नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि अगर जांच एजेंसी तय समय के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं करती और बिना आरोपी को सुने समय बढ़ा दिया जाता है, तो यह पूरी प्रक्रिया गैरकानूनी मानी जाएगी।
कोर्ट ने कहा कि अगर जांच एजेंसी तय कानूनी समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाती और समय बढ़ाने की प्रक्रिया में आरोपी को सुनवाई का मौका नहीं दिया जाता, तो आरोपी को डिफॉल्ट बेल पाने का “अटूट अधिकार” मिल जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चार्जशीट दाखिल करने की समय सीमा बढ़ाना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा संवैधानिक मुद्दा है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए UAPA के तहत गिरफ्तार आरोपी को डिफॉल्ट बेल देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने जांच पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय देते समय न तो आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया और न ही न्यायिक तरीके से मामले पर विचार किया।
90 दिन की समय सीमा और विवाद की शुरुआत
मामला 7 नवंबर 2023 को दर्ज एक FIR से जुड़ा है, जिसमें आरोपी को अगले ही दिन यानी 8 नवंबर को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। मामला UAPA यानी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत दर्ज किया गया था, जहां जांच एजेंसियों को सामान्य मामलों की तुलना में ज्यादा समय मिलता है। कानून के मुताबिक, जांच एजेंसी को 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल करनी होती है।
कानून के मुताबिक जांच एजेंसी को तय अवधि के भीतर चार्जशीट दाखिल करनी होती है। यदि ऐसा नहीं होता तो आरोपी को CrPC की धारा 167(2) के तहत डिफॉल्ट बेल मांगने का अधिकार मिल जाता है। इस मामले में 90 दिन की वैधानिक अवधि पूरी होने से ठीक पहले जांच एजेंसी ने 2 फरवरी 2024 को विशेष अदालत में आवेदन दाखिल कर 25 दिन का अतिरिक्त समय मांगा।
यह आवेदन UAPA की धारा 43-D(2) के तहत किया गया था, जिसमें विशेष परिस्थितियों में जांच के लिए अतिरिक्त समय देने का प्रावधान है।
लेकिन यहीं से विवाद शुरू हुआ। क्योंकि जिस दिन यह आवेदन अदालत में सुना गया, उस समय आरोपी को न तो कोर्ट में पेश किया गया और न ही वर्चुअल माध्यम से उसकी उपस्थिति कराई गई। आरोपी को यह तक नहीं बताया गया कि जांच एजेंसी उसके खिलाफ समय बढ़ाने की मांग कर रही है।
ट्रायल कोर्ट ने ‘मैकेनिकल’ तरीके से बढ़ाया समय
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्पेशल जज ने बेहद “मैकेनिकल” तरीके से केवल सरकारी वकील की मांग रिकॉर्ड कर जांच पूरी करने की अवधि 25 दिन बढ़ा दी। अदालत ने कहा कि आदेश में यह तक नहीं बताया गया कि जांच में ऐसी कौन सी परिस्थितियां थीं जिनके कारण अतिरिक्त समय देना जरूरी था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले ऐसे आदेश केवल औपचारिकता के तौर पर पारित नहीं किए जा सकते।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समय बढ़ाने से पहले जज को स्वतंत्र रूप से रिकॉर्ड देखना चाहिए और यह संतुष्ट होना चाहिए कि अतिरिक्त समय देने के लिए पर्याप्त और न्यायसंगत कारण मौजूद हैं।
आरोपी को नहीं मिला सुनवाई का मौका: SC
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी को सुनवाई का अवसर देना केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का हिस्सा है। अदालत ने माना कि यदि किसी व्यक्ति की हिरासत की अवधि बढ़ाई जा रही है, तो उसे यह अधिकार है कि वह अदालत के सामने अपना पक्ष रख सके।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आरोपी को न तो एक्सटेंशन आवेदन की जानकारी दी गई और न ही वह उसका विरोध कर सका। यही वजह है कि समय बढ़ाने का आदेश कानून की नजर में टिक नहीं सकता।
अदालत ने अपने फैसले में कहा:
स्पेशल जज ने आरोपी को समय बढ़ाने की मांग का विरोध करने का कोई अवसर नहीं दिया और न ही न्यायिक दिमाग लगाया। बेहद यांत्रिक तरीके से केवल सरकारी वकील की मांग रिकॉर्ड कर 25 दिन का विस्तार दे दिया गया। इसलिए जांच पूरी करने के लिए समय बढ़ाने का आदेश पूरी तरह अवैध, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।”
अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को केंद्र में रखा। अदालत ने कहा कि चार्जशीट दाखिल करने की समय सीमा बढ़ाना सीधे तौर पर व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। इसलिए अदालतों को ऐसे मामलों में बेहद सावधानी और संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि यदि जांच एजेंसी तय समय सीमा में जांच पूरी नहीं कर पाती, तो आरोपी को डिफॉल्ट बेल पाने का “indefeasible right” यानी ऐसा अधिकार मिल जाता है जिसे छीना नहीं जा सकता।
बेंच ने कहा कि समय बढ़ाने का हर आदेश “due application of mind” यानी उचित न्यायिक विचार और स्पष्ट कारणों के साथ ही पारित होना चाहिए। केवल यह कह देना कि जांच लंबित है, पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका
इससे पहले Jharkhand High Court ने आरोपी की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि क्योंकि चार्जशीट “विस्तारित अवधि” के भीतर दाखिल हो गई थी, इसलिए आरोपी का डिफॉल्ट बेल का अधिकार समाप्त हो गया।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब शुरुआती एक्सटेंशन आदेश ही अवैध था, तब उसके आधार पर आगे की पूरी प्रक्रिया भी प्रभावित हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दी डिफॉल्ट बेल?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2 फरवरी 2024 का एक्सटेंशन आदेश गैरकानूनी था। ऐसे में जांच एजेंसी के पास वैध रूप से केवल 90 दिन की मूल अवधि ही बचती थी। चूंकि उस अवधि के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं हुई, इसलिए आरोपी का डिफॉल्ट बेल का अधिकार स्वतः उत्पन्न हो गया।
अदालत ने कहा कि आरोपी ने 8 फरवरी 2024 को धारा 167(2) CrPC के तहत डिफॉल्ट बेल की अर्जी दाखिल कर दी थी। उस समय तक वैधानिक अवधि समाप्त हो चुकी थी और चार्जशीट दाखिल नहीं हुई थी। इसलिए आरोपी को बेल मिलना कानूनी रूप से अनिवार्य था।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“चूंकि जांच पूरी करने की समय सीमा बढ़ाने का आदेश अवैध घोषित किया जा चुका है और चार्जशीट 90 दिन की वैधानिक अवधि समाप्त होने के काफी बाद दाखिल हुई, इसलिए आरोपी का डिफॉल्ट बेल का अधिकार पक्का हो चुका था।”
UAPA मामलों पर फैसले का बड़ा असर
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला UAPA और अन्य गंभीर आपराधिक मामलों में जांच एजेंसियों तथा निचली अदालतों के लिए बड़ा संदेश है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा या गंभीर अपराधों के मामलों में भी आरोपी के संवैधानिक अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह फैसला बताता है कि अदालतें केवल जांच एजेंसी के अनुरोध पर आंख बंद कर समय विस्तार नहीं दे सकतीं। हर मामले में आरोपी को सुनवाई का मौका देना और विस्तार के कारणों की न्यायिक जांच करना अनिवार्य होगा।
फैसले का असर आने वाले समय में उन मामलों पर भी पड़ सकता है जहां जांच एजेंसियों ने बिना पर्याप्त कारण बताए या बिना आरोपी को सुने समय विस्तार लिया है।
अदालत ने बेल पर रिहा करने का दिया आदेश
अंत में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए झारखंड हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और आरोपी को डिफॉल्ट बेल पर रिहा करने का आदेश दिया।
यह फैसला आपराधिक न्याय व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रक्रियागत न्याय की अहमियत को फिर से रेखांकित करता है।
कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि किसी भी आरोपी की आजादी को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया कानून के तय मानकों और संवैधानिक सुरक्षा के भीतर ही पूरी की जानी चाहिए।
शीर्ष अदालत का यह फैसला भविष्य के लिए बेहद अहम है। अब जांच एजेंसियों को समय बढ़ाने के लिए अदालत में जाते वक्त पूरी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
अदालतों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि आरोपी को जानकारी दी जाए, उसे अपनी बात रखने का मौका मिले और आदेश में ठोस कारण दर्ज हों। सिर्फ औपचारिकता निभाकर समय बढ़ाने का दौर अब खत्म हो चुका है।