जोधपुर, 1 दिसंबर
Rajasthan Highcourt ने एनडीपीएस एक्ट से जुड़े एक मुकदमे में जांच कर रहे दो पुलिस अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका पर सख्त नाराज़गी जताते हुए दोनों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
जस्टिस सुदेश बंसल की एकलपीठ ने जांच में पुलिस अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका के आधार पर आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि केस डायरी और उपलब्ध सामग्री से पता चलता है कि आरोपी को बिना ठोस साक्ष्य के मामले में शामिल किया गया, जिससे पुलिस जांच की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
Highcourt ने बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस जांच प्रथम दृष्ट्या पक्षपातपूर्ण, मिलीभगतपूर्ण और अनुचित प्रतीत होती है।
हनुमानगढ़ SP को दिए आदेश
Rajasthan Highcourt ने हनुमानगढ़ के पुलिस अधीक्षक को आदेश दिया है कि वह दोनों सब इंस्पेक्टर—एसआई लाल बहादुर चांद और तत्कालीन एसआई जगदीश—की भूमिका की जांच कर उचित एवं आवश्यक कार्रवाई करे।
Highcourt ने स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो, इसके लिए कड़े कदम उठाए जाना जरूरी है।
एफआईआर में मौजूद दोनों पुलिसकर्मी—दौलतराम और हरिराम—ने भागने वाले व्यक्ति की पहचान जितेंद्र सिंह के रूप में की थी। दोनों ने अपने 161 CrPC के बयानों में भी यही नाम दोहराया।
बचाव पक्ष में दलील
याचिकाकर्ता काका सिंह की ओर से अधिवक्ता Sanjeev Beniwal ने अदालत को बताया कि जांच अधिकारी ने बिना किसी तार्किक आधार के प्राथमिक आरोपी जितेंद्र सिंह को एक बिना स्टांप वाले हलफनामे के आधार पर क्लीन चिट दी है।
इस हलफनामे में जितेंद्र सिंह ने दावा किया कि मोटरसाइकिल छोड़कर भागने वाला व्यक्ति वह नहीं, बल्कि काका सिंह था।
प्राथमिक आरोपी के बयान के आधार पर याचिकाकर्ता को पुलिस ने छह माह बाद गिरफ्तार किया।
अधिवक्ता ने कहा कि काका सिंह और जितेंद्र सिंह के बीच कोई कॉल रिकॉर्ड, व्हाट्सएप चैट, वित्तीय लेन–देन या अन्य कोई कड़ी मौजूद नहीं है।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि घटना की तारीख तक काका सिंह का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि प्राथमिक आरोपी के हलफनामे के आधार पर उसे क्लीन चिट देना और उसी हलफनामे के आधार पर याचिकाकर्ता को आरोपी बना देना पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
कोर्ट ने अभियोजन के इस तर्क को भी खारिज किया कि मामले में आरोपी बनाए जाने के बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ एक अन्य मुकदमा दर्ज है।
कोर्ट ने कहा कि बाद में दर्ज मामला वर्तमान एफआईआर में पूर्व अपराध के रूप में नहीं गिना जा सकता।
हाईकोर्ट ने मामले की जांच कर रहे तत्कालीन सब इंस्पेक्टर जगदीश और वर्तमान आईओ लाल बहादुर चांद की भूमिका पर संदेह जताते हुए कहा कि उनकी जांच पक्षपातपूर्ण, मिलीभगतपूर्ण और अनुचित प्रतीत होती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन अधिकारियों की कार्यशैली न्यायिक प्रक्रिया और निष्पक्ष जांच के सिद्धांतों के विपरीत है।
बिना स्टांप हलफनामा
बचाव पक्ष में अधिवक्ता ने दलील दी कि जिस हलफनामे के आधार पर जांच अधिकारी याचिकाकर्ता को आरोपी बना रहे हैं, वह बिना स्टांप यानी बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए और बिना मुहर का हलफनामा है।
4 दिन बाद दूसरा मुकदमा
Highcourt ने इस पर भी सवाल खड़े किए कि याचिकाकर्ता काका सिंह पर 24 जून 2024 से पूर्व कोई मुकदमा या आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था।
लेकिन पहली एफआईआर के 4 दिन बाद ही, 28 जून 2024 को दूसरा मुकदमा दर्ज किया गया।
ये है मामला
हनुमानगढ़ जिले के संगरिया थाना क्षेत्र में 24 जून 2024 को पुलिस टीम को देखकर एक व्यक्ति मोटरसाइकिल छोड़कर भाग गया था।
मौके पर छोड़ी गई बाइक से 20 किलो पोस्त–डोडा मिलने पर पुलिस ने मामला दर्ज किया।
घटना के समय मौजूद पुलिसकर्मी दौलतराम और हरिराम ने उक्त व्यक्ति की पहचान जितेंद्र सिंह के रूप में की और बाद में भी अपने बयानों में वही नाम दोहराया।
बाद में जांच अधिकारी ने इस मामले के आरोपी जितेंद्र सिंह को हलफनामे के आधार पर बिना किसी कारण के क्लीन चिट दे दी।
प्राथमिक आरोपी को क्लीन चिट देने के बाद पुलिस अधिकारी ने याचिकाकर्ता काका सिंह को आरोपी बना दिया।
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद एनडीपीएस मामलों में पुलिस जांच की पारदर्शिता और विश्वसनीयता एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है।