जयपुर। वर्ष 2025 में राजस्थान हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों की पार्ट–4 श्रृंखला में उन निर्णायक और रिपोर्टेबल जजमेंट्स को सामने लाया जा रहा है, जिन्होंने न्याय को केवल विधिक प्रक्रिया तक सीमित न रखते हुए उसे संवैधानिक चेतना का जीवंत स्वरूप बनाया।
पार्ट–4 में शामिल फैसले न केवल नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं, बल्कि प्रशासनिक विवेकाधिकार की न्यायिक समीक्षा भी करते हैं।
इससे पूर्व प्रकाशित पार्ट–1, पार्ट–2 और पार्ट–3 में शामिल ऐतिहासिक एवं रिपोर्टेबल जजमेंट्स को आप ऊपर दिए गए लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं।
1 Rajasthan Highcourt ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि गंभीर चोट या हत्या के प्रयास के मामलों में केवल एक्स-रे रिपोर्ट पर आधारित मेडिकल ज्यूरिस्ट की राय पर्याप्त नहीं मानी जा सकती.
जस्टिस संदीप शाह की एकलपीठ ने यह आदेश पाली जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित 12 मार्च 2025 के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.
2 Rajasthan Highcourt की जयपुर पीठ ने चेक से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति ने समय-सीमा पार (time-barred) ऋण के लिए लिखित रूप से चेक जारी किया है, तो वह भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 25(3) के तहत वैध व प्रवर्तनीय देनदारी (legally enforceable debt) मानी जाएगी।
जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की एकलपीठ ने रतिराम यादव व 5 अन्य आपराधिक निगरानी याचिकाओं का निस्तारण करते हुए यह फैसला दिया है।
3 राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने सोमवार को सहकारी बैंक से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। राजस्थान हाईकोर्ट ने कॉमर्शियल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें आर्बिट्रेशन के बाद आदर्श को-ऑपरेटिव बैंक के पक्ष में दिए पंचाट यानी Arbitration के फैसले को रद्द कर दिया गया था।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने इस मामले में स्पष्ट कहा कि सहकारी बैंक से ऋण का यह विवाद सहकारी समिति अधिनियम (MSCS Act, 2002) के तहत आता है और इसमें होने वाली मध्यस्थता संविदात्मक नहीं बल्कि वैधानिक पंचाट है।
4 राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दिव्यांगता के आधार पर MBBS में प्रवेश से वंचित की गई एक छात्रा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की कार्रवाई को मनमाना, अवैध और संविधान के विपरीत करार दिया है।
DR. JUSTICE NUPUR BHATI की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में स्पष्ट किया है कि NEET-UG 2025 के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा मान्यता प्राप्त केंद्र द्वारा जारी विकलांगता प्रमाणपत्र को राज्य सरकार चुनौती नहीं दे सकती।
5 Rajasthan Highcourt ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी परीक्षा परिणाम और उसकी उत्तर कुंजी (Answer Key) से जुड़े विवादों में अदालतों की भूमिका सीमित है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने कहा कि जब तक परीक्षा नियमों में पुनर्मूल्यांकन (Re-evaluation) या उत्तरपत्रों की जांच की अनुमति न दी गई हो, तब तक अदालत को इस क्षेत्र में दखल नहीं देना चाहिए।
6 राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सेवानिवृत सरकारी कर्मचारी को बड़ी राहत दी है, जिसे अनिवार्य सेवानिवृत्ति के बाद निलंबन अवधि का पूरा वेतन और अन्य लाभ देने से वंचित कर दिया गया था.
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि राजस्थान सर्विस रूल्स (RSR), 1951 का नियम 22 निलंबन अवधि का वेतन रोकने का अधिकार नहीं देता है.
7 राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में नाबालिग बालक की कस्टडी उसके दादा को सौंपने का आदेश दिया हैं.
यह आदेश जस्टिस मनोज कुमार गर्ग और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने दादा की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.
8 Rajasthan HighCourt ने पुलिस भर्ती प्रक्रिया से जुड़े एक अहम फैसले में प्रसूता महिला अभ्यर्थियों के अधिकारों और स्वास्थ्य संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की एकलपीठ ने महिला कांस्टेबल भर्ती में शारीरिक दक्षता परीक्षा में असफल घोषित की गई एक प्रसूता महिला अभ्यर्थी को पुनः फिजिकल टेस्ट का अवसर देने के आदेश दिए हैं।
9 राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने Acid attack से जुड़े एक गंभीर आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा में संशोधन किया है।
जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस प्रवीर भटनागर की खंडपीठ ने Acid attack से जुड़े एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा को कम करते हुए भुगती हुई सजा करीब 12 साल 4 माह 16 दिन के आधार पर रिहा करने का आदेश दिया है।
10 राजस्थान हाईकोर्ट ने संपंति विवाद मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया हैं कि पिता की निजी संपत्ति में पुत्र केवल अनुमति से रह सकता है, और अनुमति वापस लेने पर उसे संपत्ति खाली करनी होगी.
जस्टिस सुदेश बंसल की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट याचिकाकर्ता पिता द्वारा दाखिल की गई अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) पर दिया हैं.