The Times of India की खबर प्रसंज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने धरोहर स्थलो में निर्माण, विस्तार, पार्किंग पर लगाई रोक
जयपुर । राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य के दो ऐतिहासिक स्थलों में शामिल हल्दीघाटी दर्रा और रक्त तलाई की बदहाली को लेकर स्वप्रेणा प्रसंज्ञान लेते हुए राज्य सरकार, केंद्र सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI), पर्यटन, वन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन सहित 16 विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है.
जस्टिस पुष्पेन्द्रसिंह भाटी और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने स्वप्रेणा प्रसंज्ञान से जनहित याचिका दायर करते हुए कहा कि “राजपूत गौरव के प्रतीक पिकनिक स्पॉट बनकर रह गए हैं”.
हाईकोर्ट ने कहा कि अतिक्रमण, कचरा, पर्यावरणीय प्रदूषण और प्रशासनिक उदासीनता ने इन स्मारकों की संस्कृतिक, ऐतिहासिक और पारिस्थितिकीय अखंडता को “लगातार और अपरिवर्तनीय नुकसान” पहुंचाया है।
जिम्मेदार लापरवाह बने रहें
मीडिया में प्रकाशित खबरो पर प्रसंज्ञान लेते हुए खंडपीठ ने कहा कि राजस्थान की शौर्यगाथा, बलिदान और स्वाभिमान की प्रतीक हल्दीघाटी और रक्त तलाई आज गंभीर उपेक्षा, अवैध अतिक्रमण और पर्यावरणीय क्षरण का दंश झेल रही हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संवैधानिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय अधिकारों के उल्लंघन हैं.
इन्हीं हालातों को देखते हुए Rajasthan High Court इन स्थलों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए स्वतः संज्ञान (Suo Motu) ले रहे हैं.
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ भारत के इस गौरवशाली इतिहास से वंचित हो जाएंगी।
हाईकोर्ट ने इस मामले को “Protection and Preservation of the Historic Sites of Haldighati and Rakht Talai, District Udaipur” शीर्षक से जनहित याचिका के रूप में दर्ज करते हुए
The Times of India की खबर
हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय दैनिक अखबार The Times of India में प्रकाशित “Highway to Haldighati: Where Chetak’s Leap Meets Truck’s Roar” समाचार पर प्रसंज्ञान लिया हैं.
इस रिपोर्ट में बताया गया कि किस प्रकार हल्दीघाटी जैसे ऐतिहासिक युद्धस्थल को चौड़ी सड़क, भारी वाहनों, कचरे, शोर और प्रदूषण के बीच कुचला जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, जहाँ कभी इतिहासकारों ने लिखा था कि हल्दीघाटी का दर्रा इतना संकरा था कि केवल दो घोड़े साथ-साथ निकल सकते थे, वहीं अब उसे 40 मीटर चौड़ी डबल लेन हाईवे में तब्दील कर दिया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया कि सड़क विस्तार के नाम पर 200 से अधिक पेड़ों की कटाई, पहाड़ियों को समतल करना और संभावित पुरातात्विक अवशेषों को डामर के नीचे दफना देना—ये सभी तथ्य अदालत में पेश किए गए
हल्दीघाटी: वीरता का प्रतीक, उपेक्षा का शिकार
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हल्दीघाटी का नाम सुनते ही Maharana Pratap, चेतक की छलांग और मातृभूमि के लिए बलिदान की स्मृतियाँ जीवंत हो उठती हैं। यह वही स्थल है जहाँ 1576 में मुग़ल सम्राट अकबर की विशाल सेना के सामने मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने अदम्य साहस का परिचय दिया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐतिहासिक युद्धभूमि पर भारी ट्रैफिक, ट्रक और डंपर दिन-रात दौड़ रहे हैं और रेलिंग, चेतावनी बोर्ड और पार्किंग व्यवस्था का पूरी तरह अभाव है।
हाईकोर्ट ने रिपोर्ट को आधार बनाते हुए कहा कि पर्यटक और श्रद्धालु युद्धस्थल को पिकनिक स्पॉट समझकर वहाँ गाड़ियाँ खड़ी करते हैं, प्लास्टिक कचरा, गुटखा पाउच, शराब की बोतलें और खाद्य पैकेट हर ओर बिखरे पड़े हैं।
हाईकोर्ट ने इसे न केवल ऐतिहासिक अपमान बल्कि पर्यावरणीय खतरा भी माना।
रक्त तलाई: जहाँ धरती हुई थी लाल
हाईकोर्ट ने इस ऐतिहासिक धरोहर को लेकर कहा कि हल्दीघाटी युद्ध का निर्णायक क्षण Rakht Talai में घटित हुआ था। लोककथाओं के अनुसार, यहाँ इतनी भीषण लड़ाई हुई कि धरती रक्त से लाल हो गई—इसीलिए इसे ‘रक्त तलाई’ कहा गया।
हाईकोर्ट के अनुसार आज इस पवित्र स्थल की स्थिति अत्यंत दयनीय है जहां पर घुटनों तक ऊँची झाड़ियाँ और टूटे रास्ते, शहीदों की छतरियाँ और स्मारक उपेक्षा का शिकार हो रही हैं वही तालाब सूखा पड़ा है, टाइल्स टूट चुकी हैं.
