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1993 ट्रेन बम ब्लास्ट केस: टाडा दोषियों-आतंकियो की समयपूर्व रिहाई से राजस्थान हाईकोर्ट का इनकार, कहा-राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं

1993 Train Bomb Blast Case: Rajasthan High Court Denies Premature Release to TADA Convicts

आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों में दोषी व्यक्तियों की रिहाई ना केवल समाज के लिए बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने 1993 के सिलसिलेवार ट्रेन बम ब्लास्ट मामलों में (TADA) के तहत दोषी ठहराए गए और आजीवन कारावास भुगत रहे आरोपियों की समयपूर्व रिहाई (Premature Release) की मांग को खारिज कर दिया है.

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों में दोषी व्यक्तियों की रिहाई न केवल समाज के लिए खतरा हो सकती है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक शांति के लिए भी गंभीर जोखिम उत्पन्न करेगी।

जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने 1993 बम कांड के आरोपियों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया हैं.

हाईकोर्ट ने दौसा निवासी असफाक खान, फजलुर रहमान सुफी मुंबई, अबरे रहमत अंसारी कबीनगर यूपी अैर मोहम्मद अजाज अकबर गुलबर्ग की याचिकाओं को खारिज करते हुए ये फैसला दिया हैं.

बम कांड के दोषी

अदालत के समक्ष कुल चार आपराधिक रिट याचिकाएँ थीं, जिनमें टाडा के तहत दोषी ठहराए गए कैदी पिछले 20 से 30 वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद होने के आधार पर अपनी समयपूर्व रिहाई की मांग कर रहे थे.

इन याचिकाओं में यह तर्क दिया गया था कि लंबे कारावास और बढ़ती उम्र तथा बीमारियों को देखते हुए उन्हें राहत दी जानी चाहिए।

1993 ट्रेन बम ब्लास्ट और टाडा के तहत सजा

अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि सभी याचिकाकर्ता दिसंबर 1993 में हुए सिलसिलेवार ट्रेन बम विस्फोट मामलों में दोषी पाए गए थे.

विशेष टाडा न्यायालय ने 28 फरवरी 2004 को उन्हें दोषसिद्ध कर आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.

इसके बाद उनकी सजा और दोषसिद्धि के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी 11 मई 2016 के अपने फैसले में बरकरार रखा था।

समयपूर्व रिहाई पर कानूनी रोक

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि गृह मंत्रालय के एक पत्र के अनुसार न्यूनतम 20 वर्ष की सजा पूरी होने के बाद उनकी रिहाई पर विचार किया जाना चाहिए.

साथ ही यह भी कहा गया कि उनके मामलों पर उस नीति के अनुसार विचार होना चाहिए, जो उनकी सजा के समय लागू थी।

सरकार ने किया सख्त विरोध

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भरत व्यास और महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने याचिका का विरोध किया.

सरकार ने कहा कि राजस्थान कैदी (सजा में कमी) नियम, 2006 तथा उससे पहले लागू नियम, 1958—दोनों में ही टाडा के तहत दोषी कैदियों की समयपूर्व रिहाई पर स्पष्ट प्रतिबंध है।.

नियम 9(5) के तहत ऐसे मामलों पर सलाहकार बोर्ड विचार नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि आतंकवादी गतिविधियाँ अत्यंत जघन्य अपराध हैं.

कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसे अपराधों में दोषी पाए गए लोगों को समयपूर्व रिहा किया जाता है, तो यह समाज में गलत संदेश देगा और सार्वजनिक शांति व राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक समीक्षा के अधिकार के तहत हाईकोर्ट अपीलीय अदालत की तरह तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता। जब तक यह साबित न हो कि प्रशासनिक निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या कानून के विपरीत है, तब तक उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के लक्ष्मण नस्कर बनाम भारत संघ और जोसेफ बनाम केरल राज्य मामलों का हवाला दिया। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि इन फैसलों में जिन अपराधों पर विचार किया गया था, वे टाडा जैसे आतंकवादी कानून के अंतर्गत नहीं आते। इसलिए वे वर्तमान मामले में लागू नहीं होते।

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