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राजस्थान हाईकोर्ट ने क्यों कहा- अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति, हमारी न्यायिक व्यवस्था शीघ्र न्याय प्रदान करने में विफल

Rajasthan High Court Slams Judicial Delay, Orders Retirement Benefits for Woman Lecturer After 25 Years

“Justice After 25 Years”: महिला व्याख्याता को कोर्ट आदेश के भी 25 साल बाद भी नहीं मिला न्याय, अब राजस्थान हाईकोर्ट ने दिए सख्त आदेश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट में एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां एक महिला व्याख्याता के पक्ष में वर्ष 2000 में कोर्ट का आदेश होने के 25 साल बाद भी न्याय नहीं मिल पाया।

मामला कोर्ट के 2000 में दिए गए फैसले से भी 5 साल पहले से शुरू हुआ था, जब वर्ष 1995 में महिला व्याख्याता को बिना कारण बताए, बिना किसी लिखित आदेश के नौकरी से हटा दिया गया था।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने अब इस मामले में महिला व्याख्याता शकुंतला पाटनी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए शिक्षा संस्थान को 30 जून 2026 तक सभी सेवानिवृत्ति लाभों की गणना कर भुगतान करने का आदेश दिया है।

इसके साथ ही सिविल कोर्ट द्वारा तय की गई बकाया व अन्य राशि के पेटे ₹15,57,937/- की राशि मय ब्याज एक माह में देने के आदेश दिए हैं।

यह पूरा मामला सेवानिवृत्त महिला व्याख्याता को बकाया भुगतान व पेंशन लाभ नहीं देने से जुड़ा है।

पूरा जीवन संघर्ष में बदल गया

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता महिला की 80 वर्ष की आयु और 25 वर्षों की लंबी प्रतीक्षा को देखते हुए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए फैसला दिया है।

हाईकोर्ट ने शकुंतला पाटनी के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि एक व्याख्याता जो 1972 से कॉलेज में लगातार कार्य कर रही थी, उन्हें वर्ष 1995 में बिना किसी कारण और बिना कोई कागजी कार्यवाही के कार्य करने से रोक दिया गया।

इसके बाद भी कि वर्ष 2000 में अदालत का फैसला उनके पक्ष में हुआ, फिर भी उन्हें न्याय पाने में 2025 तक 25 साल का समय लगा, जिससे उनका पूरा जीवन संघर्ष में बदल गया।

हम विफल रहे, गंभीर और असहनीय देरी

एकलपीठ ने अपने फैसले में बेहद गंभीर टिप्पणियां करते हुए कहा कि एक बुजुर्ग महिला इस आशा में दर-दर भटकती रही कि उसके सफल मुकदमे, जिसमें उसके पक्ष में फैसला हो चुका है, उसका फल मिलेगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि वह पिछले तीन दशकों से अदालतों के गलियारों में भटक रही है।

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि वर्ष 2000 में मामला उसके पक्ष में तय हो जाने के बावजूद भी एक महिला को सफल न्यायिक निर्णय का लाभ नहीं मिल सका।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि

इस अदालत को यह स्वीकार करना होगा कि हमारी न्यायिक व्यवस्था मुकदमेबाज को शीघ्र न्याय प्रदान करने में विफल रही, जबकि शीघ्र न्याय संविधान द्वारा नागरिक को प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है।

दीर्घकालिक प्रशासनिक विफलता

जस्टिस अनिल उपमन ने कहा कि यह अक्सर कहा जाता है कि “न्याय में देरी, न्याय से वंचना के समान है।”

वर्तमान मामले में यह देरी इतनी गंभीर और असहनीय रही है कि इसे दीर्घकालिक प्रशासनिक विफलता कहा जा सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह स्थिति इस बात की कठोर याद दिलाती है कि यदि किसी पक्ष में आए फैसले का पालन करने की प्रक्रिया को अत्यधिक लंबा और निष्क्रिय बना दिया जाए, तो ऐसा फैसला याचिकाकर्ता के लिए निरर्थक और अर्थहीन होकर रह जाता है।

