31 वर्ष पुराने मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने पति को किया बरी, बाड़मेर सत्र न्यायालय का फैसला पलटा
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306 आईपीसी) से जुड़े एक 31 वर्ष पुराने आपराधिक मामले में रिपोर्टेबल फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सिर्फ संदेह, पारिवारिक आरोप या सामाजिक दबाव के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक अभियोजन यह ठोस और विश्वसनीय सबूतों से सिद्ध न कर दे कि आरोपी ने जानबूझकर, सक्रिय रूप से या निरंतर ऐसे कृत्य किए जिनसे पीड़ित आत्महत्या के लिए विवश हो गया, तब तक धारा 306 के तहत सजा नहीं दी जा सकती।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने रूपा राम की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।
एकलपीठ ने इसके साथ ही रूपा राम के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, बाड़मेर द्वारा 22 दिसंबर 1994 को दिए गए दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द करते हुए आरोपी को बरी करने का फैसला सुनाया है।
संदेह कितना भी प्रबल क्यों न हो
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि “डांटना या फटकारना, आत्महत्या के लिए उकसावे का कारण नहीं हो सकता।”
हाईकोर्ट ने कहा कि—
“यदि यह मान भी लिया जाए कि पति ने पत्नी को मायके जाने को लेकर डांटा या फटकारा, तो मात्र यह तथ्य धारा 306 आईपीसी के तहत ‘उकसावा’ या ‘प्रेरणा’ नहीं माना जा सकता।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 306 आईपीसी तभी लागू होगी जब जानबूझकर उकसाया गया हो, लगातार मानसिक यातना दी गई हो और आत्महत्या तथा आरोपी के कृत्य के बीच सीधा और निकट संबंध (proximate cause) हो।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “संदेह कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।”
कोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने में मानसिक प्रक्रिया (mens rea) का होना अनिवार्य है। सिर्फ भावनात्मक आरोप या सामाजिक दबाव के आधार पर आपराधिक सजा नहीं दी जा सकती।
1994 में आत्महत्या का मामला
वर्ष 1994 में बाड़मेर जिले के गुड्डामालानी थाना क्षेत्र में रहने वाले रूपा राम की पत्नी लूंगा ने अपने ससुराल में आत्महत्या कर ली थी।
मामले में मृतका की मृत्यु की सूचना स्वयं पति ने पुलिस को दी, जिसके बाद धारा 174 सीआरपीसी के तहत मर्ग दर्ज कर जांच शुरू की गई।
जिला मजिस्ट्रेट द्वारा नियुक्त तत्कालीन तहसीलदार चूना राम ने मर्ग जांच की।
इस जांच में मृतका के पिता राय मल और माता मथुरा देवी भी शामिल हुए, लेकिन उस समय किसी भी प्रकार की प्रताड़ना, दहेज मांग या उत्पीड़न का कोई स्पष्ट आरोप दर्ज नहीं कराया गया।
बाद में पुलिस जांच के दौरान पति पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप (धारा 306 आईपीसी) लगाते हुए चालान पेश किया गया।
जिस पर सत्र न्यायालय ने पति को दोषी मानते हुए 7 वर्ष के कठोर कारावास और 100 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
31 साल बाद हाईकोर्ट ने पलटा फैसला
रूपा राम ने इस फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद कहा कि मृतका की शादी को लगभग 4 वर्ष हो चुके थे और दंपती से एक तीन वर्ष का पुत्र भी था।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मृतका की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं पाई गई और मृत्यु का कारण दम घुटना (asphyxia) बताया गया। आत्महत्या के अलावा किसी अन्य कारण का कोई ठोस प्रमाण नहीं था।
मर्ग जांच में चुप्पी, बाद में आरोप
हाईकोर्ट ने इस मामले में गवाहों के बयानों को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि मर्ग जांच के समय मृतका के माता-पिता ने किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या दहेज मांग की बात नहीं कही।
लेकिन बाद में ट्रायल के दौरान अदालत में दिए गए बयानों में नए आरोप जोड़े गए, जिनका कोई स्वतंत्र समर्थन नहीं था।
मृतका के पिता ने स्वीकार किया कि जीवनकाल में उन्होंने कभी किसी अधिकारी के सामने शिकायत दर्ज नहीं कराई।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रारंभिक स्तर पर आरोप न लगाना और बाद में गंभीर आरोप जोड़ना, अभियोजन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।
सामाजिक विवाद और क्रॉस मैरिज का प्रभाव
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में दोनों परिवारों में क्रॉस मैरिज (आपसी विवाह) हुई थी। मृतका के देवर की बेटी की शादी मृतका के पिता के बेटे से तय थी, जो बाद में टूट गई।
इसी कारण दोनों परिवारों में सामाजिक और पारिवारिक तनाव उत्पन्न हुआ और सामाजिक विवादों के कारण आरोपों में अतिशयोक्ति की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
ट्रायल कोर्ट की गंभीर चूक
हाईकोर्ट ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया और कानूनी मानकों की अनदेखी करते हुए भावनात्मक पहलुओं को अधिक महत्व दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा अभियोजन की कमजोरियों को नजरअंदाज किया गया।
हाईकोर्ट ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट के 1994 के दोषसिद्धि आदेश को रद्द करते हुए आरोपी रूपा राम को बरी करने का आदेश दिया।
जमानत बांड समाप्त किए
हालांकि धारा 437-ए सीआरपीसी के तहत भविष्य की कार्यवाही के लिए व्यक्तिगत बंधपत्र भरने का निर्देश दिया।