टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

सरकारी कर्मचारियों को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत, पोलिंग बूथ का पंजीकृत मतदाता ही बनाया जाए बीएलओ – राजस्थान हाईकोर्ट

Minor-Age Marriage Not Ground to Deny Widow Reservation: Rajasthan High Court Grants Relief in Patwari Recruitment Case

दूसरे बूथ के मतदाता को जबरन बीएलओ बनाने पर कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग की गाइडलाइन के पालन के दिए निर्देश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) की नियुक्ति को लेकर चुनाव आयोग की गाइडलाइन के सख्त पालन पर जोर देते हुए एक अहम फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया हैं कि बीएलओ की नियुक्ति में नियमों की अनदेखी किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी मतदान केंद्र पर बीएलओ बनाते समय प्राथमिकता उसी सरकारी कर्मचारी को दी जानी चाहिए, जो उस पोलिंग बूथ का पंजीकृत मतदाता हो। किसी अन्य बूथ के वोटर को जबरन बीएलओ नियुक्त करना न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि इससे अनावश्यक विवाद भी पैदा होते हैं।

हाईकोर्ट मुख्यपीठ जोधपुर में जस्टिस मुन्नूरी लक्ष्मण की एकलपीठ ने श्रीगंगानगर निवासी पालासिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया हैं.

हाईकोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर जारी की गई गाइडलाइन का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष और विवाद-मुक्त बनाए रखना है। ऐसे में प्रशासन द्वारा इन नियमों की अनदेखी करना स्वीकार्य नहीं है।

वोटर कहीं और, ड्यूटी कहीं और

मामला श्रीगंगानगर जिले निवासी याचिकाकर्ता पालासिंह ग्राम 6 ओ बी, तहसील श्रीकरणपुर के निवासी हैं और वे पोलिंग बूथ संख्या 3, श्रीकरणपुर के पंजीकृत मतदाता हैं।

इसके बावजूद 23 जुलाई 2025 को जारी आदेश के तहत उन्हें पोलिंग बूथ संख्या 9, श्रीमती बिरमादेवी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, लालगढ़ बिश्नोइयान में बीएलओ नियुक्त कर दिया गया।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत यादव ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि यह नियुक्ति चुनाव आयोग की 5 जून 2025 को जारी संशोधित गाइडलाइन का स्पष्ट उल्लंघन है।

गाइडलाइन में स्पष्ट किया गया है कि बीएलओ वही व्यक्ति बनाया जाना चाहिए, जो उसी मतदान केंद्र का मतदाता हो, जब तक कि वहां कोई भी स्थानीय कर्मचारी उपलब्ध न हो।

स्थानीय के बावजूद बाहरी नियुक्ति

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क रखा गया कि जिस पोलिंग बूथ पर उन्हें बीएलओ नियुक्त किया गया है, वहां कई ऐसे सरकारी कर्मचारी मौजूद हैं, जो उसी बूथ के पंजीकृत वोटर हैं।

इसके बावजूद प्रशासन ने बिना कोई ठोस कारण बताए एक बाहरी कर्मचारी को बीएलओ बना दिया।

यह प्रक्रिया न केवल नियमों के विपरीत है, बल्कि स्थानीय कर्मचारियों के अधिकारों का भी हनन करती है।

कोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए कहा कि जब स्थानीय स्तर पर योग्य और पात्र कर्मचारी उपलब्ध हों, तब बाहरी व्यक्ति की नियुक्ति करना चुनाव आयोग की मंशा के खिलाफ है।

इससे न केवल प्रशासनिक असंतोष बढ़ता है, बल्कि चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।

चुनाव आयोग की तीन-स्तरीय गाइडलाइन

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में चुनाव आयोग की बीएलओ नियुक्ति से जुड़ी तीन-स्तरीय व्यवस्था को विस्तार से स्पष्ट किया।

क्लॉज 1.1 के तहत सबसे पहले उसी क्षेत्र के पंजीकृत मतदाता, जो ग्रुप-सी या उससे ऊपर के नियमित सरकारी कर्मचारी हों, उन्हें बीएलओ नियुक्त किया जाना चाहिए।

क्लॉज 1.2 के अनुसार यदि नियमित कर्मचारी उपलब्ध न हों, तो स्थानीय मतदाता आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, संविदा शिक्षक या केंद्र सरकार के कर्मचारी को बीएलओ बनाया जा सकता है।

क्लॉज 1.3 में यह स्पष्ट किया गया है कि बाहरी व्यक्ति की नियुक्ति तभी की जा सकती है, जब यह प्रमाणित हो जाए कि उस पोलिंग स्टेशन पर कोई भी स्थानीय मतदाता कर्मचारी उपलब्ध नहीं है।

15 दिन में पुनर्विचार का निर्देश

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर संबंधित विभाग के समक्ष स्थानीय कर्मचारियों के नामों सहित एक विस्तृत रिप्रेजेंटेशन प्रस्तुत करे।

हाईकोर्ट ने जिला अधिकारियों को आदेश दिया कि वे इस रिप्रेजेंटेशन पर 15 दिनों के भीतर उचित निर्णय लें।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अवधि के दौरान यदि याचिकाकर्ता बीएलओ की ड्यूटी ज्वॉइन नहीं करता है, तो उसके खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जांच के बाद यह साबित हो जाए कि संबंधित पोलिंग बूथ पर कोई भी स्थानीय कर्मचारी उपलब्ध नहीं है, तो पूर्व में की गई नियुक्ति को जारी रखा जा सकता है।

सबसे अधिक लोकप्रिय