जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारी की मौत के बाद अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े करीब 10 साल पुराने मामले में परिवार को राहत देने से इनकार कर दिया है।
हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति की मांग खारिज करने वाले सरकार के फैसले को बरकरार रखते हुए स्पेशल अपील भी खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मकसद कर्मचारी की अचानक मौत से परिवार पर आए आर्थिक संकट से तत्काल राहत देना है, न कि कई साल बाद परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी देना।
जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की बेंच ने कहा कि परिवार का एक अन्य बेटा पहले से सरकारी नौकरी में था। ऐसे में अनुकंपा नियुक्ति के नियमों के तहत दूसरे बेटे को नियुक्ति नहीं दी जा सकती थी। कोर्ट ने यह भी माना कि मामले को आगे बढ़ाने में याचिकाकर्ता की ओर से देरी और लापरवाही हुई।
इस मामले में अपीलकर्ता की ओर से एडवोकेट अपूर्वा अग्रवाल ने एडवोकेट हिमांशु जैन की ओर से पैरवी की।
2015 में सरकारी कर्मचारी की मौत, बेटे ने मांगी थी अनुकंपा नियुक्ति
मामले के अनुसार पुष्पा देवी के पति पुरुषोत्तम सिंह सरकारी कर्मचारी थे। 21 मई 2015 को नौकरी के दौरान उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनके बेटे जय सिंह ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन सरकार ने 16 सितंबर 2015 को आवेदन खारिज कर दिया।
सरकार के इस फैसले को चुनौती देते हुए 27 अगस्त 2016 को हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की गई। हालांकि, सिंगल बेंच ने 12 फरवरी 2025 को याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने माना कि कर्मचारी की मौत को करीब 10 साल बीत चुके हैं और इतने लंबे समय बाद अनुकंपा नियुक्ति देने का आदेश इसके मूल उद्देश्य के खिलाफ होगा। इसके बाद मामला डिवीजन बेंच के सामने स्पेशल अपील के जरिए पहुंचा।
परिवार का दूसरा बेटा पहले से सरकारी नौकरी में था
हाईकोर्ट ने पाया कि परिवार की ओर से दूसरे बेटे की अनुकंपा नियुक्ति की मांग भी की गई थी। लेकिन मृत कर्मचारी का एक और बेटा उदय सिंह पहले से सरकारी नौकरी में था।
राजस्थान अनुकंपा नियुक्ति नियम, 1996 के नियम 5 के मुताबिक अगर मृत सरकारी कर्मचारी के पति या पत्नी अथवा कम से कम एक बेटा, अविवाहित बेटी या गोद लिया बेटा-बेटी पहले से नियमित सरकारी नौकरी में है, तो दूसरे आश्रित को इन नियमों के तहत नियुक्ति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा- दूसरे बेटे की नौकरी की मांग नियम के खिलाफ
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जिस बेटे को पहले से सरकारी नौकरी में बताया गया है, वह कर्मचारी की मौत के समय नियमों के तहत ‘डिपेंडेंट’ नहीं था, यानी आश्रित की श्रेणी में नहीं आता था।
इसलिए उसकी सरकारी नौकरी को आधार बनाकर दूसरे बेटे को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना सही नहीं है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने राजस्थान Compassionate Appointment of Dependents of Deceased Government Servants Rules, 1996 के Rule 5 का हवाला दिया।
कोर्ट ने कहा कि अगर मृत कर्मचारी की मौत के समय उसका पति या पत्नी या कम से कम एक बेटा, अविवाहित बेटी या नियमों में शामिल कोई अन्य परिवार सदस्य पहले से केंद्र या राज्य सरकार की नौकरी में है, तो दूसरे आश्रित को इन नियमों के तहत अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने ‘डिपेंडेंट’ की दलील नहीं मानी
हाईकोर्ट ने कहा कि दूसरे बेटे का आवेदन इस आधार पर खारिज नहीं हुआ था कि वह मृत कर्मचारी पर आश्रित नहीं था।
दरअसल, आवेदन खारिज करने की वजह यह थी कि परिवार का एक बेटा पहले से ही सरकारी नौकरी में था। ऐसे में Rule 5 की शर्त के तहत दूसरे बेटे को अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती थी।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि इस स्थिति में Rule 2(c) में दी गई ‘डिपेंडेंट यानी आश्रित’ की परिभाषा का हवाला देने से दूसरे बेटे को कोई लाभ नहीं मिल सकता।
हाईकोर्ट ने समझाया- अनुकंपा नियुक्ति का मकसद क्या है?
हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सिंगल बेंच के इस फैसले से सहमति जताई। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स ट्रावनकोर लिमिटेड बनाम अनुश्री के.बी. मामले के फैसले का भी हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मकसद सरकारी कर्मचारी की अचानक मौत से परिवार पर आए तत्काल आर्थिक संकट से उबरने में मदद करना है। इसका मकसद यह नहीं है कि कर्मचारी की मौत के कई साल बाद परिवार को सरकारी नौकरी दी जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में कर्मचारी की मौत को करीब 10 साल बीत चुके हैं। ऐसे में अब अनुकंपा नियुक्ति देने का आदेश इस व्यवस्था के मूल उद्देश्य के अनुरूप नहीं होगा।
याचिका दायर करने के बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ाया गया
हाईकोर्ट ने महिला की ओर से की गई देरी को भी गंभीरता से लिया। कोर्ट ने रिकॉर्ड में यह भी पाया कि 2016 में रिट याचिका दाखिल होने के बाद उसमें कुछ कमियां थीं।
इन कमियों को दूर करने के लिए कोर्ट ने कई मौके दिए, लेकिन उन्हें समय पर ठीक नहीं किया गया। इसी वजह से रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) ने 14 जुलाई 2017 को याचिका खारिज कर दी।
बाद में महिला के आवेदन पर याचिका बहाल हुई, लेकिन कमियां फिर भी दूर नहीं की गईं। इसके बाद 19 जुलाई 2024 को याचिका दोबारा खारिज हुई।
कोर्ट ने फिर सहानुभूतिपूर्वक याचिका बहाल कर दी, लेकिन इसके बाद भी कमियां दूर नहीं की गईं। हाईकोर्ट ने कहा कि इससे साफ है कि याचिका को आगे बढ़ाने में खुद अपीलकर्ता की लापरवाही रही।
हाईकोर्ट ने स्पेशल अपील खारिज की
डिवीजन बेंच ने सरकार के 16 सितंबर 2015 के फैसले में कोई गलती नहीं पाई। कोर्ट ने माना कि परिवार के एक सदस्य के पहले से सरकारी नौकरी में होने के कारण दूसरे बेटे को अनुकंपा नियुक्ति देने का आधार नहीं बनता।
इसी आधार पर जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की बेंच ने **स्पेशल अपील खारिज कर दी।