दो दिवसीय वेस्ट ज़ोन रीजनल ज्यूडिशियल कॉन्फ्रेंस का समापन, तकनीकी सत्रों में डिजिटल निगरानी, एआई-आधारित हमलों, ब्लॉकचेन पर हुई चर्चा
जैसलमेर/जयपुर, देश की न्याय व्यवस्था को भविष्य की तकनीकी चुनौतियों के अनुरूप सशक्त बनाने के उद्देश्य से जैसलमेर में आयोजित दो दिवसीय वेस्ट ज़ोन-I क्षेत्रीय सम्मेलन का दूसरे और अंतिम दिन विधिवत समापन हो गया है।
रविवार शाम आयोजित हुए समापन समारोह के मुख्य अतिथि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस विक्रम नाथ ने समारोह को संबोधित किया।
उन्होंने न्यायपालिका में एआई के साथ ही डिजिटल तकनीक के उपयोग और उसके अन्य कारकों को लेकर चेतावनी देते हुए कहा कि तीव्र तकनीकी परिवर्तन के इस युग में न्यायपालिका का अनुकूलनशील होना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में तकनीक बेहद जरूरी है और इसका प्रयोग कर हम कई मामलों में आगे बढ़ सकते हैं और तकनीक से कार्यदक्षता बढ़ाई जा सकती है।
लेकिन उन्होंने न्याय के मामले में चेतावनी देते हुए कहा कि तकनीक भले ही न्यायिक कार्यों में दक्षता बढ़ाए, और तकनीक चाहे जितनी उन्नत हो, उसे हमेशा न्याय का सेवक बने रहना चाहिए, न कि उसका विकल्प बनना चाहिए।

सामूहिक जिम्मेदारी जरूरी -कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश
समापन समारोह को संबोधित करते हुए प्रदेश के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने कहा कि न्यायपालिका की मजबूती संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करती है। उन्होंने दो दिनों में हुई विस्तृत चर्चा को समावेशी, नैतिक और संवैधानिक मूल्यों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्याय व्यवस्था में तकनीकी प्रगति तभी सार्थक होगी, जब वह समावेशी, नैतिक और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित रहे। इसके लिए सभी संबंधित संस्थानों की सामूहिक जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समापन समारोह के अंत में राजस्थान राज्य न्यायिक अकादमी के अध्यक्ष डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने देशभर से आए जजों के साथ ही कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए सभी लोगों को धन्यवाद दिया।
उन्होंने सम्मेलन में उपस्थित सभी गणमान्य अतिथियों, प्रतिभागियों और आयोजन से जुड़े संस्थानों के योगदान के लिए आभार व्यक्त किया।
साइबर अपराध की कोई सीमा नहीं…
कॉन्फ्रेंस के प्रथम दिन तीन तकनीकी सत्रों के बाद दूसरे दिन की शुरुआत चौथे सत्र के आयोजन से हुई।
साइबर अपराध और डिजिटल फोरेंसिक से जुड़े इस सत्र को सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने संबोधित किया।
उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था को अब डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अपनाने में हिचक से आगे बढ़ना होगा। उन्होंने चेताया कि साइबर अपराध की कोई सीमा नहीं होती और ये अक्सर तब सामने आते हैं, जब भारी और अपूरणीय नुकसान हो चुका होता है।
उन्होंने आपराधिक मामलों में डिजिटल फोरेंसिक और आधुनिक जांच तकनीकों की अहम भूमिका बताई। साथ ही क्षेत्राधिकार से जुड़ी उलझनों, मध्यस्थों की कानूनी जिम्मेदारियों, ई-साक्ष्य प्रबंधन के नियमों और एआई से बनी सामग्री से पैदा हो रही चुनौतियों पर भी ध्यान दिलाया।
उन्होंने दोहराया कि न्याय करते समय समाज के हित और आरोपी के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
जजों को लगातार सीखते रहना चाहिए
तकनीकी सत्र को सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने संबोधित किया।
उन्होंने कहा कि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में न्यायाधीशों को लगातार सीखते रहना चाहिए, क्योंकि ऐसे अपराध आम लोगों को सीधा नुकसान पहुंचाते हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि तकनीक का गलत या अनजाना इस्तेमाल शोषण को बढ़ावा दे सकता है, इसलिए मध्यस्थों और जांच एजेंसियों को पूरी सावधानी बरतनी चाहिए।
साथ ही उन्होंने न्यायिक फैसलों में डिजिटल फोरेंसिक उपकरणों की बढ़ती भूमिका पर भी जोर दिया।
जस्टिस अनूप चिटकारा ने सरल उदाहरणों के जरिए डिजिटल निगरानी, तेजी से बढ़ रहे एआई-आधारित हमलों और ब्लॉकचेन व क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी नई तकनीकों पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि लगातार जटिल होते डिजिटल माहौल में न्यायपालिका को पहले से अधिक तैयार रहने की जरूरत है।
इंसानी सोच, कानून और संविधान के अनुसार हो फैसले
कॉफ्रेस के समापन समारोह से पूर्व आयोजित हुए पांचवे सत्र में “न्यायिक फैसलों की गुणवत्ता में सुधार: नई और भविष्य की तकनीकें” विषय पर चर्चा की गयी.
इस सत्र को संबोधित करते हुए जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अदालतों के काम में मददगार हो सकती है, लेकिन फैसले हमेशा इंसानी सोच, कानून और संविधान के अनुसार ही होने चाहिए।
जस्टिस मनमोहन ने सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि अदालतों में मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने की समस्या एक बड़ी चुनौती है.
उन्होने कहा कि अगर नई तकनीकों का सोच-समझकर और जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया जाए, तो इससे अदालतों का काम तेज हो सकता है और फैसलों की गुणवत्ता भी बेहतर हो सकती है.
डीपफेक और एआई से बनी सामग्री को लेकर जस्टिस अनूप चिटकारा ने चिंता जताते हुए कहा कि कि ऐसी तकनीकों से सबूतों की सच्चाई और लोगों के भरोसे पर खतरा पैदा हो सकता है। उन्होंने सबूतों की जांच में मेटाडाटा के महत्व को भी समझाया.
जस्टिस राजेश बिंदल ने कहा कि तकनीक अपनाते समय सावधानी बरतना, लगातार निगरानी रखना और संस्थागत सहयोग जरूरी है। उन्होंने फोरेंसिक और तकनीकी क्षमता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय फोरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय जैसे विशेष संस्थानों को मजबूत करने की जरूरत पर भी जोर दिया।