नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) कानून को लेकर एक अहम और स्पष्ट फैसला सुनाया है, जो भविष्य में कॉन्ट्रैक्ट विवादों के कई मामलों को प्रभावित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन कानून को लेकर फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई नया कॉन्ट्रैक्ट पुराने एग्रीमेंट की सभी शर्तों को पूरी तरह अपनाता है, तो उस पुराने समझौते में मौजूद arbitration clause भी नए कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा माना जाएगा। इसके लिए नए समझौते में अलग से arbitration clause लिखना या उसका विशेष उल्लेख करना जरूरी नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि यदि बाद का समझौता साफ तौर पर कहता है कि पुराने एग्रीमेंट की सभी शर्तें और क्लॉज उस पर लागू होंगे, तो इसका मतलब है कि पक्षकारों ने पुराने समझौते को “body and soul” यानी पूरी तरह नए कॉन्ट्रैक्ट में शामिल कर लिया है।
जस्टिस Sanjay Kumar और जस्टिस K Vinod Chandran की बेंच ने यह फैसला देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया, जिसने डेवलपर की आर्बिट्रेशन की मांग ठुकरा दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि यदि किसी नए एग्रीमेंट में स्पष्ट रूप से लिखा है कि पुराने कॉन्ट्रैक्ट की सभी शर्तें और क्लॉज नए समझौते का हिस्सा माने जाएंगे, तो arbitration clause भी स्वतः उसमें शामिल माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“यह केवल पुराने एग्रीमेंट का सामान्य संदर्भ देने का मामला नहीं था, बल्कि पक्षकारों ने पुराने Development Agreement को पूरी तरह बाद के एग्रीमेंट में शामिल करने का स्पष्ट इरादा दिखाया था।”
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में यह साबित करने की जरूरत नहीं कि पक्षकारों ने अलग से arbitration clause लागू करने का विशेष इरादा जताया था।
रीडेवलपमेंट से शुरू हुआ पूरा विवाद
मामला मुंबई में एक रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट से जुड़ा था। डेवलपर Hirani Developers ने 2011 में Nehru Nagar Samruddhi CHS Ltd. के साथ Development Agreement किया था। इस एग्रीमेंट में Clause 36 के तहत arbitration clause मौजूद था।
बाद में 2023 और 2024 में डेवलपर और सोसाइटी के व्यक्तिगत सदस्यों के बीच Permanent Alternate Accommodation Agreements किए गए। ये समझौते रीडेवलपमेंट के दौरान वैकल्पिक आवास व्यवस्था से जुड़े थे।
हालांकि इन बाद के एग्रीमेंट्स में अलग से arbitration clause नहीं था, लेकिन Clause 14 में लिखा गया था कि पुराने Development Agreement की “सभी शर्तें और क्लॉज” इन समझौतों का हिस्सा माने जाएंगे और पक्षकारों पर बाध्यकारी होंगे।
यानी नए एग्रीमेंट ने पुराने एग्रीमेंट को पूरी तरह अपनाने की बात कही थी। यही बात बाद में पूरे विवाद का केंद्र बनी।
विवाद बढ़ा तो कंज्यूमर कमीशन पहुंचे सदस्य
बाद में डेवलपर और कुछ सोसाइटी सदस्यों के बीच विवाद शुरू हो गया। कुछ सदस्यों ने Consumer Protection Act, 2019 के तहत Consumer Disputes Redressal Commission का रुख किया।
इसके बाद डेवलपर ने Arbitration and Conciliation Act, 1996 की धारा 21 के तहत नोटिस जारी कर आर्बिट्रेशन शुरू करने की मांग की।
लेकिन सोसाइटी सदस्यों ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उनके और डेवलपर के बीच कोई arbitration agreement ही मौजूद नहीं है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने ठुकराई मांग
मामला बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा, जहां डेवलपर ने धारा 11 के तहत आर्बिट्रेटर नियुक्त करने की मांग की।
लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि बाद के एग्रीमेंट में arbitration clause का विशेष उल्लेख नहीं था और न ही पक्षकारों के बीच आर्बिट्रेशन कराने का स्पष्ट इरादा दिखता था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने डेवलपर की याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट का मानना था कि आर्बिट्रेशन के लिए पक्षों की स्पष्ट सहमति दिखनी चाहिए, जो यहां नजर नहीं आ रही थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला
सुप्रीम Court ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से असहमति जताई।
अदालत ने कहा कि Clause 14 की भाषा बिल्कुल स्पष्ट थी और उसमें कहा गया था कि पुराने Development Agreement की सभी शर्तें और क्लॉज नए एग्रीमेंट्स पर लागू होंगे।
कोर्ट ने कहा:
“इससे ज्यादा स्पष्ट संकेत नहीं हो सकता कि पक्षकारों का इरादा पूरे Development Agreement को बाद के एग्रीमेंट्स में शामिल करने का था।”
कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ “जिक्र” का मामला नहीं है, बल्कि “पूरी तरह शामिल करने” का मामला है। इसलिए आर्बिट्रेशन क्लॉज भी अपने आप लागू माना जाएगा।
‘Body and Soul’ टिप्पणी क्यों बनी अहम
फैसले में सुप्रीम कोर्ट की “body and soul” वाली टिप्पणी खास चर्चा में है।
अदालत ने कहा कि पक्षकारों ने पुराने Development Agreement को “body and soul” यानी पूरी तरह बाद के समझौतों में शामिल किया था। इसलिए arbitration clause भी स्वतः लागू हो गया और आर्बिट्रेशन क्लॉज को अलग से लिखने की जरूरत नहीं थी।
यह टिप्पणी भविष्य में कॉन्ट्रैक्ट विवादों में काफी अहम मानी जाएगी, खासकर उन मामलों में जहां कई स्तर के एग्रीमेंट होते हैं।
पुराने फैसले का भी दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले M.R. Engineers and Contractors Private Limited v. Som Datt Builders Limited का भी हवाला दिया।
उस फैसले में अदालत ने कहा था कि जब किसी दस्तावेज को reference के जरिए कॉन्ट्रैक्ट में शामिल किया जाता है, तो सामान्य रूप से माना जाता है कि पक्षकार पूरे दस्तावेज को अपनाना चाहते हैं।
इसी सिद्धांत को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यहां arbitration clause भी नए एग्रीमेंट्स का हिस्सा माना जाएगा।
हाईकोर्ट का फैसला रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश
अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने कानून की सही व्याख्या नहीं की। खासकर Arbitration Act की धारा 7(5) को समझने में गलती हुई।
कोर्ट के मुताबिक, अगर किसी दस्तावेज़ को पूरी तरह शामिल किया गया है, तो उसकी सभी शर्तें अपने आप लागू हो जाती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने डेवलपर की अपील स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और माना कि पक्षकारों के बीच वैध arbitration agreement मौजूद था। अब विवाद का समाधान arbitration के जरिए आगे बढ़ सकेगा।
रियल एस्टेट और कॉर्पोरेट कॉन्ट्रैक्ट्स पर बड़ा असर
कोर्यट का यह फैसला रियल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर और कॉर्पोरेट कॉन्ट्रैक्ट्स पर बड़ा असर डाल सकता है।
अक्सर बड़े प्रोजेक्ट्स में मूल समझौते, सप्लीमेंट्री एग्रीमेंट और बाद के व्यक्तिगत कॉन्ट्रैक्ट अलग-अलग चरणों में किए जाते हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यदि नया एग्रीमेंट पुराने समझौते को पूरी तरह अपनाता है, तो arbitration clause भी लागू माना जाएगा, भले उसका अलग से उल्लेख न हो।
फैसले को Arbitration and Conciliation Act की धारा 7(5) की व्याख्या के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह निर्णय भविष्य में उन मामलों में मिसाल बनेगा जहां पक्षकार यह विवाद उठाते हैं कि बाद के कॉन्ट्रैक्ट में arbitration clause लागू है या नहीं।
इससे तकनीकी आधार पर आर्बिट्रेशन से बचने की गुंजाइश कम हो जाएगी।
