‘गलतफहमी’ में भगोड़ा घोषित हुए श्रमिक को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत, ट्रायल कोर्ट का आदेश रदद, पेश होने की छूट, कोर्ट ने कहा-तकनीकी आधार पर न्याय नहीं रुकना चाहिए
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम और मानवीय दृष्टिकोण वाला फैसला सुनाते हुए मेड़ता (नागौर) निवासी एक श्रमिक को बड़ी राहत दी है।
हाईकोर्ट ने उसे ‘भगोड़ा’ (प्रोक्लेम्ड ऑफेंडर) घोषित करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट कहा कि जब किसी व्यक्ति को किसी आदेश की जानकारी ही नहीं हो, तो केवल तकनीकी आधार पर उसे न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह आदेश सूरत में मजदूरी का कार्य कर रहे मदन सिंह की याचिका पर दिए हैं।
क्या है मामला
यह मामला वर्ष 2016 के एक परिवाद से जुड़ा है, जो Negotiable Instruments Act के तहत परिवादी कैलाश नारायण की ओर से दायर किया गया था।
परिवाद में आरोपी मदन सिंह को बनाया गया था। इस मामले की सुनवाई में आरोपी ने ट्रायल कोर्ट में पेश होकर कार्यवाही में भाग लिया। हालांकि, बाद में परिवादी कैलाश नारायण का निधन हो गया।
आरोपी मदन सिंह, जो पेशे से श्रमिक है और पिछले करीब दस वर्षों से गुजरात के सूरत में मजदूरी कर रहा था, इस गलतफहमी में रहा कि परिवादी की मृत्यु के साथ ही मामला समाप्त हो गया है। इसी भ्रम के चलते वह आगे की न्यायिक कार्यवाही में उपस्थित नहीं हुआ।
परिवाद पुनर्जीवित, लेकिन आरोपी अनभिज्ञ
परिवादी की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी और नाबालिग बच्चों की ओर से प्रतिस्थापन (सब्स्टीट्यूशन) का आवेदन दायर किया गया, जिसे ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
इसके साथ ही परिवाद को पुनर्जीवित कर ट्रायल कोर्ट में आगे की कार्यवाही शुरू कर दी गई।
लेकिन, आरोपी को इस घटनाक्रम की कोई जानकारी नहीं दी गई।
उसके अनुसार, वह यह मानता रहा कि मामला समाप्त हो चुका है और उसे कोर्ट में पेश होने की आवश्यकता नहीं है।
ट्रायल कोर्ट की सख्त कार्रवाई
आरोपी की अनुपस्थिति के कारण ट्रायल कोर्ट ने उसके जमानत बांड जब्त कर लिए और गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।
स्थानीय स्तर पर पुलिस द्वारा की गई औपचारिक तलाश के आधार पर कोर्ट ने आरोपी को ‘भगोड़ा’ घोषित कर दिया और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 82 व 83 के तहत कार्यवाही शुरू कर दी।
ट्रायल कोर्ट के आदेश की जानकारी मिलने पर याचिकाकर्ता आरोपी ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की, जिसमें 715 दिन की देरी हो चुकी थी।
याचिकाकर्ता आरोपी की ओर से उसकी बेटी ने अधिवक्ता के रूप में पेश होकर दलील दी कि आदेश उसके पीछे पारित हुआ था और उसे इसकी कोई जानकारी नहीं थी।
जैसे ही जानकारी मिली, बिना किसी अनावश्यक देरी के हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने देरी माफी आवेदन स्वीकार करते हुए कहा कि लिमिटेशन का कानून अनुशासन का नियम जरूर है, लेकिन यह तभी लागू होता है जब संबंधित व्यक्ति को आदेश की जानकारी हो।
यदि आदेश बिना सूचना या सुनवाई के पारित हुआ हो, तो देरी को कठोरता से नहीं देखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि—
“न्याय को केवल तकनीकी आधार पर बाधित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब पर्याप्त और वास्तविक कारण मौजूद हों।”
‘भगोड़ा’ घोषित करने की प्रक्रिया पर सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को भगोड़ा घोषित करने की प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं थी।
न तो आरोपी की वास्तविक उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए समुचित प्रयास किए गए और न ही यह ध्यान में रखा गया कि वह लंबे समय से सूरत में मजदूरी कर रहा है।
कोर्ट ने माना कि ऐसी परिस्थितियों में आरोपी की अनुपस्थिति को जानबूझकर की गई फरारी नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि फरार घोषित करना अंतिम उपाय होना चाहिए, न कि औपचारिक पुलिस रिपोर्ट के आधार पर की गई जल्दबाजी भरी कार्रवाई।
हाईकोर्ट का आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी याचिकाकर्ता को बड़ी राहत देते हुए पुनरीक्षण याचिका का निस्तारण किया और आरोपी को ट्रायल कोर्ट की प्रक्रिया में शामिल होने का मौका दिया है।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए 5 फरवरी 2026 तक ट्रायल कोर्ट में उपस्थित होने और नियमित जमानत आवेदन पेश करने का आदेश दिया है।
जब किसी व्यक्ति को किसी आदेश की जानकारी ही नहीं हो, तो केवल तकनीकी आधार पर उसे न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट