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जोधपुर राजपरिवार की संपत्ति विवाद में संशोधन पर हाईकोर्ट की मुहर, महाराज दलिप सिंह की याचिका खारिज; ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार

Jodhpur Royal Family Property Dispute: Rajasthan HC Upholds Trial Court Order Allowing Amendment

जोधपुर। जोधपुर राजपरिवार की संपत्तियों से जुड़े करीब 13 साल पुराने विवाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला दिया है।

हाईकोर्ट ने दलिप सिंह की याचिका खारिज करते हुए वाद में संशोधन की अनुमति देने वाले ट्रायल कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें संपत्ति बंटवारे के मुकदमे में वादी को अपना पक्ष संशोधित करने की अनुमति दी गई थी।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि केवल संपत्ति के स्वामित्व और उसके स्रोत को लेकर दलील बदलने से मुकदमे की मूल प्रकृति नहीं बदल जाती, जब बंटवारे की मांग और विवादित संपत्तियां वही रहें।

हाईकोर्ट ने कहा कि संशोधन से इस मुकदमे की मूल प्रकृति नहीं बदली है। संपत्तियां वही हैं, पक्षकार वही हैं और मुख्य मांग अब भी बंटवारे की ही है।

इसी के साथ जस्टिस फरजंद अली ने दलिप सिंह की ओर से दाखिल रिट पिटीशन खारिज कर दी। साथ ही 28 सितंबर 2013 को अतिरिक्त जिला जज नंबर-5, जोधपुर मेट्रोपोलिटन की ओर से दिए गए आदेश को बरकरार रखा।

इस आदेश में हाईकोर्ट ने यह तय नहीं किया है कि महाराज देवी सिंह की संपत्ति वास्तव में किसकी है।

हाईकोर्ट ने सिर्फ यह तय किया कि वादी को संपत्ति की प्रकृति और उसके मालिकाना हक से जुड़ी अपनी दलील में संशोधन करने की अनुमति दी जा सकती है। फैसला ट्रायल कोर्ट में आगे होगा।

विवाद की शुरुआत संपत्तियों के बंटवारे से हुई

मामला स्वर्गीय देवी सिंह की संपत्तियों के बंटवारे और उनके वारिसों के अधिकार से जुड़ा है। विवाद में जोधपुर की रेजीडेंसी रोड स्थित सरदार गेस्ट हाउस और पाली जिले के डूडी गांव की कृषि भूमि समेत अन्य संपत्तियां शामिल हैं।

देवी सिंह का 1998 में निधन हो गया था। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी रानी धरमराजे लक्ष्मी इन संपत्तियों पर काबिज रहीं। लेकिन 5 जनवरी 2013 को उनका भी निधन हो गया।

इसके बाद देवी सिंह के परिवार और उनके रिश्तेदारों के बीच इन संपत्तियों में हिस्सेदारी और बंटवारे को लेकर मुकदमा शुरू हुआ।

देवी सिंह के भतीजे राजेंद्र सिंह ने 2013 में इन संपत्तियों में अपना हिस्सा मांगते हुए सिविल सूट दाखिल किया था।

शुरुआत में उसका दावा था कि ये संपत्तियां देवी सिंह की थीं और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत उन्हें इनमें हिस्सा मिलना चाहिए।

बाद में बदला संपत्ति के मालिकाना हक का आधार

मुकदमा शुरू होने के बाद राजेंद्र सिंह ने CPC के Order 6 Rule 17 के तहत मुकदमे की मूल अर्जी (Plaint) में बदलाव की मांग की। उन्होंने संपत्तियों के मालिकाना हक और उनकी कानूनी स्थिति को लेकर नया पक्ष रखा।

राजेंद्र सिंह का कहना था कि सरदार गेस्ट हाउस समेत दूसरी संपत्तियां स्वर्गीय उम्मेद सिंह की संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति थीं।

उनके मुताबिक, देवी सिंह के नाम जारी पट्टा इन संपत्तियों का मालिकाना हक देने के लिए नहीं, बल्कि वहां रहने और इस्तेमाल करने के लिए था।

उनका यह भी दावा था कि देवी सिंह और उनकी पत्नी के निधन के बाद ये संपत्तियां परिवार के जीवित बेटों और वंशजों के बीच सह-स्वामित्व के रूप में चली गईं।

महाराज दलिप सिंह ने संशोधन का विरोध क्यों किया?

वहीं देवी सिंह के भाई दलिप सिंह ने राजेंद्र सिंह की ओर से दायर बंटवारे के मुकदमे में किए गए संशोधन का विरोध किया था।

उनका कहना था कि संशोधन के जरिए राजेंद्र सिंह अपने पुराने दावे से हटकर नया और अलग मामला ला रहे हैं।

साथ ही, उन्होंने पहले हुए पारिवारिक संपत्ति विवादों का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि जिन मुद्दों पर पहले ही मुकदमे हो चुके हैं, उन्हें नए तरीके से दोबारा नहीं उठाया जा सकता।

इसी आधार पर उन्होंने रेस जुडिकाटा और कंस्ट्रक्टिव रेस जुडिकाटा जैसे कानूनी सिद्धांतों का हवाला देकर संशोधन का विरोध किया।

इसके बावजूद अतिरिक्त जिला जज नंबर-5, जोधपुर मेट्रोपोलिटन ने संशोधन की अनुमति दे दी। इस आदेश को महाराज दलिप सिंह ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने कहा- बंटवारे की मांग वही है

हाईकोर्ट ने कहा कि वाद में बदलाव की अनुमति देते समय यह देखना जरूरी है कि इससे मुकदमे का मूल मुद्दा बदल तो नहीं रहा।

हाईकोर्ट ने पाया कि यहां बंटवारे की मूल मांग नहीं बदली। संपत्तियां भी वही हैं और पक्षकार भी मूल रूप से वही हैं। सिर्फ संपत्तियों की प्रकृति और उनमें अपने अधिकार के आधार को लेकर राजेंद्र सिंह ने अपना पक्ष विस्तार से रखा है।

हाईकोर्ट ने कहा कि संपत्ति के मालिकाना हक या किसी दस्तावेज की कानूनी स्थिति को लेकर पक्ष बदलने से ही मुकदमे की मूल प्रकृति नहीं बदल जाती।

‘संशोधन मंजूर होने का मतलब दावा सही मान लेना नहीं’

हाईकोर्ट ने एक अहम बात साफ की कि वाद में संशोधन की अनुमति मिलने का मतलब यह नहीं है कि संशोधित दावा सही मान लिया गया है।

सरदार गेस्ट हाउस और दूसरी संपत्तियां वास्तव में जॉइंट हिंदू फैमिली की थीं या नहीं, महाराज देवी सिंह के नाम पट्टे का कानूनी असर क्या था और राजेंद्र सिंह का उनमें कोई अधिकार बनता है या नहीं-इन सवालों का फैसला ट्रायल के दौरान होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि संशोधन के स्तर पर इन मुद्दों पर मिनी ट्रायल नहीं किया जा सकता।

पुराने मुकदमों का असर ट्रायल में तय होगा

दलिप सिंह ने पहले हुई पारिवारिक संपत्ति की मुकदमेबाजी का भी हवाला दिया था। उनका कहना था कि पुराने मामलों के कारण नया दावा रेस जुडिकाटा और कंस्ट्रक्टिव रेस जुडिकाटा के सिद्धांत से प्रभावित हो सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस सवाल का फैसला सिर्फ पुराने मुकदमे का जिक्र करने से नहीं किया जा सकता। पुराने मामलों की पूरी प्लीडिंग, आदेश, पक्षकारों की स्थिति और किन मुद्दों पर अंतिम फैसला हुआ था, यह देखना जरूरी होगा।

इसलिए ये आपत्तियां ट्रायल के दौरान तय की जा सकती हैं।

दलिप सिंह को बचाव का पूरा मौका मिलेगा

हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि जब संशोधन की अनुमति दी गई थी, उस समय प्रतिवादियों ने अपना लिखित बयान तक दाखिल नहीं किया था और ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ था। इसलिए उनके पास संशोधित वाद का जवाब देने और अपना पक्ष रखने का पूरा मौका है।

हाईकोर्ट ने दलिप सिंह समेत संबंधित पक्षों को संशोधित वाद के जवाब में लिखित बयान या संशोधित लिखित बयान दाखिल करने की छूट दी है।

वे संपत्ति के मालिकाना हक, पट्टे, पुराने मुकदमों, रेस जुडिकाटा, परिसीमा, जरूरी पक्षकारों और आंशिक बंटवारे समेत सभी कानूनी आपत्तियां उठा सकते हैं।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

जस्टिस फरजंद अली ने ट्रायल कोर्ट के 28 सितंबर 2013 के आदेश को सही माना और दलिप सिंह की याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि संशोधन से संपत्ति विवाद को एक ही मुकदमे में पूरी तरह तय करने में मदद मिलेगी।

साथ ही, प्रतिवादियों को संशोधित वाद पर अपना लिखित जवाब दाखिल करने की छूट दी गई। ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की सुनवाई तेजी से आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया।

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