30 वर्ष बाद मिला न्याय

वर्ष 1995 से न्याय की गुहार लगा रही व्याख्याता शकुंतला पाटनी को अब जाकर राजस्थान हाईकोर्ट से न्याय मिला है।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने महिला व्याख्याता शकुंतला पाटनी के पक्ष में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए अपना फैसला सुनाते हुए शिक्षा संस्थान को 30 जून 2026 तक सभी सेवानिवृत्ति लाभों की गणना कर भुगतान करने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने साथ ही याचिकाकर्ता को दी जाने वाली राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी आदेश दिया है।

एक माह में करें भुगतान…

हाईकोर्ट ने राजस्थान विश्वविद्यालय से संबद्ध इंदिरा गांधी बालिका निकेतन कॉलेज, चिड़ावा और राज्य सरकार को आदेश दिया है कि अगले एक माह में याचिकाकर्ता महिला को सिविल कोर्ट द्वारा तय की गई ₹15,57,937/- की राशि मय 9 प्रतिशत ब्याज के देनी होगी।

सिविल कोर्ट ने 2015 में कुल ₹35,91,820/- तय की थी, जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा दूसरी जगह रोजगार से प्राप्त की गई ₹20,33,883/- की राशि घटाते हुए ₹15,57,937/- की राशि मय ब्याज देने के आदेश दिए।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि एक माह के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो 12 प्रतिशत दंडात्मक ब्याज लागू होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय तक महिला को उसके अधिकार से वंचित रखना अन्यायपूर्ण है और ब्याज देना न्यायसंगत है।

कॉलेज को लगाई फटकार

हाईकोर्ट द्वारा महिला याचिकाकर्ता के पक्ष में दिए फैसले की पालना में शिक्षा संस्थान की ओर से कहा गया कि चूंकि वह अनुदानित संस्था है, इसलिए 90 प्रतिशत राशि राज्य सरकार को और केवल 10 प्रतिशत संस्था को देनी चाहिए।

हाईकोर्ट ने इस पर शिक्षा संस्थान को फटकार लगाते हुए दो टूक कहा कि-

“संस्थान और राज्य सरकार के बीच अनुदान का विवाद कर्मचारी पर लागू नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी को पूरा भुगतान करना संस्थान की जिम्मेदारी है, बाद में वह राज्य सरकार से प्रतिपूर्ति ले सकता है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को भी आदेश दिया है कि आवश्यकतानुसार संस्थान को अनुदान उपलब्ध कराए।

ये है मामला

याचिकाकर्ता शकुंतला पाटनी झुंझुनूं के चिड़ावा स्थित Indira Gandhi Balika Niketan College, Ardawata में वर्ष 1972 में अर्थशास्त्र की व्याख्याता के रूप में नियुक्त हुई थीं।

याचिकाकर्ता ने लगभग 23 वर्षों तक निरंतर इस कॉलेज में अपनी सेवा दी।

वर्ष 1995 में बिना किसी लिखित आदेश और बिना कारण बताए उन्हें कॉलेज प्रशासन द्वारा कार्य करने से रोक दिया गया, जिससे उनका पूरा जीवन संघर्ष में बदल गया।

सेवा से अचानक हटाए जाने के बाद उन्होंने न्याय की उम्मीद में राजस्थान गैर-सरकारी शिक्षण संस्थान अधिकरण का दरवाजा खटखटाया।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद वर्ष 2000 में अधिकरण ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें पुनः सेवा में लेने, वेतन, अवकाश, चयन वेतनमान और भविष्य निधि सहित अन्य लाभ देने के आदेश दिए।

आदेश के बावजूद नहीं मिला लाभ

अधिकरण का फैसला याचिकाकर्ता के पक्ष में आने के बावजूद कॉलेज ने आदेश का पालन नहीं किया।

अधिकरण के फैसले के खिलाफ कॉलेज ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने संस्थान द्वारा दायर रिट याचिका को वर्ष 2008 में खारिज कर दिया और अधिकरण के आदेश को बरकरार रखा।

हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद भी याचिकाकर्ता महिला को बकाया भुगतान नहीं मिला, जिसके चलते उन्हें पुनः कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