अदालत ने कहा कि अवैध निर्माणों से सीवेज का गंदा पानी स्थल के चारों ओर बह रहा है और रात में यह स्थान असामाजिक तत्वों का अड्डा बन जाता हैं.
हाईकोर्ट ने इसे इतिहास की खुली अवमानना करार दिया।
अनुच्छेद 49, 51A(g) और 21 का उल्लघंन
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्व्रपेणा प्रसंज्ञान में कहा कि मामला केवल पर्यटन या सड़क निर्माण का नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 49 का उल्लंघन है, जो राज्य को राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों की रक्षा का दायित्व देता है।
अनुच्छेद 51A(g) के तहत नागरिकों और सरकार का कर्तव्य है कि वे सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करें।
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त वातावरण का अधिकार प्रभावित हो रहा है।
इसके साथ ही, अदालत ने Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains Act, 1958, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वायु एवं जल प्रदूषण कानून, वन संरक्षण अधिनियम सहित कई कानूनों के उल्लंघन की भी बात कही।
सरकार और प्रशासन को फटकार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 1960 के दशक से ही इस क्षेत्र में धीरे-धीरे क्षरण शुरू हो गया था, लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राज्य सरकार, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, पर्यटन विभाग, किसी ने भी समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए।
यहाँ तक कि वर्ष 2024 के बजट में घोषित ₹100 करोड़ के महाराणा प्रताप टूरिस्ट सर्किट की योजना भी 2025 तक केवल कागज़ों में ही सिमटी रही।
हाईकोर्ट ने कहा कि इसके लिए डीपीआर तक तैयार नहीं हो पाई।
हाईकोर्ट के अंतरिम निर्देश
राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इन ऐतिहासिक धरोहर स्थल क्षेत्र में बिना अदालत की अनुमति के किसी भी निर्माण या विस्तार पर रोक लगा दी हैं.
हाईकोर्ट ने 15 दिनों के भीतर विशेष सफाई अभियान चलाने के आदेश देने के साथ ऐतिहासिक ढलानों पर वाहन पार्किंग पर प्रतिबंध लगा दिया हैं.
हाईकोर्ट ने कचरा फैलाने पर जुर्माना लगाने, 30 दिनों में सीवेज समस्या का समाधान करने, स्थायी केयरटेकर और निगरानी व्यवस्था करने के आदेश दिए हैं.
3 न्यायमित्र की नियुक्ति
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले की संपूर्ण रिपोर्ट मोनिटरिंग और कोर्ट को असिस्ट करने के लिए तीन अधिवक्ताओं को न्यायमित्र नियुक्त किया हैं.
जिसमें अधिवक्ता लक्षय सिंह उदावत, अधिवक्ता तनिया तुली, अधिवक्ता यश्वी खंडेलवाल को नियुक्त किया गया हैं.
हाईकोर्ट ने सभी संबंधित विभागों को शपथपत्र दाखिल कर यह बताने का निर्देश दिया गया है कि अब तक क्या कदम उठाए गए और आगे की समय-सीमा क्या होगी।
मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी 2026 को निर्धारित की गई है।