कॉमनवेल्थ पीस कॉन्फ्रेंस के तीसरे दिन आयोजित सत्र को किया संबोधित, कहा सच्चा न्याय समाज के जमीनी स्तर से शुरू होता है.
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अनुप कुमार ढंड ने कहा कि रामायण और महाभारत केवल आस्था के ग्रंथ नहीं, बल्कि संवाद, मध्यस्थता और विवाद समाधान के सर्वोत्तम उदाहरण हैं।
उन्होने कहा कि इन दोनों महाकाव्यों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि हर संघर्ष से पहले संवाद, समझौते और शांति का हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। जब संवाद विफल होता है, तभी विनाश का रास्ता खुलता है।
जयपुर में आयोजित कॉमनवेल्थ पीस, मेडिएशन एंड रूल ऑफ लॉ कॉन्फ्रेंस के तीसरे और अंतिम दिन में आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि भारत की सभ्यता ने सदैव संघर्ष से पहले संवाद और युद्ध से पहले शांति को प्राथमिकता दी है।
न्याय अदालतों की चारदीवारी तक सीमित नहीं
जस्टिस ढंड ने कहा कि न्याय की परिकल्पना केवल अदालतों, न्यायाधीशों और कानूनी प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
उन्होने कहा कि वास्तविक न्याय वह है, जहां आम नागरिक बिना भय, बिना अत्यधिक खर्च और बिना वर्षों तक मुकदमेबाजी किए अपनी समस्या का समाधान प्राप्त कर सके।
उन्होंने कहा, “सच्चा न्याय ऊपर से नहीं उतरता, बल्कि समाज के जमीनी स्तर से जन्म लेता है। यदि न्याय को हर व्यक्ति तक पहुंचाना है, तो उसे गांव, समुदाय और स्थानीय संस्थाओं तक ले जाना होगा।”
लोग उसी व्यवस्था पर भरोसा करते हैं, जो सुलभ और विश्वसनीय हो
अपने संबोधन में जस्टिस ढंड ने कहा कि दुनिया के कई देशों में आज भी बड़ी संख्या में विवाद समुदाय आधारित व्यवस्थाओं के माध्यम से सुलझाए जाते हैं।
उन्होंने यमन, फिलीपींस और बांग्लादेश का उदाहरण देते हुए कहा कि लोग उसी न्याय व्यवस्था पर भरोसा करते हैं, जो उनके लिए सुलभ, किफायती और भरोसेमंद हो।
उन्होंने कहा कि मजबूत न्याय व्यवस्था की शुरुआत अदालतों से नहीं, बल्कि समाज में संवाद, विश्वास और सहभागिता की संस्कृति से होती है।
न्याय की शुरुआत अदालत से नहीं, समाज से
जस्टिस अनुप कुमार ढंड ने कहा कि आमतौर पर न्याय की कल्पना अदालतों और न्यायाधीशों से की जाती है, लेकिन करोड़ों लोगों के लिए न्याय की शुरुआत उनके अपने गांव और समुदाय से होती है।
उन्होने कहा कि न्याय केवल न्यायिक अधिकार का विषय नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था है जो लोगों तक सुलभ, सस्ती और विश्वसनीय हो।**
जस्टिस ढंड ने कहा कि समुदाय आधारित विवाद समाधान की तीन आधारशिलाएं हैं—संवाद, विश्वास और स्थानीय मध्यस्थता।
उन्होंने कहा कि संवाद केवल बातचीत नहीं, बल्कि लोगों के बीच विश्वास, सहानुभूति और समाधान का पुल है।
विश्वास तब पैदा होता है जब लोगों को लगता है कि उनकी बात सुनी जा रही है और उसका सार्थक परिणाम निकल रहा है।
वहीं मध्यस्थता का उद्देश्य किसी को हराना नहीं, बल्कि टूटे हुए रिश्तों को फिर से जोड़ना है।
पंचायती राज व्यवस्था की सराहना
उन्होंने कहा कि भारत में पंचायती राज व्यवस्था ने गांवों में कानूनी जागरूकता, मध्यस्थता और स्थानीय विवाद समाधान को नई मजबूती दी है। इससे आम नागरिक अपने अधिकारों को समझते हैं और सम्मान के साथ विवादों का समाधान कर पाते हैं।
जस्टिस अनुप कुमार ढंड ने रामायण का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान श्रीराम ने रावण के खिलाफ युद्ध से पहले अंगद को शांति दूत बनाकर लंका भेजा था।
अंगद ने रावण से माता सीता को लौटाने और युद्ध टालने का आग्रह किया, लेकिन रावण के अहंकार ने संवाद को अस्वीकार कर दिया और अंततः लंका का विनाश हुआ।
इसी प्रकार महाभारत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं शांति दूत बनकर हस्तिनापुर पहुंचे और दुर्योधन से केवल पांच गांव देकर युद्ध टालने की अपील की।
लेकिन दुर्योधन ने अहंकारवश प्रस्ताव ठुकरा दिया और महाभारत जैसा विनाशकारी युद्ध हुआ।
उन्होंने कहा कि दोनों महाकाव्य हमें यही सिखाते हैं कि संवाद हमेशा संघर्ष से पहले होना चाहिए।
मध्यस्थता विफल हुई तो विनाश निश्चित
जस्टिस ढंड ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध कृति रश्मिरथी का उल्लेख करते हुए कहा कि युद्ध से पहले शांति अपना अंतिम प्रयास अवश्य करती है।
श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर जाना इसी अंतिम प्रयास का प्रतीक था। उन्होंने कहा कि जब संवाद और मध्यस्थता विफल हो जाते हैं, तब विनाश अवश्यंभावी हो जाता है।
उन्होंने कहा कि न्यायालय यह तय करते हैं कि कानून के अनुसार कौन सही है, लेकिन मध्यस्थता यह तलाशती है कि दोनों पक्षों के लिए स्वीकार्य और टिकाऊ समाधान क्या हो सकता है
जब लोग स्वयं कानून के दायरे में रहकर समाधान तय करते हैं, तो उसका पालन बेहतर होता है और कटुता भी कम होती है।
स्थायी शांति के लिए स्थानीय संवाद जरूरी
जस्टिस ढंड ने कहा कि यदि मजबूत समाज बनाना है तो स्थानीय स्तर पर संवाद को मजबूत करना होगा। यदि स्थायी शांति चाहिए तो मध्यस्थता को बढ़ावा देना होगा और यदि सबके लिए न्याय सुनिश्चित करना है तो न्याय को हर व्यक्ति की पहुंच तक ले जाना होगा।
उन्होंने आह्वान किया कि ऐसी संस्कृति विकसित की जाए जहां लोग लड़ने से पहले बातचीत करें, बदले की भावना से पहले समाधान खोजें और कानून के शासन के भीतर रहकर शांति स्थापित करें।
अपने संबोधन के समापन पर जस्टिस ढंड ने कहा स्थायी शांति तभी संभव है, जब उसकी नींव न्याय और कानून के शासन पर टिकी हो। सच्चा न्याय ऊपर से नहीं उतरता, बल्कि समाज के सबसे निचले स्तर से शुरू होता है।