जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के प्रमोशन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर किसी कर्मचारी को बाद में कोई सजा (पेनल्टी) दी जाती है, तो उसका असर उन प्रमोशनों पर नहीं डाला जा सकता, जिनकी वैकेंसी पहले ही निकल चुकी थी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी पद की रिक्ति सजा आदेश जारी होने से पहले की है, तो बाद में दी गई विभागीय सजा का असर उस पदोन्नति पर नहीं डाला जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी दंड का प्रभाव भविष्य की पदोन्नतियों पर पड़ सकता है, लेकिन उन पदोन्नतियों पर नहीं जिनकी रिक्तियां सजा दिए जाने से पहले उत्पन्न हो चुकी थीं।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकल पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी और राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कर्मचारी को पात्र पाए जाने पर पदोन्नति देने के निर्देश दिए गए थे।
कोर्ट ने कहा कि पदोन्नति पर विचार करते समय पिछले सात वर्षों के सेवा रिकॉर्ड की गणना उस तारीख से की जानी चाहिए जिस तारीख को संबंधित पद की रिक्ति उत्पन्न हुई थी, न कि उस घटना की तारीख से जिसके आधार पर बाद में विभागीय कार्रवाई शुरू की गई।
क्या था पूरा मामला?
मामला राज्य सरकार और कर्मचारी दलबीर सिंह के बीच पदोन्नति विवाद से जुड़ा था।
रिकॉर्ड के अनुसार कर्मचारी पर विभागीय कार्रवाई की गई और जुलाई 2024 में उसे एक दंड दिया गया।
इसके बाद विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक हुई, जिसमें वर्ष 2023-24 की रिक्तियों के विरुद्ध पदोन्नति पर विचार किया गया।
हालांकि, विभाग ने कर्मचारी की उम्मीदवारी यह कहते हुए अस्वीकार कर दी कि जुलाई 2024 में उस पर दंड लगाया जा चुका है।
कर्मचारी ने इस निर्णय को राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण में चुनौती दी। अधिकरण ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि यदि वह अन्यथा पात्र है तो उसे पदोन्नति दी जानी चाहिए।
राज्य सरकार ने इसी आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
राज्य सरकार का पक्ष क्या था?
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि कार्मिक विभाग द्वारा जारी 26 जुलाई 2006 के एक सर्कुलर के अनुसार, कर्मचारी पर लगी पेनल्टी का असर उसके प्रमोशन पर पड़ता है।
सरकार ने कहा कि इस नियम के तहत संबंधित कर्मचारी के प्रमोशन को एक साल के लिए टालना सही था, क्योंकि उसे हाल ही में सजा दी गई थी।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि पिछले 7 वर्षों के सेवा रिकॉर्ड का मूल्यांकन करते समय उस अवधि में हुई घटनाओं और अनुशासनात्मक कार्रवाई को ध्यान में रखना जरूरी है।
कर्मचारी का पक्ष और दलील
दूसरी ओर, कर्मचारी की ओर से यह कहा गया कि प्रमोशन के लिए महत्वपूर्ण तारीख वह होती है, जब वैकेंसी निर्धारित होती है, न कि वह तारीख जब किसी घटना के आधार पर जांच शुरू होती है या सजा दी जाती है।
कर्मचारी के वकील ने तर्क दिया कि इस मामले में प्रमोशन वर्ष 2023-24 की वैकेंसी के लिए किया जा रहा था, जबकि पेनल्टी जुलाई 2024 में दी गई थी।
इसलिए, पेनल्टी का असर उस प्रमोशन पर नहीं डाला जा सकता, जो पहले से तय वैकेंसी के आधार पर दिया जाना था।
उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 7 वर्षों के रिकॉर्ड की गणना भी उसी तारीख से होनी चाहिए, जब वैकेंसी उत्पन्न हुई थी।
रिक्ति की तारीख महत्वपूर्ण, सजा की नहीं: हाईकोर्ट
सुनवाई के दौरान विवाद का मुख्य प्रश्न यह था कि पदोन्नति के लिए पिछले सात वर्षों का रिकॉर्ड किस तारीख से देखा जाएगा।
राज्य सरकार का तर्क था कि कार्मिक विभाग के 26 जुलाई 2006 के परिपत्र के अनुसार कर्मचारी पर लगाई गई सजा का प्रभाव एक वर्ष तक पदोन्नति पर पड़ता है।
इसलिए जुलाई 2024 में दी गई सजा को ध्यान में रखते हुए कर्मचारी की पदोन्नति रोकी जा सकती है।
दूसरी ओर कर्मचारी का कहना था कि पदोन्नति वर्ष 2023-24 की रिक्तियों के विरुद्ध की जा रही थी। इसलिए पिछले सात वर्षों के रिकॉर्ड की गणना उसी समय से की जानी चाहिए जब रिक्तियां निर्धारित हुई थीं।
