जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चे के पासपोर्ट को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि तलाक के बाद पिता की सहमति नहीं होने के कारण बच्चे के विदेश जाने और पढ़ाई के अवसर को नहीं रोका जा सकता।
7 साल की बच्ची के पासपोर्ट से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट ने पासपोर्ट अथॉरिटी को बच्ची का पासपोर्ट बिना किसी देरी के तुरंत जारी करने का निर्देश दिया।
जस्टिस नूपुर भाटी ने कहा कि तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी मां के पास होने और पिता के पास सिर्फ मिलने का अधिकार होने की स्थिति में, केवल पिता की सहमति नहीं मिलने के आधार पर बच्चे का पासपोर्ट नहीं रोका जा सकता।
इस मामले में मां की ओर से एडवोकेट माधव व्यास और केंद्र सरकार की ओर से एडवोकेट पिंटू पारीक ने पैरवी की।
सरनेम बदलने और सौतेले पिता का नाम शामिल करने की मांग थी
मामला भीलवाड़ा निवासी पारुल नाहर और उनकी 7 साल की बेटी वनिशा नैनावती से जुड़ा है। पारुल ने 9 फरवरी 2010 को दिग्विजय धारिवाल से शादी की थी।
बाद में दोनों के बीच तलाक हो गया और दुबई की कोर्ट ने 13 जनवरी 2022 को आपसी सहमति से विवाह खत्म किया। कोर्ट ने बच्ची की कानूनी कस्टडी मां को दी थी, जबकि जैविक पिता को केवल बच्ची से मिलने का अधिकार दिया गया था।
इसके बाद मां पारुल ने दोबारा शादी की। बच्ची को उसके सौतेले पिता ने रजिस्टर्ड अडॉप्शन डीड के जरिए गोद ले लिया। इसके बाद मां ने 4 मार्च 2024 को बच्ची का पासपोर्ट दोबारा जारी कराने के लिए आवेदन किया। इसमें बच्ची का सरनेम बदलने और सौतेले पिता का नाम शामिल करने की मांग की गई थी।
पिता की सहमति नहीं होने पर पासपोर्ट अथॉरिटी ने रोक दिया आवेदन
पासपोर्ट अथॉरिटी ने 4 मई 2024 को बच्ची का आवेदन आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया। उसका आवेदन यह कहते हुए रोक दिया कि जैविक पिता की सहमति नहीं मिली है और उन्हें अभी भी बच्ची से मिलने का अधिकार है।
इसके बाद मां और बच्ची ने इस फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट से पासपोर्ट अथॉरिटी के फैसले को रद्द करने और बच्ची का पासपोर्ट जारी करने का निर्देश देने की मांग की।
‘दोनों माता-पिता की सहमति पर जोर नहीं दे सकती अथॉरिटी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इसी तरह के एक पुराने मामले रिद्धम देवड़ा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसले का भी हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर बच्चे को विदेश जाकर पढ़ाई करनी है, तो सिर्फ पिता की सहमति नहीं मिलने के कारण उसका पासपोर्ट नहीं रोका जा सकता। विदेश जाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति की आजादी का हिस्सा है।
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि नाबालिग बच्चे का पासपोर्ट जारी करने के लिए पासपोर्ट अथॉरिटी दोनों माता-पिता की सहमति पर जोर नहीं दे सकती। अगर किसी एक अभिभावक की सहमति नहीं मिल रही है, तो पासपोर्ट रूल्स, 1980 में दिए गए Annexure-C के तहत दूसरा अभिभावक घोषणा देकर बच्चे का पासपोर्ट बनवा सकता है।
‘बच्चे का भविष्य किसी एक अभिभावक की इच्छा पर निर्भर नहीं’
हाईकोर्ट ने कहा कि आज के समय में विदेश यात्रा केवल कोई शौक या विलासिता नहीं रह गई है। किसी बच्चे के लिए पढ़ाई, करियर या दूसरे जरूरी अवसरों के लिए विदेश जाना उसके भविष्य से जुड़ा हो सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि पासपोर्ट अथॉरिटी को ऐसे मामलों में केवल तकनीकी आधार पर फैसला नहीं करना चाहिए। किसी बच्चे के भविष्य और करियर को उसके माता-पिता में से किसी एक की इच्छा पर निर्भर नहीं छोड़ा जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे का वर्तमान ठीक रहेगा, तभी उसका भविष्य बेहतर हो सकेगा। इसलिए केवल पिता की सहमति नहीं होने के कारण बच्ची के संवैधानिक अधिकार को रोका नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने पासपोर्ट जारी करने का दिया निर्देश
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका मंजूर कर ली। जस्टिस नूपुर भाटी ने पासपोर्ट अथॉरिटी को निर्देश दिया कि **बच्ची का पासपोर्ट बिना किसी और देरी के जारी किया जाए।
हाईकोर्ट ने इस मामले में यह भी स्पष्ट किया कि तलाक के बाद जब बच्चे की कानूनी कस्टडी मां के पास हो और पिता को सिर्फ मिलने का अधिकार मिला हो, तो केवल पिता की सहमति नहीं होने के आधार पर बच्चे के पासपोर्ट को रोकना उचित नहीं है।