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CLAT टॉपर के श्रेय को लेकर दो कोचिंग संस्थानों में टकराव, नाबालिग छात्रा पर दर्ज FIR पर राजस्थान हाई कोर्ट ने लगाई रोक

CLAT Topper Credit Row: Rajasthan High Court Halts FIR Probe, Refers Matter to Mediation

कोचिंग संस्थानों में व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता मानते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले को भेजा मध्यस्थता के लिए

जोधपुर। कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (CLAT) में अखिल भारतीय स्तर पर शीर्ष रैंक हासिल करने वाली एक नाबालिग छात्रा के श्रेय को लेकर दो कोचिंग संस्थानों के बीच उपजे विवाद में राजस्थान हाई कोर्ट ने अहम हस्तक्षेप किया है।

राजस्थान हाई कोर्ट ने इस मामले में दर्ज FIR की आगे की जांच पर अस्थायी रोक लगाते हुए पूरे विवाद को “व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता” करार दिया और पक्षकारों को संयम बरतने की नसीहत दी है।

साथ ही, हाईकोर्ट ने मामले को आपसी सुलह की संभावना को देखते हुए मध्यस्थता के लिए भेज दिया है।

यह आदेश जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने नाबालिग छात्रा की ओर से दायर अपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं.

याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विनीत जैन एवं अधिवक्ता विवेक माथुर ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक विक्रम राजपुरोहित उपस्थित रहे।

क्या है पूरा मामला

मामला जोधपुर स्थित कोचिंग संस्थान लॉ प्रेप ट्यूटोरियल (एलपीटी एडटेक प्राइवेट लिमिटेड) और CLAT में टॉप रैंक प्राप्त करने वाली एक नाबालिग छात्रा तथा उसके पिता से जुड़ा है।

संस्थान के अतिरिक्त निदेशक जसाराम की ओर से पुलिस में एक FIR दर्ज कराई गई थी।

FIR में आरोप लगाया गया कि छात्रा ने प्रारंभिक तौर पर लॉ प्रेप ट्यूटोरियल संस्थान से CLAT की कोचिंग ली थी, लेकिन बाद में किसी अन्य कोचिंग संस्थान के कथित “लुभावने प्रस्तावों” से प्रभावित होकर छात्रा के पिता ने शिकायतकर्ता संस्थान पर दबाव बनाना शुरू किया और कथित रूप से ब्लैकमेल करने का प्रयास किया।

शिकायतकर्ता का यह भी आरोप था कि छात्रा की CLAT में शानदार सफलता का श्रेय अपने संस्थान को दिलाने को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जो आगे चलकर आपराधिक आरोपों में तब्दील हो गया।

FIR में दूसरे कोचिंग संस्थान के निदेशक/साझेदारों को भी आरोपी बनाया गया और उन पर इस कथित साजिश में भूमिका निभाने का आरोप लगाया गया।

हाई कोर्ट की टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया यह पाया कि पूरा विवाद छात्रा की सफलता के श्रेय को लेकर दो कोचिंग संस्थानों के बीच प्रतिस्पर्धा का कारण हैं.

जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने अपने आदेश में स्पष्ट शब्दों में कहा—

“FIR को साधारण रूप से पढ़ने पर यह प्रतीत होता है कि यह एक टॉप रैंकर का श्रेय हथियाने की लड़ाई है। यह मामला दो कोचिंग संस्थानों के बीच व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता से अधिक कुछ नहीं लगता।”

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जब किसी मामले में एक नाबालिग छात्रा शामिल हो और विवाद शिक्षा से जुड़ा हो, तब आपराधिक कार्यवाही शुरू करना अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि पहला।

संयम और पेशेवर नैतिकता पर जोर

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि CLAT जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय परीक्षा की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थानों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे छात्रों के हितों को सर्वोपरि रखें।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के विवाद न केवल छात्रों के मानसिक और शैक्षणिक भविष्य को प्रभावित करते हैं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था और कोचिंग उद्योग की साख पर भी सवाल खड़े करते हैं।

जस्टिस संधू ने यह भी कहा कि छात्रा की उपलब्धि को लेकर श्रेय लेने की होड़ दुर्भाग्यपूर्ण है और दोनों पक्षों को अधिक परिपक्वता, संयम और पेशेवर जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए था।

मध्यस्थता को प्राथमिकता

हाईकोर्ट ने यह मानते हुए कि विवाद का समाधान आपसी संवाद और समझौते से संभव है, मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने का आदेश दिया।

कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर आपराधिक जांच को आगे बढ़ाना न तो छात्रा के हित में है और न ही न्याय के व्यापक उद्देश्यों की पूर्ति करता है।

अदालत का मत था कि मध्यस्थता के माध्यम से पक्षकार न केवल विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकाल सकते हैं, बल्कि अनावश्यक कानूनी टकराव और लंबी न्यायिक प्रक्रिया से भी बच सकते हैं।

हाई कोर्ट के आदेश

हाई कोर्ट ने इस मामले में प्रतिवादी संख्या कोचिंग संचालक जसाराम को नोटिस जारी करते हुए मामले को मध्यस्था के लिए भेजने का आदेश दिया हैं.

हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को 21 जनवरी, 2026 को मध्यस्थता केंद्र में उपस्थित होने का आदेश दिया हैं.

हाईकोर्ट ने मध्यस्थता प्रक्रिया पूरी होने तक एफआईआर पर रोक लगाने का आदेश दिया हैं.

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