20 साल बाद दायर वेतन पुनर्निर्धारण की मांग याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने कहा- “अनुच्छेद 226 के तहत अदालत उदारता दिखाने के लिए बाध्य नहीं है”
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने सरकारी सेवा मामलों में अनुचित देरी से दायर याचिकाओं को लेकर एक बार फिर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी वर्षों तक अपने कथित अधिकारों को लेकर निष्क्रिय बना रहता है, तो बाद में अदालत से राहत की अपेक्षा नहीं कर सकता।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने गजेंद्र प्रताप सिंह बनाम अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड सहित दो अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से लगभग 20 साल की देरी से दायर की गई वेतन पुनर्निर्धारण से संबंधित याचिकाओं को खारिज करते हुए यह आदेश दिया है।
1994 का आदेश, 2024 में याचिका
याचिकाकर्ता गजेंद्र प्रताप सिंह प्रारंभ में तत्कालीन राजस्थान राज्य विद्युत बोर्ड में बिल डिस्ट्रीब्यूटर (क्लास-IV) के पद पर नियुक्त किया गया था।
बाद में उन्हें 15% विभागीय कोटे के अंतर्गत पदोन्नति देकर लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC) बनाया गया।
इस दौरान वेतन विसंगतियों को लेकर कर्मचारियों का विवाद मध्यस्थता (Arbitration) में गया, जहां 20 मई 1985 को मध्यस्थता अवॉर्ड पारित हुआ।
इस अवॉर्ड के तहत विभिन्न कैडरों के वेतनमानों का पुनरीक्षण किया गया। LDC पद का वेतनमान ₹370–570 से बढ़ाकर ₹530–740 किया गया।
याचिकाकर्ता का दावा था कि मध्यस्थता अवॉर्ड के अनुसार उनकी वेतन-निर्धारण प्रक्रिया ठीक से नहीं की गई और उन्हें ₹595 के बजाय न्यूनतम वेतन ₹530 पर रोक दिया गया, जो न्यायोचित नहीं था।
1994 का ऐतिहासिक फैसला
वर्ष 1993–94 में इसी मुद्दे पर 35 याचिकाएं राजस्थान हाईकोर्ट में दायर की गईं। इन सभी याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने 3 जून 1994 को संयुक्त रूप से फैसला देते हुए कहा कि—
15% विभागीय पदोन्नत LDC कर्मचारियों को उनके पूर्व क्लास-IV सेवा काल का लाभ वेतन निर्धारण में मिलेगा।
जबकि 85% प्रत्यक्ष भर्ती LDC कर्मचारियों को पूर्व सेवा का लाभ नहीं दिया जाएगा।
साथ ही मध्यस्थता अवॉर्ड के अनुसार वेतन पुनर्निर्धारण कर एरियर और 12% ब्याज देने के आदेश दिए गए थे।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि इन स्पष्ट आदेशों के बावजूद उन्हें पूरा लाभ नहीं दिया गया।
2014 में दायर याचिका
राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के करीब 20 वर्ष बाद, वर्ष 2014 में याचिकाकर्ता ने पुनः राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने कई बार विभाग को अभ्यावेदन और 2013 में कानूनी नोटिस भी दिया, लेकिन कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई।
निगम का विरोध
अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि याचिका अत्यधिक देरी से दायर की गई है।
1994 के फैसले का पूर्ण अनुपालन होने का दावा करते हुए निगम ने कहा कि याचिकाकर्ता का वेतन मध्यस्थता अवॉर्ड के अनुसार पुनर्निर्धारित किया गया था।
निगम की ओर से यह भी कहा गया कि 1 अप्रैल 1980 से याचिकाकर्ता का वेतन ₹430 तय किया गया और 1 अप्रैल 1983 से ₹520 किया गया।
अधिवक्ता ने कहा कि LDC पद पर पदोन्नति के समय आवश्यक वार्षिक वृद्धि और उच्चतर वेतनमान का लाभ भी दिया गया।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
दोनों पक्षों को सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हाईकोर्ट का 1994 का फैसला सामान्य निर्देशों वाला था, उसमें किसी भी कर्मचारी के लिए किसी विशेष वेतन स्तर पर फिक्सेशन का आदेश नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब प्रतिवादी निगम ने शपथपूर्वक कहा है कि मध्यस्थता अवॉर्ड का लाभ दिया जा चुका है, तो अदालत के पास हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार नहीं है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि याचिका 20 वर्षों की देरी बिना किसी ठोस और संतोषजनक स्पष्टीकरण के दायर की गई है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के Chennai Metropolitan Water Supply & Sewerage Board बनाम T.T. Murali Babu (2014) 4 SCC 108 का हवाला देते हुए कहा कि—
“बहुत अधिक देरी न्याय के मार्ग में बाधक है। अनुच्छेद 226 के तहत अदालत आलसी और निष्क्रिय व्यक्तियों के प्रति उदारता दिखाने के लिए बाध्य नहीं है।”
इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने गजेंद्र प्रताप सिंह और मोहन लाल सैनी की याचिकाओं को खारिज करने का आदेश दिया।