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‘वकालत में ब्लैक शीप बर्दाश्त नहीं’, सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल से जवाब मांगा, कहा-सिस्टम में तुरंत सुधार जरूरी

“Black Sheep” in Legal Profession Must Be Dealt With Immediately: Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट ने वकालत पेशे में ब्लैक शीप पर सख्त टिप्पणी करते हुए बार काउंसिल की अनुशासनात्मक व्यवस्था पर सवाल उठाए और सुधार की जरूरत बताई।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वकालत पेशे में अनुशासन और आचरण को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि “ब्लैक शीप” यानी पेशे की गरिमा को नुकसान पहुंचाने वाले वकीलों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए।

कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्य बार काउंसिल्स की अनुशासनात्मक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए।

अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर वकालत जैसे सम्मानजनक पेशे में गलत आचरण करने वालों के खिलाफ समय पर कार्रवाई नहीं होती, तो इससे पूरे न्यायिक सिस्टम की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: पेशे की साख दांव पर

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वकालत केवल एक पेशा नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था का अहम स्तंभ है।

ऐसे में अगर कुछ वकील गलत आचरण करते हैं और उनके खिलाफ समय पर कार्रवाई नहीं होती, तो इससे आम लोगों का भरोसा कमजोर होता है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि: “लीगल प्रोफेशन में मौजूद ‘ब्लैक शीपसे तुरंत निपटना जरूरी है।”

कोर्ट ने “ब्लैक शीप” शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि ऐसे तत्वों को तुरंत पहचानकर सख्ती से निपटना जरूरी है।

इस टिप्पणी से कोर्ट का रुख साफ दिखता है कि वह वकालत पेशे में अनुशासन और नैतिकता बनाए रखने को लेकर गंभीर है।

बार काउंसिल की भूमिका पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से बार काउंसिल की अनुशासनात्मक प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई।

अदालत ने पूछा कि जब शिकायतें दर्ज होती हैं, तो उनके निपटारे में इतना समय क्यों लगता है? क्या ऐसी कोई प्रभावी व्यवस्था है, जिससे शिकायतों का त्वरित और निष्पक्ष निपटारा हो सके?

अदालत ने कहा कि अनुशासनात्मक मामलों में देरी से न केवल न्याय प्रभावित होता है, बल्कि गलत संदेश भी जाता है कि पेशे में अनुशासन को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

क्लाइंट के लिए सिस्टम कितना कमजोर?

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कई मामलों में क्लाइंट्स को अपने वकील की गलत या अनैतिक हरकतों के खिलाफ राहत पाने में काफी मुश्किल होती है।

कोर्ट ने पूछा कि जब क्लाइंट अपने वकील के खिलाफ शिकायत करता है, तो उसे प्रभावी और समयबद्ध न्याय क्यों नहीं मिलता। साथ ही यह भी कहा गया कि शिकायतों के निपटारे में देरी और ढिलाई एक बड़ी समस्या है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई होना जरूरी है, ताकि दोषी वकीलों पर तुरंत कार्रवाई हो सके।

कोर्ट के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में शिकायत दर्ज होने के बाद भी कार्रवाई में देरी होती है, जिससे पीड़ित व्यक्ति को न्याय मिलने में बाधा आती है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक ऐसे वकील से जुड़ा था जिसे कथित तौर पर एक बैंक द्वारा ब्लैकलिस्ट किया गया था।

इस पूरे विवाद के दौरान सवाल उठा कि जब किसी वकील पर गंभीर आरोप लगते हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई करने का सही और प्रभावी सिस्टम क्या है।

इसी संदर्भ में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने व्यापक स्तर पर वकीलों के खिलाफ शिकायतों और अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाए।

कोर्ट का संकेत: सुधार की जरूरत

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई अंतिम दिशा-निर्देश जारी नहीं किया, लेकिन स्पष्ट संकेत दिया कि बार काउंसिल्स को अपनी अनुशासनात्मक व्यवस्था में सुधार करना होगा।

अदालत ने कहा कि यह जरूरी है कि शिकायतों के निपटारे के लिए एक प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध तंत्र विकसित किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में स्पष्ट किया कि वकालत पेशे में “ब्लैक शीप” को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई जरूरी है।

अदालत ने यह भी कहा कि बार काउंसिल्स को अपनी अनुशासनात्मक प्रक्रिया को मजबूत बनाना होगा, ताकि न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता और पेशे की गरिमा बनी रहे।

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