जयपुर। राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आने के संकेत हैं।
विधायक निधि (एमएलए लैड) से होने वाले विकास कार्यों में कथित भ्रष्टाचार और भारी कमीशनखोरी को लेकर एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) में शिकायत दर्ज कराई गई है।
दैनिक भास्कर अखबार द्वारा हाल ही में किए स्टिंग आपरेशन को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता गोवर्धनसिंह ने राज्य के एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) में शिकायत दी हैं.
दिसंबर 2025 में दैनिक भास्कर के चर्चित स्टिंग ऑपरेशन में कई विधायकों, उनके परिजनों, कथित बिचौलियों और अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमिका सामने आने का दावा किया गया था.

अखबार में स्टिंग आपरेशन सामने आने के बाद भी एसीबी द्वारा एफआईआर दर्ज नहीं करने पर यह शिकायत दर्ज कराने का दावा किया गया हैं.
शिकायतकर्ता आरटीआई कार्यकर्ता गोवर्धनसिंह का आरोप है कि विधायक निधि से विकास कार्यों की अनुशंसा के बदले 40 से 50 प्रतिशत तक कमीशन की मांग की जा रही थी।
स्टिंग में कथित तौर पर यह बातचीत रिकॉर्ड हुई कि पहले “टोकन मनी” के रूप में अग्रिम राशि ली जाती है और उसके बाद शेष रकम विकास कार्य की स्वीकृति या लेटर जारी होने से जोड़ी जाती है।
शिकायत में कहा गया है कि यह केवल एक-दो मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संगठित और सुनियोजित तंत्र की ओर इशारा करता है।
स्टिंग में क्या-क्या सामने आया
शिकायत के अनुसार, स्टिंग वीडियो और खबरों में अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े विधायकों के नाम सामने आए, जहां विधायक निधि के तहत प्रस्तावित कार्यों के बदले मोटे कमीशन की बात कही गई।
कुछ मामलों में यह भी कथित रूप से स्वीकार किया गया कि अधिकारियों को “मैनेज” करना इस प्रक्रिया का हिस्सा है और कमीशनखोरी अब एक “सामान्य प्रथा” बन चुकी है।
एक प्रकरण में 50 लाख रुपये के विकास कार्य पर 40 प्रतिशत तक कमीशन तय होने, तो दूसरे में 80 लाख रुपये के काम के बदले 50 हजार रुपये अग्रिम लेकर लेटर जारी करने की बात सामने आने का दावा किया गया है।
52 अन्य विधायकों का भी जिक्र
शिकायत का सबसे गंभीर पहलू यह है कि स्टिंग वीडियो में केवल नामजद मामलों तक ही संकेत सीमित नहीं बताए गए, बल्कि कथित तौर पर 52 अन्य विधायकों से जुड़े संभावित लेन-देन और बातचीत के भी संकेत मिले हैं।
शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि इन सभी बिंदुओं की निष्पक्ष और व्यापक जांच नहीं की गई, तो यह जनता के धन के दुरुपयोग पर पर्दा डालने जैसा होगा।
निर्दोषों की छवि पर भी सवाल
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ विधायकों के नाम ऐसे भी सामने आए, जिन्होंने न तो किसी प्रकार की राशि मांगी और न ही ली। ऐसे मामलों में स्टिंग के आधार पर उन्हें “कमीशनखोर” बताए जाने से उनकी छवि धूमिल हुई है। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि जांच के दौरान दोषियों के साथ-साथ निर्दोषों को भी स्पष्ट रूप से अलग किया जाए, ताकि किसी के साथ अन्याय न हो।
कानूनी पहलू और एसीबी की भूमिका
शिकायत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह पूरा मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं 7, 7ए और 8 के तहत संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों की जांच का अधिकार केवल एसीबी को है, न कि सामान्य पुलिस को।
शिकायतकर्ता ने तर्क दिया है कि कानून के अनुसार इस प्रकार के गंभीर आरोपों पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है और केवल प्रारंभिक जांच या पत्राचार के नाम पर मामले को टालना कानून का उल्लंघन होगा।
इसके साथ ही यह मांग भी की गई है कि स्टिंग से जुड़े सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण—मोबाइल, लैपटॉप, कैमरे, स्टोरेज डिवाइस—जब्त कर फॉरेंसिक जांच कराई जाए, ताकि ऑडियो-वीडियो साक्ष्यों की प्रामाणिकता स्थापित हो सके। जिन बिचौलियों और अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध है, उनसे भी गहन पूछताछ की मांग की गई है।