसीमा में इन नोटों को बदलने की स्वतंत्रता दी गई।

लेकिन कोर्ट में चल रहे वाद के चलते याचिकाकर्ता को बड़ी कानूनी लड़ाई के बाद वर्ष 2018 में अदालत के आदेश से यह बैंक लॉकर खोला गया।

बैंक लॉकर खोले जाने पर उसमें से 500 और 1000 रुपये के नोटों की कुल ₹15.50 लाख की विमुद्रीकृत मुद्रा मिली।

कानूनी प्रक्रिया के चलते याचिकाकर्ता को अपने पिता से मिली संपत्ति का प्रयोग नहीं कर सकता था क्योंकि इस मामले में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा तय की गई मुद्रा विनिमय की समयसीमा समाप्त हो चुकी थी।

अदालती प्रक्रिया से नुकसान ना हो

याचिकाकर्ता ने कहा कि इसमें उनका कोई दोष नहीं है क्योंकि यह लॉकर बैंक की अभिरक्षा में सील था और अदालत के आदेश से बाद में खोला गया, जब मुद्रा विनिमय की समयसीमा समाप्त हो चुकी थी।

अधिवक्ता विपुल सिंघवी ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के पास उस अवधि में लॉकर तक पहुँचने का कोई अधिकार नहीं था, इसलिए मुद्रा का विनिमय करना असंभव था।

अधिवक्ता ने कहा कि इस आधार पर राहत न देना अनुच्छेद 300-ए के तहत संपत्ति से वंचन और अनुच्छेद 14 के तहत मनमानी का मामला बनता है।

याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता को अदालत की प्रक्रिया के कारण नुकसान नहीं होना चाहिए और याचिका में केवल न्यायसंगत राहत—देनदारी की स्वीकृति या समुचित क्षतिपूर्ति—मांगी गई है।

बहस सुनने के बाद कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने प्रारंभिक रूप से मामला विचारणीय पाया और सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर उत्तर प्रस्तुत करने का आदेश दिया।

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