जोधपुर। राजस्थान में शिक्षा विभाग द्वारा उच्च माध्यमिक विद्यालयों में प्रिंसिपल एवं वाइस प्रिंसिपल पदों पर की गई पदोन्नतियों और उससे उपजे ट्रांसफर-पदस्थापन विवाद पर राजस्थान हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए रोक लगा दी हैं.
हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने स्पष्ट किया है कि जब वरिष्ठता सूची ही अदालत में चुनौती के अधीन हो, तब उसके आधार पर ट्रांसफर या पदस्थापन की प्रक्रिया आगे बढ़ाना प्रशासनिक अस्थिरता और अनावश्यक अव्यवस्था को जन्म दे सकता है।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेन्द्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने संपूर्ण राज्य में काउंसलिंग के जरिए प्रस्तावित सभी ट्रांसफर-पदस्थापन आदेशों पर रोक लगा दी हैं.
याचिकाओं में दलील
पूनम सोनी @ पूनम उपाध्याय व अन्य याचिकाकर्ताओं में शिक्षा विभाग की पदोन्नति प्रक्रिया और वरिष्ठता निर्धारण को चुनौती दी गई हैं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विवेक श्रीमाली व अन्य अधिवक्ताओं ने दलील दी कि विभाग ने प्रिंसिपल और वाइस प्रिंसिपल पदों पर पदोन्नति के दौरान नियमों, वरिष्ठता सिद्धांत और स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन किया है।
याचिका में कहा गया कि विवादित वरिष्ठता सूची के आधार पर पदोन्नत अधिकारियों को आगे स्थानांतरण-पदस्थापन देने की तैयारी की जा रही है, जबकि वही वरिष्ठता सूची अदालत के समक्ष विचाराधीन है।
याचिका में कहा गया कि इससे न केवल वरिष्ठ और पात्र अधिकारियों के अधिकार प्रभावित होंगे, बल्कि बाद में अदालत के निर्णय के अनुसार स्थिति बदलने पर बार-बार ट्रांसफर करने पड़ सकते हैं।
लगातार स्थगन मांगे जाते रहे
बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सभी मामले वर्ष 2023 से लंबित हैं और इन्हें प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध किया गया था।
इसके बावजूद, किसी न किसी कारण से लगातार स्थगन मांगे जाते रहे।
हाईकोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि सुनवाई में देरी के दौरान विभाग विवादित वरिष्ठता के आधार पर प्रशासनिक निर्णय लेने की दिशा में आगे बढ़ रहा था
हाईकोर्ट ने अपने पूर्व के अंतरिम आदेशों का भी हवाला देते हुए कहा कि 10 फरवरी 2025 और 8 अगस्त 2025 को पारित आदेशों में यह स्पष्ट किया गया था कि की गई सभी पदोन्नतियां संबंधित रिट याचिकाओं के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन आदेशों में राज्य सरकार को निर्देश दिया गया था कि समीक्षा डीपीसी/डीपीसी की प्रक्रिया पूरी की जाए, लेकिन यह भी साफ किया गया था कि पदोन्नति और पोस्टिंग का प्रभाव अंतिम निर्णय पर निर्भर करेगा
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता सज्जन सिंह राठौड़ ने अदालत से समय देने का आग्रह किया और बताया कि महाधिवक्ता को इस मामले में पूर्व में समान विवाद में उपस्थित रहने के कारण अलग होना पड़ा, जिससे वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ी।
हाईकोर्ट इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इतने लंबे समय से लंबित मामलों में ऐसी व्यवस्थाएं पहले ही कर ली जानी चाहिए थीं।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि विवादित वरिष्ठता सूची के आधार पर काउंसलिंग से उत्पन्न होने वाले सभी प्रस्तावित स्थानांतरण-पदस्थापन अगले आदेश तक स्थगित रहेंगे।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा करना आवश्यक है ताकि भविष्य में वरिष्ठता में किसी भी संभावित बदलाव की स्थिति में बार-बार तबादलों से उत्पन्न होने वाली अस्थिरता और प्रशासनिक असुविधा से बचा जा सके