तारीख दर तारीख

याचिकाकर्ता शकुंतला पाटनी वर्ष 1972 में प्रतिवादी संस्था इंदिरा गांधी बालिका निकेतन कॉलेज, अरड़ावता, चिड़ावा, जिला झुंझुनूं में अर्थशास्त्र विषय की व्याख्याता के रूप में नियुक्त की गई थीं।

1995 से 2001 तक

23 साल बाद 25 सितंबर 1995 को याचिकाकर्ता को बिना किसी लिखित आदेश के हटा दिया गया।

इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने राजस्थान गैर-सरकारी शिक्षण संस्थान अधिकरण, जयपुर में आवेदन दिया।

अधिकरण ने लंबी सुनवाई के बाद 12 जून 2000 को याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला दिया।

अधिकरण ने स्पष्ट रूप से माना कि याचिकाकर्ता को अवैध रूप से हटाया गया है, इसलिए याचिकाकर्ता को पुनः कार्यग्रहण की अनुमति देने और नियमानुसार वेतन एवं अवकाश लाभ देने के आदेश दिए।

अधिकरण के फैसले के विरुद्ध इंदिरा गांधी बालिका निकेतन कॉलेज ने वर्ष 2001 में यह कहते हुए याचिका 5661/2001 दायर की कि याचिकाकर्ता ने स्वेच्छा से सेवा छोड़ दी थी।

2001 से 2011 तक

हाईकोर्ट ने इस पर कोई स्टे नहीं दिया, इसके बावजूद संस्था ने अधिकरण के आदेश का पालन नहीं किया।

अधिकरण के 2000 के आदेश को लागू कराने के लिए याचिकाकर्ता ने वर्ष 2000 में ही निष्पादन याचिका सिविल कोर्ट, चिड़ावा में पेश की।

चिड़ावा कोर्ट ने 16 जनवरी 2004 को प्रतिवादी संस्था के विरुद्ध ₹25,87,909/- की वसूली हेतु रिकवरी वारंट जारी किया, जो 28 फरवरी 2004 को जारी हुआ।

इस बीच, कॉलेज की 5661/2001 याचिका को राजस्थान हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर 2008 को खारिज कर दिया और अधिकरण के आदेश दिनांक 12 जून 2000 को पूर्णतः सही ठहराया।

इसके बाद सिविल कोर्ट, चिड़ावा ने 21 जनवरी 2011 को एक नया आदेश पारित करते हुए केवल ₹2,15,127/- की वसूली का आदेश दिया।

2011 से 2015

याचिकाकर्ता का दावा था कि उन्हें ₹49,62,650/- का भुगतान किया जाना चाहिए। इस आदेश से असंतुष्ट होकर दोनों पक्षों ने पुनः हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

इस याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल 2015 को आदेश देते हुए चिड़ावा सिविल कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया। साथ ही मामला पुनः चिड़ावा कोर्ट को भेजते हुए आदेश दिया कि पूर्व आदेशों एवं रिकॉर्ड के अनुसार सभी पहलुओं पर पुनर्विचार कर तीन माह के भीतर अंतिम निर्णय किया जाए।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि याचिकाकर्ता 31 अगस्त 2006 को सेवानिवृत्त हो चुकी हैं और लगभग 20 वर्षों से उन्हें कोई लाभ नहीं मिला है, जिसे भी ध्यान में रखा जाए।

हाईकोर्ट के इस आदेश की पालना में चिड़ावा सिविल कोर्ट ने चार बिंदु तय करते हुए 12 अक्टूबर और 1 दिसंबर 2015 को आदेश पारित करते हुए प्रतिवादी संस्था के विरुद्ध ₹35,91,820/- की वसूली का वारंट जारी किया।

इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता का दावा था कि वास्तविक देय राशि ₹65,24,356/- है, जबकि संस्था ने देयता से ही इंकार किया।

2016 से 2025 तक

इस आदेश के खिलाफ दोनों ही पक्षों ने वर्ष 2016 में याचिका दायर कर हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद दोनों पक्षों की याचिकाओं पर 19 नवंबर 2025 को अपना फैसला सुरक्षित रखा, जिसे 3 दिसंबर को खुली अदालत में सुनाया गया।

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