कर्मचारी ने तर्क दिया कि जब रिक्तियां उत्पन्न हुईं, उस समय उसके खिलाफ ऐसा कोई दंड प्रभावी नहीं था। इसलिए बाद में दी गई सजा के आधार पर उसे पदोन्नति से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने इसी तर्क को स्वीकार किया।
“बाद की सजा से पहले की रिक्तियां प्रभावित नहीं होंगी“
फैसले में अदालत ने कहा कि यह स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि किसी भी प्रकार की सजा का प्रभाव भविष्य में मिलने वाली पदोन्नतियों पर पड़ता है।
लेकिन यदि पदोन्नति उस रिक्ति के विरुद्ध दी जानी है जो सजा आदेश जारी होने से पहले उत्पन्न हो चुकी थी, तो उस पर बाद में दी गई सजा का प्रभाव नहीं डाला जा सकता।
जस्टिस आनंद शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार की यह दलील कि घटना की तारीख या लंबित विभागीय जांच को आधार बनाकर पदोन्नति रोकी जा सकती है, कानून के अनुरूप नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पदोन्नति प्रक्रिया में यह देखना होगा कि रिक्ति कब उत्पन्न हुई थी और उस समय कर्मचारी की सेवा स्थिति क्या थी। यदि उस समय कर्मचारी पात्र था, तो बाद की परिस्थितियों के आधार पर उसे उस अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।
सरकार की व्याख्या गलत
राजस्थान हाईकोर्ट ने कार्मिक विभाग के परिपत्रों की व्याख्या को लेकर राज्य सरकार की दलीलों पर भी टिप्पणी की।
मामले की सुनवाई के बाद राजस्थान हाई कोर्ट ने कर्मचारी की दलीलों को सही माना। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार का यह तर्क कि घटना की तारीख को आधार बनाया जाए, पूरी तरह से गलत और निराधार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार यह साबित नहीं कर सकी कि 2006 और 2008 के परिपत्रों का उद्देश्य ऐसी स्थिति में पदोन्नति रोकना था जहां रिक्तियां पहले की हों और सजा बाद में दी गई हो।
कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार परिपत्रों की ऐसी व्याख्या कर रही थी जिसका कानूनी आधार नहीं है।
जस्टिस शर्मा ने अपने आदेश में कहा कि सरकार की यह दलील कि घटना की तारीख को आधार मानकर पिछले सात वर्षों का रिकॉर्ड देखा जाए, पूरी तरह निराधार और असंगत है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सेवा कानून में रिक्ति की तारीख और पदोन्नति वर्ष का विशेष महत्व होता है। इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
प्रमोशन और पेनल्टी को लेकर कोर्ट का सिद्धांत
हाई कोर्ट ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किया। अदालत ने कहा कि:
- पेनल्टी का प्रभाव केवल उस तारीख के बाद होने वाले प्रमोशन पर पड़ेगा, जब पेनल्टी का आदेश जारी हुआ हो।
- पहले से उत्पन्न वैकेंसी के लिए होने वाले प्रमोशन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
- पिछले 7 वर्षों के रिकॉर्ड की गणना भी वैकेंसी की तारीख से की जाएगी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर इस सिद्धांत का पालन नहीं किया गया, तो इससे कर्मचारियों के साथ अन्याय हो सकता है और प्रमोशन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठ सकते हैं।
कोर्ट का अंतिम फैसला
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराया और राज्य सरकार की याचिका को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी को प्रमोशन से वंचित करना गलत था, क्योंकि जिस वैकेंसी के लिए प्रमोशन किया जा रहा था, वह पेनल्टी से पहले की थी।
इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों में विभागों को नियमों का सही तरीके से पालन करना होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि सेवा नियमों का उद्देश्य कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करना है। यदि किसी कर्मचारी ने उस समय सभी पात्रताएं पूरी कर ली थीं जब रिक्ति उत्पन्न हुई, तो बाद की घटनाओं के आधार पर उसे उस अवसर से वंचित करना उचित नहीं होगा।
