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कम अटेंडेंस पर एग्जाम दें सकेंगे या नहीं? लॉ स्टूडेंट्स के लिए सुप्रीम कोर्ट तय करेगा नियम

Can Law Students Appear In Exams With Low Attendance? Supreme Court To Decide Key Rule
सुप्रीम कोर्ट अब तय करेगा कि कम अटेंडेंस वाले लॉ स्टूडेंट्स परीक्षा दे सकते हैं या नहीं। NMIMS की याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने BCI से जवाब मांगा है।

नई दिल्ली: देशभर के लॉ स्टूडेंट्स के लिए एक अहम मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है। सवाल साफ है-अगर अटेंडेंस कम है, तो क्या छात्र एग्जाम दे सकता है?

इस पर अब सुप्रीम कोर्ट अंतिम फैसला करेगा, जो आगे की शिक्षा व्यवस्था की दिशा तय कर सकता है। इस मुद्दे पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने Bar Council of India से जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा विवाद?

मामला Narsee Monjee Institute of Management Studies यानी NMIMS द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है।

कॉलेज ने दिल्ली हाईकोर्ट के नवंबर 2025 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि किसी मान्यता प्राप्त लॉ कॉलेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे छात्र को सिर्फ कम उपस्थिति के आधार पर परीक्षा देने से नहीं रोका जा सकता।

इस फैसले के बाद कई छात्रों ने कम अटेंडेंस के बावजूद परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगते हुए अदालतों का दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया।

NMIMS का कहना है कि इससे अकादमिक अनुशासन और संस्थानों की स्वायत्तता पर असर पड़ रहा है।

अभी नहीं लगेगी रोक, बाद में तय होगा नियम: सुप्रीम कोर्ट

हालांकि अदालत ने फिलहाल Delhi High Court के उस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें कहा गया था कि केवल अटेंडेंस की कमी के आधार पर किसी लॉ छात्र को परीक्षा देने या आगे की पढ़ाई जारी रखने से नहीं रोका जा सकता।

जस्टिस Vikram Nath, जस्टिस Sandeep Mehta और जस्टिस Vijay Bishnoi की बेंच ने कहा:

“हम उस आदेश पर अभी रोक नहीं लगा रहे हैं। हम मामले को सुनेंगे, फैसला करेंगे और कानून की सही स्थिति स्पष्ट करेंगे।”

“फिर कॉलेज जाने की जरूरत क्या है?”

सुनवाई के दौरान NMIMS की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Mukul Rohatgi ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए।

उन्होंने अदालत से कहा:

“हाईकोर्ट का मतलब यह हो गया कि कहीं भी अटेंडेंस जरूरी नहीं है। लोग कॉलेज ही नहीं जाना चाहते। फिर मैं सोच रहा हूं कि हम कॉलेज क्यों जाते थे?”

उनका तर्क था कि यदि छात्रों को कम अटेंडेंस के बावजूद परीक्षा में बैठने की छूट मिलती रही, तो नियमित क्लासरूम एजुकेशन का महत्व खत्म हो जाएगा।

उन्होंने तर्क दिया कि अगर अटेंडेंस जरूरी नहीं रहेगा, तो छात्र कॉलेज आना ही बंद कर देंगे

सुप्रीम कोर्ट ने भी जताई चिंता

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई।

बेंच ने टिप्पणी की कि यदि दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को इसी तरह लागू किया गया, तो नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के हॉस्टल केवल ‘boarding and lodging facilities’ यानी ‘रहने-खाने की जगह‘ बनकर रह जाएंगे।

अदालत की यह टिप्पणी इस ओर संकेत मानी जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट शिक्षा संस्थानों में न्यूनतम उपस्थिति की जरूरत को पूरी तरह नजरअंदाज करने के पक्ष में नहीं दिख रहा।

यानी कोर्ट ने माना कि इस फैसले का असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।

BCI के नियम क्या कहते हैं?

इस मामले में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियम भी अहम भूमिका निभाते हैं।

BCI के अनुसार:

  • लॉ स्टूडेंट्स के लिए कम से कम 70% अटेंडेंस अनिवार्य है।
  • खास परिस्थितियों में इसे घटाकर 65% तक राहत दी जा सकती है।
  • उससे कम उपस्थिति होने पर छात्र को परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जाती।

याचिका में कहा गया है कि यह नियम प्रोफेशनल कोर्स की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए जरूरी है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या नियम हैं?

याचिका में अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर जैसे देशों की कानूनी शिक्षा व्यवस्था का भी हवाला दिया गया।

NMIMS ने कहा कि इन देशों में भी प्रोफेशनल कोर्सेज के लिए अनिवार्य उपस्थिति और कम अटेंडेंस पर परीक्षा में रोक जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।

याचिका में दावा किया गया कि दुनिया भर में प्रोफेशनल लीगल एजुकेशन में attendance norms को महत्वपूर्ण मानक माना जाता है।

कॉलेज और छात्रों के बीच टकराव क्यों?

इस मामले में असली विवाद अनुशासन बनाम सुविधा का है।

कॉलेजों का पक्ष:

  • क्लासरूम पढ़ाई लॉ एजुकेशन की नींव है।
  • सिर्फ इंटर्नशिप या प्रतियोगिताओं से पढ़ाई पूरी नहीं हो सकती।
  • अटेंडेंस जरूरी है, वरना शिक्षा का स्तर गिर जाएगा।

छात्रों का पक्ष (हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर):

  • सिर्फ अटेंडेंस के कारण एग्जाम से रोकना गलत है।
  • अन्य गतिविधियां भी सीखने का हिस्सा हैं।

‘लॉ एजुकेशन सिर्फ इंटर्नशिप से नहीं चलेगी

NMIMS ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि क्लासरूम टीचिंग लॉ एजुकेशन की बुनियाद है, खासकर पांच वर्षीय इंटीग्रेटेड लॉ कोर्स में जहां छात्र सीधे स्कूल से कॉलेज आते हैं।

याचिका में कहा गया कि लेक्चर, ट्यूटोरियल, मूट कोर्ट एक्सरसाइज और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग जैसी गतिविधियों को केवल इंटर्नशिप या अन्य सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों से पूरी तरह रिप्लेस नहीं किया जा सकता।

कॉलेज का कहना है कि नियमित उपस्थिति से ही छात्र कानूनी शिक्षा की बारीकियां और व्यावहारिक कौशल सीख पाते हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट करेगा अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने BCI से जवाब मांगा है और इस मामले को अन्य लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया है जिनमें BCI के विभिन्न सर्कुलर को चुनौती दी गई है।

इन सर्कुलर में छात्रों के criminal background disclosure, simultaneous academic pursuits, employment status और attendance compliance जैसे मुद्दों से जुड़े नियम शामिल हैं।

अब कोर्ट यह तय करेगा कि:

  • क्या कम अटेंडेंस पर एग्जाम से रोका जा सकता है।
  • कॉलेजों को कितनी छूट होनी चाहिए।
  • छात्रों और संस्थानों के बीच संतुलन कैसे बने।

इससे संकेत मिल रहा है कि सुप्रीम कोर्ट अब कानूनी शिक्षा से जुड़े कई बड़े नियामकीय मुद्दों पर व्यापक फैसला दे सकता है। अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा कि आगे पढ़ाई में अटेंडेंस ज्यादा जरूरी होगी या छात्रों को दी जाने वाली छूट

यह मामला सिर्फ लॉ स्टूडेंट्स का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा सिस्टम से जुड़ा है। कोर्ट का आने वाला फैसला देशभर के लॉ कॉलेजों और प्रोफेशनल शिक्षा संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

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