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सुप्रीम कोर्ट की संविदा नियुक्ति नियमों पर सख्ती, बिना नोटिफिकेशन और इंटरव्यू नियुक्तियों को कहा ‘बैकडोर एंट्री’

Would Have Sold the State”: Supreme Court Denies Bail to RAS Exam Scam Accused

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में एडहॉक और संविदा कर्मचारियों को स्थायी करने के मुद्दे पर एक अहम और संतुलित फैसला सुनाया है।

अदालत ने साफ कहा है कि बिना वैकेंसी नोटिफिकेशन, खुली प्रतिस्पर्धा और इंटरव्यू के नियुक्त किए गए कर्मचारियों को स्थायी नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसी नियुक्तियां “बैकडोर एंट्री” की श्रेणी में आती हैं।

हालांकि, कोर्ट ने हरियाणा सरकार की 2014 की सभी नीतियों को पूरी तरह खारिज नहीं किया, बल्कि कुछ को सही और कुछ को मनमाना मानते हुए आंशिक रूप से बरकरार रखा।

क्या है पूरा मामला?

पूरा विवाद हरियाणा सरकार की तरफ से वर्ष 2014 में जारी उन नोटिफिकेशनों से जुड़ा है, जिनका मकसद ग्रुप B, C और D के एडहॉक, कॉन्ट्रैक्ट और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को नियमित (permanent) करना था।

सरकार ने एक पॉलिसी के तहत ऐसे कर्मचारियों को स्थायी करने का रास्ता खोला, जो लंबे समय संविदा के तहत सेवा दे रहे थे। लेकिन इस नीति को चुनौती देते हुए कहा गया कि यह संवैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों का उल्लंघन है।

मामला Punjab and Haryana High Court पहुंचा, जहां 2018 में हाई कोर्ट ने इन पॉलिसियों को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट का कहना था कि यह नीति सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले State of Karnataka v. Uma Devi के खिलाफ है।

‘उमा देवी केस’ क्यों है इतना अहम?

साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने उमा देवी केस में साफ कहा था कि इस फैसले को सरकारी नौकरियों में मेरिट और समान अवसर का आधार माना जाता है।

सरकारी नौकरी में भर्ती पारदर्शी और प्रतियोगी प्रक्रिया से होनी चाहिए। बिना विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के नियुक्त कर्मचारियों को स्वतः स्थायी नहीं किया जा सकता

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस पी. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पूरी तरह बरकरार नहीं रखा, बल्कि उसमें संशोधन करते हुए ‘हां’ और ‘ना’ वाला संतुलित फैसला दिया।

किसे मिली राहत, क्या हुआ रद्द?

अदालत ने जून 2014 की नोटिफिकेशन को वैध माना। कोर्ट के मुताबिक यह 1996 की पुरानी नीति का विस्तार थी, इसलिए इसे पूरी तरह अवैध नहीं कहा जा सकता।

लेकिन 7 जुलाई 2014 की दो अन्य नोटिफिकेशन को सुप्रीम कोर्ट ने मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया।

कोर्ट ने पाया कि इन नीतियों में ऐसे कर्मचारियों को भी शामिल किया गया था, जो भविष्य (दिसंबर 2018 तक) में 10 साल की सेवा पूरी करने वाले थे।

भविष्य की तारीख पर नीति क्यों हुई खारिज?

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि “भविष्य की तारीख तय कर पात्रता देना भर्ती प्रक्रिया को कमजोर करता है। इससे नियमित भर्ती का रास्ता बंद होता है। यह संविधान के समान अवसर के सिद्धांत के खिलाफ है”

अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी नीति “मनमानी” (arbitrary) है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

‘बैकडोर एंट्री’ पर सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए साफ कहा, “जिन कर्मचारियों की नियुक्ति बिना किसी विज्ञापन (notification) या इंटरव्यू के हुई है, उन्हें स्थायी करना ‘बैकडोर एंट्री’ को वैध ठहराना जैसा होगा।”

कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरी पब्लिक एम्प्लॉयमेंट है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत सभी के लिए समान अवसर का विषय है।

यदि बिना खुली प्रतिस्पर्धा के किसी को स्थायी किया जाता है, तो यह उन लाखों उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन है जो परीक्षा और चयन प्रक्रिया के जरिए नौकरी पाने का इंतजार कर रहे हैं।

लंबे समय तक काम करना काफी है?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साफ कर दिया कि सिर्फ वर्षों तक काम करना स्थायी होने का अधिकार नहीं देता।

नियमित नियुक्ति के लिए तय प्रक्रिया से गुजरना अनिवार्य है। अस्थायी नियुक्ति को स्थायी बनाने का कोई “शॉर्टकट” नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर के लाखों एडहॉक, कॉन्ट्रैक्ट और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

इससे यह साफ हो गया है कि नियमितीकरण (regularisation) का रास्ता आसान नहीं होगा। सरकारें मनमानी नीतियों के जरिए स्थायी नियुक्ति नहीं कर सकतीं और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा अनिवार्य है।

साथ ही, यह फैसला राज्य सरकारों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है कि वे लंबे समय तक अस्थायी नियुक्तियों पर निर्भर रहने के बजाय नियमित भर्ती प्रक्रिया को प्राथमिकता दें।

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